Sunday, December 29, 2019

मेरी कविताएँ

मेरी कविताएँ
संतति हैं मेरी ।
मुझ जैसी ही
मौन, किन्तु
शब्दों के सागर में
गोते लगाती ।
कभी लहरों सी चंचल,
कभी किनारे सी गंभीर ।
कभी खिलखिलाती
बेपरवाह बच्चे सी,
कभी मापती
प्रौढ़ता की इकाई।
कभी हो जाती है
सरल,सहज
माँ के ममतामयी
आँचल जैसी।
क्षण में ही
जटिल होती
अभिमन्यु के व्यूह सी ।
कभी अग्नि,कभी नीर,
कभी वायु, कभी वेग,
कभी सँवरती,कभी ढुलकती,
कभी मचलती,कभी बरसती।
कभी नयी-नवेली
दुल्हन के घूंघटे जैसी,
कभी मौसम के
बदलते तेवर जैसी।
कुल मिलाकर
मेरा प्रतिरूप,
मेरा प्रतिबिंब हैं
मेरी कविताएँ!!

Friday, December 20, 2019

स्मित रेखा रूठी मुझसे

स्मित रेखा रूठी मुझसे,
नयनों के शृंगार भी रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।

छमछम करतीं नुपूर ध्वनियाँ
देखो कैसे मौन हुईं हैं,
बालपने की सारी गतियाँ
अभी अभी ही प्रौढ़ हुईं हैं।
खो गईं सारी चंचल बातें
उलझी थीं जो परी-कथा में,
हँसतीं गातीं हास्य पंक्तियाँ
जाने कैसे रौद्र हुईं हैं।
गालों की है लाली रूठी,
मस्तक के तो भाग्य भी रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।।

ले आओ यदि थोड़ी प्रीति
अपना भी शृंगार करूँ,
छलनी मन पर धीरे-धीरे
औषध तेरा मान करूँ ।
विधि ने लिखी पीर यदि तो
कर दो उनका विनिमय तुम,
तुमसे जुड़कर जीवन के
स्वप्न सभी साकार करूँ ।
अभी तो सारी बस्ती रूठी,
'श्री' से सब उल्लास हैं रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।।

Wednesday, December 18, 2019

प्रेम-प्रस्ताव

जब भी मिला
प्रेम-प्रस्ताव मुझे,
विश्वास दिलाया गया
कि मैं जग की
विशिष्टतम् स्त्री हूँ!
मुझसा सौंदर्य,
मुझसा तेज,
मुझसा गुण,
मुझसा शील,
अन्य किसी में नहीं !
मानो मुझे पाकर
कोई पुरुष
ऐसे धन्य हो जाये
जैसे ईश-बोध मिले
ध्यान-मग्न संत को !
वस्तुतः ये मात्र
आकर्षक लहरों
के समान थे,
जो उस संबंध में
समा जाने,डूब जाने को
प्रेरित करते थे
व जैसे ही
प्रारंभ किया मैंने
डूबना वहाँ,
अहसास दिलाया गया मुझे
कि ये छलित शब्दों से इतर
कुछ भी नहीं !
संसार की अनगिनत
साधारण स्त्रियों से भिन्न
मेरा कोई अस्तित्व नहीं,
किसी भी प्रकार
मैं विशेष नहीं !
फिर तैरती रही मैं
किसी शव समान
उन्हीं लहरों पर,
अगला प्रेम-प्रस्ताव
आने तक व
चलती रही
यह प्रक्रिया अनवरत !
जब तक ना मिल गया
क्षयी वपु को
अनैच्छिक निर्वाण !!

Wednesday, November 27, 2019

शून्य

स्वीकार है मुझे
शून्य होना ।
हाँ स्वीकार है
तुच्छ होना ।
स्वयं जो अस्तित्वहीन
हो कर
समूचे ब्रह्मांड को
निर्मित कर दे ,
ओजपूर्ण है
ऐसा शून्य होना ।
साथ देने पर आऊँ
तो मूल्य बढ़ा दूँ ,
नष्ट करना चाहूँ
तो विलोप वहीं कर दूँ ,
गौरवान्वित है
ऐसा शून्य होना ।
स्वीकार है मुझे
शून्य होना ।
पूरी ना हो मुझ बिन
कोई गणना ,
मुझ बिन संभव
कोई अनुमान नहीं,
दुःख-सुख स्रोत
सभी मैं होऊँ ,
जिसका ना हो मापन
वो अंतरिक्ष मैं होऊँ ।
सौंदर्यपूर्ण है
ऐसा शून्य होना ।
हाँ स्वीकार है मुझे
अमूल्य होना ।

Saturday, November 23, 2019

वो जो कुछ धब्बे हैं न चंद्रमा पर ....

वो जो कुछ धब्बे हैं न
चंद्रमा पर ,
वो नहीं दिखाते
उसकी कुरूपता,
उसकी कमी,
अपूर्णता उसकी
परिलक्षित नहीं करते ।
वो बताते हैं कि
आदर्श कुछ नहीं होता,
पूर्णतया शुद्ध
कुछ नहीं होता ।
प्रतिशतता में शतांक
संभव नहीं ,
असंभव है किसी से
पूर्णता की अपेक्षा ।
व्यक्तित्व में होते हैं
दोनों ही ..
गुण-दोष, श्वेत-अश्वेत,
मीन-मेख,वेग-उद्वेग ।
भाग-निर्धारण
स्वयं ही करना है ,
स्वयं ही बनाने हैं
धन-ऋण के पाई चार्ट ।
धनात्मकता अधिक हुई तो
चंद्र का उजला भाग हो तुम..
जिसे देख
धब्बे भुला दिये जाते हैं व
यदि नकारात्मकता अधिक हुई,
तो वो धब्बा तुम ही हो ,
जो संपूर्ण प्रकाश निगल
मात्र अंधकार उगलता है ,
बन जाता है प्रतीक
चिर कुरूपता का ।।


Saturday, November 16, 2019

पूछो ही मत तुम जानां

तुम बिन जीवन कैसा है ये,
पूछो ही मत तुम जानां ।
जैसे सावन सूखा हो और
फागुन रंगों का जाना ।

तेरी बातें ऐसी जैसे ,
कविता में रंग जो भर दे ।
तुमसे मिलना साँसों में ,
आयु थोड़ी फिर जड़ दे ।
चुंबन तेरा भीतर-भीतर ,
सुलगाये जैसे पल-पल ।
आलिंगन तेरा जैसे ,
फूलों से मुझको मढ़ दे ।
तुमको लिखना सबसे सुंदर ,
प्रेम तुम्हीं से क्यों जानां ?
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।

रतरानी सी गंध कमर पर,
सिद्ध तुम्हें हाँ करतीं हैं ।
बिन काजल की मेरी आँखें ,
सौंदर्य अर्थ को गढ़तीं हैं ।
स्पर्श तुम्हारा हो जाता तो
बगिया मैं बन जाती हूँ ।
तारों की सब प्रेमी लड़ियाँ ,
पूर्ण चंद्र को करतीं हैं ।
प्रश्न सदा ही रहता वो ही,
विरह-क्षणें कब तक जानां ?
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।

तुमसे मंदिर, तुमसे पूजा ,
उपवास सभी तो तुमसे हैं ।
तुम हो तो वो ईश्वर है ,
विश्वास सभी हाँ तुमसे हैं ।
भाग्यों वाली रेखा में माना
तुम साजन ना बैठे हो ।
प्रेम-कहानी उच्चतम अपनी ,
इतिहास सुनहरे तुमसे हैं ।
अंतिम वेदी पर मेरी तुम ,
स्वप्न सभी रखना जानां ।
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।



Monday, November 11, 2019

मेरी 'माँ' सी धड़कन


उजालों में भी रौनकेंं दिखती नहीं शहरों में,
बागों में रंग-ए-खुशबू,मीठी हलचलें बीते जमाने की थी ।

छुप कर रोना, छुपा लेना दर्द-ए-रूह को,
ये हुनर तब आया,जब अपने ने करी छेड़खानी सी थी।

आ गया वक्त के संग थाम लेना लहरों को,
बड़बड़ करती झल्ली लड़की,बचपन-ए-कहानी की थी।

चाहत बन गयी हजारों शख्सियत की मैं,
चाहत तो एक कुर्बान होती मुहब्बत-ए-वादी की थी ।

हुस्न-ए-रंगत के आगे किसी ने देखा नहीं,
वरना मैं भी खूबसूरत किसी मासूम शहजादी सी थी।

दुखाया हर रिश्ते ने एक-एक कर के,
मेरी 'माँ' सी धड़कन कहाँ किसी रिश्तेदारी में थी ।



Friday, November 1, 2019

सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर

अर्पित तुम पर प्रति रोम-रोम,
तुझमें डूबी पिय पोर-पोर ।
आओ मेरे हृदि- मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।

तुम हो जीवन के रेख-बिन्दु से,
तुम ही मृत्यु के प्रिय तट सिन्धु ।
तुमको जीना यूँ गीत सरीखा ,
मरना जैसे अंक शिव-शम्भु ।
तुमसे ही उगती मेरी भोर-भोर ,
उत्सर्ग तुमपर नैनों के कोर-कोर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।

कल्पित सागर के मोती तुम ,
मेरी प्रेम-कथा के सत्-नायक ।
मैं बुनती शब्द-अक्षर में तुमको ,
तेरे स्वर मेरी कविता के गायक ।
बन बैठे तुम ही चित्त चोर-चोर,
तुमको ही खोजूं सब ओर-ओर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।

माथे पर पड़ता बल तुम ही हो,
करतल पर बैठे तब क्यूँ ना हो ?
मुखड़े की द्युति तुमसे ही है ,
माँग में सजते तुम क्यूँ ना हो ?
तुमसे ही जन्मों का मोल-मोल ,
तुमसे जुड़ते नस डोर-डोर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।



Friday, October 25, 2019

मन में भी मेरा दीप जलाओ

आओ कभी तो सिरहाने तो बैठो,
मृतप्राय देह की आयु बढ़ाओ ।

चूमो हृदय को हृदय से तो अपने,
श्वेतार्क सा बंधन श्वेत बनाओ ।

ठहर जाऊँ आकर के आँगन में तेरे,
वहीं संग में मेरे जन्में बिताओ ।

समर्पित तुम्हीं पर हों सौभाग्य सारे ,
मुझ पर तुम अर्पित अश्रु कराओ ।

सदियों में ऐसा कभी ना हुआ जो,
ईश्वर सी गाथा कोई सजाओ ।

मैं लिखूँ तुम्हें ही प्रतिदिन क्षितिज पर,
वहीं से वो गीतें सभी को सुनाओ ।

उजियारे सदा ही हों जीवन में तेरे ,
मन में भी मेरा दीप जलाओ ।


Monday, October 21, 2019

ये रूप, श्रृंगार ..

ये रूप, श्रृंगार, अदायें निराली,
तुम से हैं जानां, तुम्हीं पे लुटाना ।

देखूँ मैं दर्पण,तुम्हीं तुम दिखे हो ,
नयनों से अपने मुझे तुम सजाना ।

मैं प्रश्नों भरी इक गहरी नदी हूँ ,
तुम उत्तर हो मेरा, मुझमें समाना ।

प्रेम की गलियाँ अग्नि सी तपतीं ,
तुम मुझमें पिघलकर उबटन लगाना ।

प्रीति की रीति कठिन तो बहुत है ,
तुमसे है निभना, तुम्हीं को निभाना ।

मैं पूजूं तुम्हें एक जोगन की भाँति ,
बनकर के ईश्वर, मुझे तप बनाना ।

आये कभी जो विदाई की बेला ,
तुममें है छिपना, तुम्हीं को छिपाना ।


Wednesday, October 16, 2019

तुम्हारा ख्याल

तुम्हारा ख्याल ...
तुम्हारा ख्याल सूरज की किरनों संग आता है ,
और तारों की छाँव तक साथ निभाता है ।

सुबह उठने पर जो पहली स्पष्ट
तस्वीर होती है न आँखों में,
वो तुम्हारी होती है ।
और नींद आने से पहले जो जरूरी बातें
करनी होतीं हैं खुद से ,
वो भी तुम्हारी होतीं हैं।

तुम्हारे एहसास  मुझसे बँध से गये हैं ,
बिल्कुल वैसे ही जैसे ...
मन्नतों वाले धागे पेड़ों से बँधे होते हैं।

अब तो मेरा दुपट्टा भी तुम्हें बुलाता है ,
उसको भी इंतजार है कि कब
तुम पीछे से आकर अपनी उंगलियों में
उसे दबा लो ।

मेरी कलम तो पहले ही तुम्हारी हो चुकी है ,
जब भी लिखती है तुम्हें ही लिखती है ।
उसे भी बेपनाह मुहब्बत है तुमसे ।

मेरी आँखें तो इतराती हैं खुद पर
क्योंकि उनमें चेहरा जो तुम्हारा होता है ,
सपने भी तुम्हारे रहते हैं। और आँसू...
आँसू भी तुम्हारे ही नाम के होते हैं।

मैं अपनी जुल्फें अक्सर बाँध कर ही रखती हूँ ,
क्योंकि जब-जब ये खुलते हैं
तुम्हारी शरारतें याद आतीं हैं ।
याद आतीं हैं वो बातें कि
खुले बालों में मैं तुम्हें अच्छी लगा करती थी ।
मेरी एक उंगली से अपने बालों को कान के पीछे करना
तुम्हें घायल कर जाता था ।

मेरे पास ऐसी अनगिनत यादें हैं ,
जो हर दिन मेरी मुहब्बत को फिर से नया कर जातीं हैं ।
हर रोज फिर से मुहब्बत करने का कारण दे जातीं हैं ।

पर मेरे होंठ अक्सर रूठे से रहते हैं मुझसे ,
उन्हें कभी इजाजत नहीं दी न मैंने
तुम्हारा नाम लेने की ।
उनके हिस्से तो बस मुस्कुराहट ही आयी है,
जो तुम्हारे कारण और भी मासूम हो जाती है ।

अब तो आदत सी हो गयी है तुम्हें सोचने की ,
ना सोचूं तो कुछ अधूरा सा लगता है ।
हर पल मुझे खूबसूरत और हसीन बना जाते हैं,
तुम्हारे ख्याल .....
©अनुश्री 'श्री'✍️


Monday, October 14, 2019

तुम ही जग बन जाओ न

सीने में तेरे छिपना है ,
स्थान कोई बनाओ न ।
जग से मन ये दुखता है ,
तुम ही जग बन जाओ न ।

पिघले चंदा बदन पर मेरे ,
मैं तेरे बदन को तड़पूं ।
तकना चाहे प्रभा मुझे ,
मैं तेरे दरस को तरसूं ।
सुमन सुगन्धित हो मुझसे ,
पर मैं तेरे स्वेद से महकूं ।
हूँ मैं शीतल वायु जैसी,पर
जब-तब तेरे विरह में दहकूं ।
जनम-जनम से प्यासी हूँ,
सुरभोग प्रीत का लाओ न ।
जग से मन ये दुखता है ,
तुम ही जग बन जाओ न ।।

हाथों पर जब तुम हाथ रखो ,
प्रेमी घाटी में खो जाऊँ ।
उंगली में हो फँसी उंगलियाँ ,
काँधे पर तेरे सो जाऊँ ।
जीवन-चक्र पर बढ़ते-बढ़ते ,
प्रेम गली में रुक जाऊँ ।
उम्र बिता दूँ तुझमें ही बस ,
साँसों में तेरे थम जाऊँ ।
तुझ संग पल-पल मरना है ,
जीवन तुम्हीं हराओ न ।
जग से मन ये दुखता है ,
तुम ही जग बन जाओ न ।।।


Thursday, October 10, 2019

यक्ष-परीक्षा

कठिनाइयाँ सारी
धर जब छद्म-वेश
आयेंगी तुमसे पूछने
अर्थ प्रेम का ,
तब रख लेना
तुम धैर्य थोड़ा ,
होगी ये तुम्हारी
यक्ष-परीक्षा ।
भाँति-भाँति के प्रश्न होंगे ,
तुम सभी का उत्तर
सावधानी से देना ।
एक लुभावनी सी
झील होगी ,
जिसके दूसरी ओर होगा
तुम्हारा प्रेमी-जीवन ।
प्यास की चिंता किए बिना
मात्र लक्ष्य याद रखना ।
स्मरण रहे ,
युद्ध-काल का अंतिम समय ही
अधिक बलवान होता है ;
एक चूक कर देगी तुम्हें
प्रेम -विहीन ।
पा तो जाओगे
चमकता मीठा जल ,
परंतु
नष्ट कर देगा ये तुम्हारे
वास्तविक प्रेम के अस्तित्व को ।

Monday, October 7, 2019

पीड़ा सारी सिमट के मन की

पीड़ा सारी सिमट के मन की ,
क्षण पर भारी होती है ।
मन पर उगते कृशानु विटप ,
घाव की धारी होती है ।

मेघों पर बनते चित्र अपरिचित ,
नभ-अंधियारे कहाँ हैं छँटते ।
छवि स्वयं की धुंध सी लगती ,
आकार संयमित कहाँ हैं लगते ।
बरसे मन तो तन-मन पर,
घनघोर सी आँधी होती है ।
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।

खिंचता है प्रति रोम देह का,
धमनी भी कट-कट कटती है ।
प्राणों की रेखा बाधित सी ,
श्वासें भी तप-तप तपती हैं ।
जीवन के गूढ़ से सागर में,
बड़वाग्नि दशा सी होती है ।
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।

होते हैं कुछ अशांत से सरवर,
लहरें प्रचंड उत्पात मचाती हैं ।
ना कोई श्रोता,ना कोई दर्शक,
मुख बाण ही भेदी जाती है ।
फूलों की सी सेज ही सहसा ,
क्यों कंट विधा सी होती है ?
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।


Thursday, October 3, 2019

ना होता जो प्रेम यदि...

ना होता जो
प्रेम यदि ,
मैं भी शायद
ना होती ।
मधुर-मधुर संबंध
ना होते ,
'श्री' भी कायम
ना होती ।
क्या रचती मैं
पन्नों में,
कलम सुनहरी
क्या करती ,
ना होती जो
भाव की गंगा,
आँखों से मेरे
क्या बहती...
ना होता जो
प्रेम यदि ,
मैं भी शायद
ना होती।।

शबरी के मुख
लग कर के ,
बेर जो मीठे
ना होते ।
भगीरथ के
तप से जो ,
गंगा में जल-कण
ना होते ।
उस शून्य में
जलता दीप यदि
जग में ज्योत्
जो ना भरता ।
महादेव व गौरी का
प्रेम
जो शाश्वत
ना होता ।
रह जाता एक
पिंड खोखला ,
धरा सुनहरी
ना होती ।
ना होता जो
प्रेम यदि,
मैं भी शायद
ना होती ।।

बिना प्रेम के
जीवन कैसा,
तन पर मेरे
प्रेम ही बसता ।
कोटि-कोटि हों
पीर भले ही ,
मन पर मेरे
प्रेम ही रमता ।
प्रेम में देना
ना कुछ पाना ,
यही हृदय की
भक्ति है ।
ना पाऊँ
ऐश्वर्य भले ही ,
प्रेम ही सच्ची
शक्ति है ।
ना होता जो
कष्ट कोई ,
खुशियाँ सुखकर
ना होतीं ।
ना होता जो
प्रेम यदि,
मैं भी शायद
ना होती ।।।


Saturday, September 28, 2019

बस तुम हो

नींद ..
मीलों दूर है
आँखों से ,
आँखों में
बस तुम हो ।

               बूंदें..
               टपटपा रहीं हैं
               आँगन में ,
               मन में
               बस तुम हो ।।

ख्वाहिशें ..
हजार उमड़ रहीं
सीने में ,
साँसों में
बस तुम हो ।।।

                हवायें ..
                शोर कर रहीं
                खिड़कियों पर ,
                बातों में
                बस तुम हो ।।।।

कविता ..
प्रेम कर रही
रातों में ,
रातों में
बस तुम हो ।।।।।


Wednesday, September 25, 2019

गले से लगा लो

बदन की सारी थकन मिटा दो ,
थामो मुझे और गले से लगा लो ।

मैं तन्हा सी कोई बुझती शमा हूँ ,
छू लो मुझे और खुद में जला लो ।

उलझी लटें हैं, साँसें भी बहकीं ,
सुनो, उंगलियों से ज़ुल्फें सजा दो ।

खो कर बहकना तुम्हीं से है साजन ,
मैं सँभलूं तो कैसे, यही तुम बता दो ।

राहों में तेरे मेरी आँखें बिछीं हैं ,
उठा लो उन्हें और पलकें बना लो ।

मुहब्बत की बातें समझो न जानम ,
रूठूं कभी तो मुझे तुम मना लो ।

जरूरी नहीं है होंठों से कहना ,
करके इशारे..इशारे.. जता दो ।

मैं तड़पूं तुम्हारी मुहब्बत की खातिर ,
तुम आओ तभी सौ रातें बिता दो ।।

Friday, September 20, 2019

मन अब रात हो रहा है

साँझ से ढलकर
मन अब
रात हो रहा है ,
जीवन से छुपकर
मन अब
पार हो रहा है ।
निराशा ने ओढ़
रखी थी
उजली किन्तु
मिथ चादर,
ज्यों पलटा उसे
नभ अब
स्याह हो रहा है ।

मटकती,लचकती
बूंदे
चिढ़ा रहीं हैं मुझको,
बिखरी,टूटी
लाचार पत्तियाँ
उंगली दिखा रहीं मुझको,
हर एक शोर अब
आलोचना लग रहीं हैं,
चुप्पी जैसे अब
दुत्कारना लग रहीं हैं ।
आकर्षक जग का
यौवन रंग अब
जीर्णात हो रहा है,
साँझ से ढलकर
मन अब
रात हो रहा है ।

Friday, September 13, 2019

माँ हिन्दी

हे जननी!
हे प्रेम की देवी!
सौन्दर्य समायी,
तुम भाव स्वरूपी ।।

सुंदर तेरे हर अक्षर,
मात्रा में तेरे प्रेम बसा ।
शब्द-शब्द अनुभूति की वेदी,
चरणों में तेरे प्रसून उगा ।

गंध समीर की हो मलय सी,
जब-जब उच्चारण हो तेरा ।
व्योम स्वयं चरण को चूमे ,
पुत्र वहीं नाम लिखे जब तेरा ।

कोमलता तेरे तन-मन में ,
तूने कभी ना अहम् चुना ।
देकर संबल प्रति वाक् को तुमने ,
अस्तित्व उनका स्वयं गढ़ा ।

मूर्ख तुम्हारे बालक हैं माँ,
तेरी महिमा का ज्ञान नहीं ।
तुमसे ही है ब्रह्मांड की रेखा ,
इसका उनको भान नहीं ।

सागर से भी गहरा है,
अंतस्थल तुम्हारा मैया ।
क्षमा लुटाती आयी हो,
भरी स्नेह की तुमने नैया ।

तेरे सपूत अभी भी हैं माँ,
अर्पण तुम पर जीवन हमारा ।
जीवित रहोगी सदा-सदा तुम ,
करो स्वीकार वचन हमारा ।

हे जननी!
हे माँ हिन्दी!
सौन्दर्य समायी ,
तुम भाव स्वरूपी ।।।


Tuesday, September 10, 2019

मर्द

जब रोकती है दुनिया उसको
नीर बहाने से,दर्द बताने से ;
तो बताना चाहता है वो कि
इस मजबूत शरीर के भीतर
एक दिल भी है,
नाजुक सा,कोमल सा ;
जहाँ कायम हैं सभी एहसास
अपनों के लिए, अपने लिए ;
वो भी टूटता है,तड़पता है
जब हासिल नहीं कर पाता
प्रेम अपना ,स्वप्न अपना;
रोना चाहता है खुल कर ,
किसी बंद कोठरी में नहीं ,
खुले आकाश तले,
बनाना चाहता है
हृदय की तस्वीर
बस कागज पर ही नहीं,
भरी महफिल में ;
फिर याद आ जाती है उसे
समाज की खोखली सत्यता
कि वो मर्द है और
'मर्द को दर्द नहीं होता'
फिर बताता है खुद को भी
"तुम रो नहीं सकते
टूटना तुम्हारी प्रकृति पर
प्रश्नचिह्न लगायेगा,
यूं रो कर कैसे खरे उतरोगे
मर्दानगी की कसौटी पर ?
बनाये रखनी है तुम्हें
इस परिभाषा की मर्यादा ।"
और इस तरह
बन जाता है वो 'असली मर्द'
समाज की बेरंग नजरों में ;
पर बंद-अंधेरी-काली कोठरी में
वो आज भी 'लड़की' ही है ,
समाज की भाषा में 'कमजोर लड़की',
जिसकी खुशियाँ,जिसके दुःख
सब आँखों से निकलते हैं,
लेकिन वो तर जाता है हर रात
'लड़की' बनकर!!!


Monday, September 2, 2019

जीवन

ना तड़पे जब प्यासे होकर ,
तो कैसा फिर जमजम है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ...

किसी गरीब के अश्रु से ,
मन यदि ना भींगा है ..
बेबस अनाथों के रूदन से ,
हृद कभी ना रीता है ..
निरीह पशु के कटने पर ,
आँखों में आग ना उबला तो ..
सौम्य कुसुम का टूट बिखरना ,
साँसें तेरी ना तोड़ा तो ..
परपीड़ा में ना दुःखे हो ,
फिर कैसा सुख संगम है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ....

जीवन माया मोह का घेरा ,
इसी बंध में रहना है ..
ऊपर इससे है ही क्या ,
सुख-दुःख सारे सहना है ..
मात-पित्र व प्रेम, सहोदर ,
जीवन के सौंदर्य यही हैं ..
स्वप्न भरे इस ताल नयन में ,
जैसा भी हो स्वर्ग यहीं है ..
परसेवा में ना भटका तो ,
फिर काहे का जीवन है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ....


Sunday, September 1, 2019

आकर्षण

ना जाने कहाँ खो जाती हैं
छमछमाती, बहकाती
घुंघरुएँ पायल की,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण....
हाथों की मेंहदी उतार देती है
सहसा ही पूरी महक,
शोर सी लगने लगती है
उसकी चूड़ियों की खनक,
जिस मुस्कुराहट पर
कायनात लुटा दी जाती थी ,
नापसंद किस्से सी लगती है ..
उसकी बातें सारी प्रेम पगी,
समझ परे मिसरे सी लगती है ..
जिन गालों पर फिदा हुआ ,
उनको तेजाब से धोता है ..
प्रेम रचा जो रक्त से सींचा, वो
अंश कहीं नाली में खोता है ..
तन की अठखेली उसको
पूर्ति कामना की लगती है ..
मन की सारी गिरहें जैसे
बंद कपाट सी लगती है ...
ना जाने कहाँ गुम जाती हैं
चमचमाती, सहलाती
लकीरें काजल की ,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण ....
ना जाने कहाँ खो जाती हैं
उमड़ाती,उछलाती
भावनायें साजन की ,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण .....

Sunday, August 25, 2019

अंसुवन की पीड़ा

कोई पैमाना
नहीं होता ,
जो माप सके
अंसुवन की
सीमा ...
जोर-जोर से
खिंचती
साँसों की
गतियाँ,
कंठ को
पिघलाती
भावपूर्ण
सिसकियाँ,
नयनों से निकल
गंगा बना दे जो
देह समेत आत्मा को;
उसकी गहराई
नापना
संभव नहीं होता ...
अपरिमित उद्वेग
उद्वेलित हो
जब छटकते हैं ,
बाण रूपी कष्ट
जब संपूर्ण बदन
को छलते हैं ,
उन घावों पर
कोई लेप
असर नहीं करता ..
कोई दर्पण
नहीं होता ,
जो दिखा सके
अंसुवन की पीड़ा ....

Wednesday, August 21, 2019

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा ...
जैसे कोई उलझन
उलझे केश
सजाने की ,
व्याकुलता कोई
जैसे
अमरत्व पा लेने की ,
क्षण-क्षण
पावक को
अपना मन सौंपना ..
जैसे
बहती लहरों को
आँखों में भर लेना ।

प्रतीक्षा ...
भावों का आग्रह ,
हठता ..जैसे
चंद्र क्रीड़ की ,
धुंधलेपन में
जैसे
सौंदर्य निहार लेने की ,
पग-पग
राहों पर
अपने स्वप्न सींचना ..
जैसे
घनी निशा को
हौले से भोर कर लेना ।।

नदी किनारे बैठी मैं

नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ, खुद जल जाऊँ ।
वेग सहूँ फिर धार सहूँ  ..
उफान मचाती लय बन जाऊँ ।

उमड़-घुमड़ जो सरपट दौड़े ,
मेघ की प्यारी बरखा हूँ ..
मंदिर में जो सुगन्ध बहे ,
लोबान से उठती लपटा हूँ ..
एक फकीर की सूफी हूंँ मैं ,
किसी देह की रक्ता हूंँ ,
प्रिय की यादों में जकड़ी ,
अनुराधा हूँ, मैं मीरा हूँ ..
जीवन को ही प्रेम बनाकर
प्रीत में डूबी रस बन जाऊँ..
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ, खुद जल जाऊँ।।

चढ़ते यौवन की तरूणाई ,
मेरे मन से जोड़ करे ..
वाचाल,बिखरता चित्त मेरा
जब-तब बैठे योग करे..
परिक्रमा में उस योगी के,
सुफल मेरा हर चक्रण हो..
उसकी धुरी पर चलना ,
जैसे जीवन रक्षण हो..
निर्जन वन की यात्रा में
भ्रमणी यूँ ही बन जाऊँ..
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ,खुद जल जाऊँ ।।

छाया जब उस छलिये की
तन पर मेरे पड़ती है..
वर्ण बदलता,रूप निखरता
रात भी पूनम होती है ..
वात चले जब सौंधी सी
मुझ में वो बस 'बस' जाये..
मयूरी मोहक नृत्य-भंगिमा
काया पर मेरी रच रच जाये..
थकन भरी हर रजनी में
अँगड़ाई उसकी बन जाऊँ...
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ,खुद जल जाऊँ ।।।

Saturday, August 17, 2019

मैं लिखना चाहती हूँ

मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती मेरे अहसासों जितनी हों।
पन्नों को सजाना चाहती हूँ
इतने रंगों से,
जो जग निखारने के लिए काफ़ी हों ।
सूर्य से रोशनी लेकर,
चंद्र की शीतलता लेकर,
गंगा की निर्मलता लेकर,
धरती की सहनशीलता लेकर ,
मैं खुद को थोड़ा और बनाना चाहती हूँ ..
इतना थोड़ा कि
मेरी आँखें खुद को देखने के काबिल हों ।
मैं सोचना चाहती हूँ,
इतने सुन्दर विचार कि
मन निरर्थक सोच के लिए उपलब्ध ही न हो ।।

मैं बहकना चाहती हूँ
हर उस मोड़ पर
जब संसार मुझे अपने जैसा बनाना चाहता हो ...
मैं उड़ना चाहती हूँ,
बस इतना ऊँचा
जहाँ तक मेरे अपनों का साथ हो ।
बच्चों की मासूमियत लेकर,
चिड़ियों की चहचहाहट लेकर,
कवियों की तुकबंदी लेकर,
लेखकों की बुद्धिमानी लेकर ..
मैं खुद को थोड़ा और बनाना चाहती हूँ,
इतना थोड़ा कि
मेरे जीवन का कोई अध्याय अपराध ना हो ।।

मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती सुंदरता के पर्याय जितनी हो ।।
मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती मुहब्बत के पर्याय जितनी हो ।।

Thursday, August 15, 2019

रक्षाबंधन पर्व पवित्र काल सा

श्रावण मासीय पूर्णिम चंद्र ,
छटा समेटे परलोक ताल सा ।
रेशम-धागे का स्वर्णिम रूप ,
सैरन्ध्री-गोविन्द श्वेतानुराग सा ।।

वचनों का सीधा मौन कथन ,
यथ चीर द्रौपदी दीर्घकाय सा ।
द्युति बंधन का अति उजला ,
निशदिन उगते रवि-प्रात सा ।।

बंधु-बांधवी स्नेह मनोरम ,
कोकिल गुंजन मधुर तान सा ।
भ्रातृ-भगिनी युद्ध हासप्रद ,
पशु मुख गर्जन हास्य वाण सा ।।

कुटुंब के द्वि स्तंभी धरोहर ,
एक गौरव,एक भव्य मान सा ।
गृह की शोभा दोनों से ही ,
केंद्रित तत्र मोहित बाग सा ।।

एक सूत्र में बंध अटूट बँधा ,
आत्म संयोजित ईश आस सा ।
नेह कोटि-सहस्र युगों का ,
रक्षाबंधन पर्व पवित्र काल सा ।।।


Wednesday, August 14, 2019

भारत माता

बहे सुधा आँचल में तेरे,
नद वंदन तेरा किया करे,
मुख तेरा पावन क्षीर सा,
हिम शोभित ललाट किया करे ।

त्रि-दिशीय सागर खारे,
चरणों से तेरे निर्मल हों,
छूकर तेरे वस्त्र सुनहरे,
मही माँ हरित-लेप स्व किया करे ।

तुम संस्कृति, तुम संस्कार भी,
सभ्यता मनुज की तुम ही हो,
युगों-युगों की तुम रक्षक, माते !
कल्प निर्मण तुमसे निज किया करे ।

विश्व गुरु हम तुमसे ही हैं ,
तुम सौंदर्या खग-स्वर्णा हो ,
कर तेरे मनहर कुसुम उगे,
केश तुम्हारे अंध हर किया करे ।

नवीन वेश में कुछ तुम प्राची हो ,
जंजीरें तोड़ीं तुमने,तुम अवतारी हो,
दंश सहा वर्ष -वर्षों तक, माँ!
स्नेहोपचार सपूत अब किया करे ।

अंचल तेरे रक्त सुशोभित ,
वीरों ने तुमको उपहार दिये ,
वैभव अमर,कहानी उज्ज्वल ,
मन-तन अर्पित तुमको किया करे ।।।

Tuesday, August 13, 2019

अग्निपरीक्षा

कहो जानकी,जनकनंदिनी ;
दी तुमने क्यों अग्नि परीक्षा ?
अड़ जाती तुम, लड़ जाती तुम ..
सहती गई क्यों प्रत्येक समीक्षा ?

चुप्पी साधे सुनती थी,
नयनों में सिंधु गुनती थी,
तोड़ के बाँध दिखा देती,
विवेचन सारे झुठला देती,
क्यों झुक गई कहो मैथिली ?
करती गई क्यों मात्र प्रतीक्षा ?

हाँ,माना ...तुम बंदी थी,पर..
दोष तुम्हारा कुछ ना था,
लक्ष्मण-रेखा पार करी थी,
कृत्य कोई यह सज्जन था,
क्यों आरोपित तुम हुई सिया ?
तुम तो थी माँ पवित्र सुदीक्षा ....

क्यों ना कहा तभी रघुवर से..
"एकाकी क्यों चलूँ आग पे?"
यह क्या हुई भई रीत भला ..
प्रजा-प्रेम में विश्वास ढहा...
वियोग सहा था दोनों ने ही,
मात्र तुम्हीं को मिली उपेक्षा ...

सत्य यही तुम संस्कारी थी ,
पतिव्रता तुम, गुणवती नारी थी,
मर्यादा पुरुषोत्तम थे वे,क्यों
उन्हें उचित यह अध्याय लगा ?
क्यों ना बदल दिया नियति को ,
क्या थी इससे उन्हें अपेक्षा ?

आदिकाल की रीति वही ,
अब भी स्त्री को दहलाती है ..
अबोध कलयुगी पीढ़ी मैया,
रमणी को ही कूटे जाती है..
अज्ञान भरा हर कुएँ में,अब
करो आवंटित तुम माँ सुशिक्षा ....

Sunday, August 11, 2019

सरल नहीं है

सरल नहीं है
बुनना
मन के बिखरे
धागों को ....
हृदय पर पड़ी गाँठ
खोलना
कहाँ आसान ....
कितना दुरूह है
घावों की दवा से
पहचान कराना ....
कलम को
दर्द की स्याही में
डुबोकर
कृति सुसज्जित करना
कितना सुविध ....
कवि-मन ही
जानता है
ऊहापोह का स्तर ,
टूटे-बिखरे तिनके
जोड़कर
महल बनाने का मंतर ...
अश्रु को सागर
बनाने की कला
अन्य किसने जानी ,
किसने सीखा
मृत्युशैय्या पर
पुहुप उगाने का तंतर.....

Saturday, August 10, 2019

पवित्रता

पवित्रता ..
सिद्ध नहीं होती
कायाकल्प से,
रंग से,
मापदण्ड नहीं होते,
संरचना कोई
परिभाषित नहीं करती
पवित्रता को ...
नश्वर देह की
परिवर्तनशीलता
पवित्रता-निर्धारण
नहीं करती ।

मन की सौन्दर्यता,
स्वच्छता आत्मा की,
विचारों की उत्तमता ,
अहम् रहित भक्ति ,
गंगाजल समान
नेत्रनीर ..
पवित्रता के
उद्गम होते हैं ...
उच्चता प्राप्त करते
भाव ही
प्रकट करते हैं
पवित्रता ।।

Friday, August 2, 2019

सृजनता

सृजनता ..
सदा ही प्रिय होती है
सर्जक को ,
सृजनता के क्रम में
जीता है वह
प्रति क्षण को ,
प्रकृति से सभी मोह
अंजुरी में ले
भर लेता है
नयन संग हृदय में ,
सृजनता का
विकास
शनैः शनैः
विकसित करता है
सर्जक को भी ,
प्रहरी की भाँति
रक्षा करता है
सर्जक
सृजनता की ..
विपदाओं से बचाते
झोंक देता है
स्वयं को
सृजन की निगरानी में ,
सृजनता ..
चाहे शिशु हो ,पौध हो
या कोई लेख
सदा ही प्रिय होती है
सर्जक को ....

Thursday, July 25, 2019

कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा?

कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।
मिलन-समागम हो ना हो,
श्वासों में श्वास तो भरता है ।।

आत्म-विचरता पंछी है ,
उड़-उड़ बहता आयेगा ..
लाख सुला लो अहसासें ,
जग-उठ तुम्हें सतायेगा ..
रोकोगे तुम बढ़ने से ,
सीमायें तब लाँघ चुकेगा ..
दीवारों से जब घेरोगे ,
पर्वत को भी पार चुकेगा ..
कायदे-नियम,ताने-वाने ;
सबसे आगे बढ़ता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।१।।

राधा के यह कान्हा सा ,
नटखट बाँसुरी वाला है ..
कान्हा के यह राधे सा ,
पावन-पूजित माला है ..
सदियों से यह प्रथा चली ,
पी-संगम, हाँ दुष्कर है ..
प्रभु ने भी दुःख झेला ,
उर उनके वेदन-पुष्कर है ..
सबको नीति-हर्ष सिखाकर ,
स्वयं विलाप तो करता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।२।।

लक्ष्य यदि ना पाया तो ,
जन्मों से यह सौदा कर ले ..
गेह में वास ना पाया तो ,
आँगन का यह पौधा बन ले ..
तरु से यह देना सीखे ,
तृण से कष्टों को सहना ..
नैत्रज से यह देह को सींचे ,
स्वाभाविक नित रात्रि बहना ..
स्वजन का यह मान रखे ,
भीतर-भीतर जलता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।३।।

Tuesday, July 23, 2019

पिंजर

सुंदरता जब अभिशाप लगे ,
जीवन भर का भार लगे ,
आकर्षित हो जब कोई नोचे ,
प्रेम कटु आघात लगे....
तोड़ के सारे पिंजर, शुका !
तुम नील गगन उड़ जाना ..
ना आना रस घोली बातों में ,
ठाठ-बाट से मुंह फिराना ...

स्वर्णिम पंख तुम्हारे सुन लो ,
कटने को ना उत्पन्न हुए ...
मीठे बोल तुम्हारे शुग्गा ,
विवशे क्यों व्युत्पन्न हुए ...
स्त्री जैसे तुम भी हो ,
उस जैसा ही चक्र तुम्हारा ..
तोड़ के बेड़ी गुलामी वाली ,
स्वातंत्र्य का उसको पाठ पढ़ाना..

रिश्ते जब कटु आहार लगें ,
प्रति क्षण डँसता नाग लगें ..
अपमानों की ही वर्षा हो ,
प्रेम क्षणिक एहसास लगे ...
छोड़ के झूठे महल, वनिता !
तुम अपने झोपड़ में आ जाना...
ना सहना तुम अपराधों को ,
नियति अपनी निज पा जाना ।।।

Monday, July 22, 2019

मृग मरीचिका

मृग मरीचिका ..
निःसहाय,विरक्त हृदयी..
लक्ष्यहीन यात्रा से
थकी-माँदी,
गर्म रेतों पर
डगमगाते कदमों से
बढ़ी जाती है ...
देखती है एक ताल
रजतवर्णम् अम्बु से भरा,
कर देती है गति तीव्र ..
अमृत-प्राप्ति की ललक
भुला देती है
दिन-भर की थकन...
कंठ की शुष्कता
निर्धारित करती है लक्ष्य ..
अंततः...
कदाचित् प्राप्त कर लिया...
आह!! यह क्या ??
विलुप्त हो गया
मायावी ताल....
सोचती है "भ्रम था क्या??
नहीं,भ्रम नहीं ।।
दूरी अभी शेष है ।।"
पुनः निर्धारण होता है
नवीन लक्ष्य का...
चलता रहता है क्रम
जीवनपर्यंत ...
अकेली तो नहीं मृगा
मरुथल के कपटों में फँसी,
भुक्तभोगी हैं सभी जीव..
विचरते हैं रेगिस्तान में
पात्र लिए आस के...
विहीन रह जाते हैं मगर
अंजुरी-भर पय-पान से....

Saturday, July 20, 2019

यह जीवन तो विरह में बीता

यह जीवन तो विरह में बीता,
अन्य लोक में मिलें कभी।
तुम रहना बस हम होंगे ,
दृग में चंदा जले कभी।

निर्मित करना छोटी कुटिया ,
मैं उसको घर कर दूँगी ।
तुम बोना कुछ पुष्प प्रेम के ,
मैं उनमें रंग भर दूँगी ।
जब-जब सूरज तापे मुझको ,
बन कर साँझ चले आना ।
रहना मुझमें मेरा बनकर ,
'मैं-तुम' संग 'हम' बनें कभी ।
यह जीवन तो विरह में बीता,
अन्य लोक में मिलें कभी ।।१।।

मन,मन से ही बतिया लेगा,
नैनों-नैनों में शोर करेंगे ।
कुछ किस्से संबंधों वाले ,
रातें-रातें फिर भोर करेंगे ।
पाठ पढ़ाने ऊँच-नीच का,
कोई ग्रंथ ना आयेगा ।
प्रेम-नगर बसा लेना संग,
प्रेम-ग्रंथ फिर रचें कभी ।
यह जीवन तो विरह में बीता,
अन्य लोक में मिलें कभी ।।२।।

इस पीड़ा को मुस्कान बना
हम खिड़की पर टँक देंगे ।
आँसू लेकर अपने सारे,
सब गागर-सागर भर देंगे ।
भावुकता के मोती से तुम
मेरा शृंगार करा देना ।
मुझको थाम ना पाते हो,
पर एक-दूजे में ढलें कभी।
यह जीवन तो विरह में बीता,
अन्य लोक में मिलें कभी ।।३।।

Monday, July 15, 2019

सावन आने वाला है

कुछ प्रेममयी,कुछ द्वेष रहित,
सौगातें लाने वाला है ..
झमझम जैसी ध्वनियों संग,
अब सावन आने वाला है ।।

नयी-नवेली दुल्हन अब,
पीहर के सपने देखेगी..
प्रियतम की वो बाँहों में,
बन मयूरी अब चहकेगी..
बारिश वाली मिट्टी सी,
मेंहदी सौंधी महकेगी..
आँगन में वो झूले डाले,
संग सुहाग के झूलेगी..
चपला की वो गर्जन सुन,
स्वामी-वक्षों में सहमेगी..
प्रियतम अपनी प्यारी का,
संसार सजाने वाला है...
झमझम जैसी ध्वनियों संग,
अब सावन आने वाला है ।।१।।

सोलह साला कन्या वो,
कुछ नये वेश में सँवरेगी..
हरी चूड़ियों की हरियाली,
अपने तन पर खोजेगी..
वो कागज की नावें उसको,
अब कतई ना भायेंगी..
हर कागज के टुकड़े लेकर,
शब्द प्रेम के जोड़ेगी..
बागों वाले झूले पर वो,
संग सखियों के उछलेगी..
नयी उमर का खेल नया,
उसको तड़पाने वाला है...
झमझम जैसी ध्वनियों संग,
अब सावन आने वाला है ।।२।।

Saturday, July 13, 2019

संवेदना

संध्या-तट पर बैठे,
दर्शती हूँ कुछ बूँदें..
कुसुम पर पड़ते...
आभास होता है,
उनकी सजीवता का..
किस प्रकार
मनोहरता में डूबी,
जलकण को
सुख-साधन
बना लेती हैं...
खिल उठती हैं
स्पर्श मात्र से...
सुंदरता की इकाई से
प्राप्त होती हैं
अनंतता को.....
ठीक उसी प्रकार
जैसे नवयुवतियाँ
हर्षती हैं..
प्रेमी को पाकर...
उनके प्रभाव से
निखरते हुए
गढ़ती हैं परिभाषायें
प्रेम की ...
उर की व्यथा से
प्राप्त कर लेती हैं
संवेदना को....

Friday, July 12, 2019

अंतर्द्वंद

अंतर्द्वंद मेरे
झकझोरते हैं..
यदा-कदा
मस्तिष्क नसें
चढ़ने लगती हैं..
कोमल से भाव कभी
शूल सी प्रतीति
देते हैं..
भावों की अधिकता
जब आकाश छूती है..
चित्त पथभ्रमित
होने लगते हैं..
अनवरत् लिखने
की चाह
कचोटती है हृदय को..
शुद्धता का
आत्मीय चिंतन
बाँधे रखता है
विचारों में...
बरबस ही
उपजती है कोई रचना..
कलित अथवा अकलित...
प्रदान कर जाती है
मनस को
गहन आमोद..
जैसे
तृप्त हो जाता है
चातक
स्वाति के मिलन से...

Saturday, June 29, 2019

किसी कवि की कल्पना बनना चाहती हूँ

किसी कवि की कल्पना बनना चाहती हूँ ,
किसी कलम की तमन्ना बनना चाहती हूँ ।
चाहत है मुझे किसी की गज़ल बनूँ ,
किसी महबूब की मैं गीत बनूँ ,
कोई सुंदर सी मैं नज़्म बन पन्ने पर उतारी जाऊँ,
मेरे लिए पढ़ी जाये कविता महफिल में,
कविता के रूप में मैं सराही जाऊँ ।

मालूम है मुझे ,
बहुत हसीन नहीं मैं ।
सुंदरता के पैमाने पर खरी उतरती
व्यक्तित्व नहीं मैं ।
फिर भी ख्वाहिश है ,
चाँद से तुलना हो मेरी ।
कोई शायर हो,जो झील देख ले
आँखों में मेरी ।
यूँ तो तारीफ़ें मिलती रहती हैं ,
पर इच्छा है ..
अंदाज ज़रा शायराना हो ।
बातें तो अभी भी होती हैं मेरी ,
पर जो महफिल लूट सके ..
वो शायरी कातिलाना हो ।
शब्दजाल के बंधन से कोई ,
मुझे परिभाषित करे ।
इश्क और कविता की पर्याय बनूँ ,
कोई यूँ मुझे परावर्तित करे ।
लफ्ज़ों के मोती के
केंद्र में मैं बैठूं ,
काव्य रूपी बगिया के
फूलों सी महकूं ,
कोई मुझको यूँ लिख दे कि
श्रृंगार रस की उदाहरण बन जाऊँ ।
फिर तत्पर ही मन की शक्ति को
यूँ पढ़ दे कि
वीर रस की उदाहरण बन जाऊँ ।

कोई मुझमें भी राधा सी प्रेयसी देखे ,
मीरा सी भक्ति मुझमें भी प्रदर्शित हो ,
मैं प्रसाद की अब श्रद्धा बनना चाहती हूँ ,
किसी कवि की कल्पना बनना चाहती हूँ ।।।

Saturday, June 22, 2019

भूले-बिसरे रिश्ते

कुछ रिश्ते भूले-बिसरे से,
यादों की झड़ी लगाते हैं।
मौन हुए जो तू-तू मैं से,
दिल में शोर मचाते हैं।

वह अतीत का मुड़ा पन्ना ,
कुछ अक्षर-अक्षर दर्शाता है ।
जो लुप्त हो रहा धूसर से ,
रेखायें उनकी दिखलाता है ।
फटे हुए कुछ पृष्ठ पड़े हैं ,पर
कोना पुस्तक से जुड़ा रहा ।
कथानक उनके अपनेपन से,
जब-तब मन सहलाते हैं ।
कुछ रिश्ते भूले-बिसरे से,
यादों की झड़ी लगाते हैं ।।

स्पर्श तनिक ना रहा अभी,
दूरी ने अधिकार चलाया है ।
वह देहरी का दीप अभागा ,
आँधी से ना लड़ पाया है ।
गिरी हुई कुछ राख शेष है,पर
बादल उनको बहा रहा ।
जो थे अपने पूरक से,
अब दृष्टि से भी कतराते हैं ।
कुछ रिश्ते भूले-बिसरे से,
यादों की झड़ी लगाते हैं ।।।

मनोहर क्षण आह्लादों वाले,
जाने कब के बीत गये ।
स्नेह -प्रेम से ऊपर सब ,
द्वेष -कटुता जीत गये ।
बाहर-बाहर कुछ ना है,पर
भाव सदा ही बना रहा ।
दूर हुए वे जीवन से,
फिर बातों में आ ही जाते हैं ।
कुछ रिश्ते भूले-बिसरे से,
यादों की झड़ी लगाते हैं ।।।।

Thursday, June 20, 2019

लकीर

जीवन-मृत्यु के बीच
जो पतली सी
लकीर होती है न..
वहाँ खड़ी हूँ ,
बरसों से ...
हाथ थामते हो मेरा,
जीवटता लौट आती है ..
जीवित हो उठती हूँ ..
छुड़ा कर चल देते हो
जब हाथों को,
मृत्यु शैय्या की ओर
बढ़ने लगती हूँ ..
पुनः आ जाते हो
अमृत-पान कराने ...
बरसों से
इसी जद्दोजहद में
जूझ रही हूँ ...
ना जीती हूँ,
ना मरती,
जीवन-मरण का
चक्कर लगा
आ जाती हूँ
पुनः
उसी लकीर पर....

Tuesday, June 18, 2019

भारतीय प्रेमिका

वो तुमसे उलझेगी भी ,
फिर स्वयं
स्वयं को सुलझाती जायेगी ।
वो तुमसे रूठेगी भी ,
फिर स्वयं
स्वयं को मनाती जायेगी ।
चंद्र कलाओं सा उसका
प्रेम बढ़ेगा ,
फिर समर्पण में स्वयं
स्वयं को घटाती जायेगी ।
मद्धम आँच पर
सेंकेगी प्रीति अपनी ,
फिर स्वयं
स्वयं को बुझाती जायेगी ।
वो भारतीय प्रेमिका है ;
तुमको कान्हा बनाकर,स्वयं
स्वयं को राधिका बनाती जायेगी ।।।

Saturday, June 15, 2019

पिता

काट कर बदन अपना
खानापूर्ति करते हैं ,
बच्चों के जीवन में ...
झंझावातों में फँस कर
टूटा करते हैं ,
सुख जोड़ते हैं
तब भी आँगन में ...
पीड़ा के दलदल में
धँसकर भी
आँसू नहीं बहाते ,
मात्र चुप्पी साध लेते हैं ..
समय के संग-संग
कठोर अधिक
हो जाते हैं ...
जागते रहते हैं
चिंतावश
निशा पहर में ...
वे पिता ही होते हैं ,
खड़े होकर वृक्ष की भाँति
सहते हैं आपदायें ,
छिपा लेते हैं
कुटुंब अपनी शाखा में ...

प्रेम की पराकाष्ठा

धीरे से कभी
किवाड़ खोल
निहारना उन रूखे हाथों को ,
जो प्रबंध करते हैं
प्रतिदिन की रोटी का ..
निकट बैठकर
बंद नयनों से
नीर बहाना
व चुपचाप
लेप लगाना हल्दी का ...
अकस्मात् कुछ
पढ़ना मन ही मन
थुथकार देना फिर,जैसे
कण कोई मिट्टी का ...
यही तो है
प्रेम की पराकाष्ठा ;
प्रीत में बस
जोगन बनना, व
अंग हो जाना प्रेमी का...

Sunday, June 9, 2019

मैं चली

लिये हाथ में लेखनी,
कुछ भाव पिरोने चली।
हृदय में बिखरे कुछ बिन्दु,
उन्हें आकार देने चली।
इच्छा है अपनों की ,
लिखूँ कुछ स्वयं की खातिर ।
जिस लेखनी से प्रेम लिखा,
गढ़ूं कोई रचना स्वयं की खातिर ।
अब मन के भावों को,
मनोहर श्रृंगार देने चली।
छोटे -छोटे सपनों को,
काव्य रूपी उपहार देने चली।

प्रतिभा नहीं विशेष मुझमें,
पर लोगों का विश्वास हूँ मैं।
कवयित्री नहीं महान कोई,
फिर भी उनके हृदय का प्यार हूंँ मैं।
स्वप्न सजाते वे मेरे भविष्य की खातिर,
आशीष लुटाते रहते हैं मेरे जीवन की खातिर ।
 क्यों तोड़ूं उनके स्वप्नों को?
 कैसे पग पीछे कर लूँ ?
क्यों मुरझाऊँ तीव्र सूर्य से?
कैसे विपत्ति से छिप लूँ?
अपनी प्रतिभा को
उच्च आकाश देने चली।
नन्हें-नन्हें तारों से आगे,
श्रेष्ठ-सुंदर स्थान देने चली ।

पिता की चाहत पुत्री महादेवी सी
जो करे शब्दों का श्रृंगार,
काव्य की भक्ति ।
यूँ फूटा काव्य का अंकुर,
शब्द पत्र पर सज गये।
कुछ रचना सुंदर
तो कुछ थोड़ी टूट गयी।
किन्तु मन का विश्वास अटल है,
सुंदर लिखते रहने का प्रयास निष्कपट है।
कुछ कर-गुजरने की अब इच्छा प्रबल है,
अब कठिनाइयों से भरी चाहे कितनी भी डगर है।
अपनी रचनाओं को अब
भव्य ताज देने चली ।
अभी नदी हूंँ छोटी -सी,
सागर अथाह बनने चली।

Thursday, May 30, 2019

वर्षा की प्रतीक्षा

सूखापन, ये सूनापन ..
हृदय का मेरे,
प्रतीक्षारत् देख रहा है..
अम्बर को...

यह लहलहाती, इठलाती ..
करती घुमड़-घुमड़ हवा,
कोई संदेशा दे रही है ,
जन-जन को...

दूत बन ये आयी है देव इन्द्र की,
ठुमक-ठुमक के मन मचलाती ...
यौवन दिखा रही है मेरा,
दरपन को...

प्रगाढ़ प्रतीक्षा वर्षा की,
व सौंधी सुगंध माटी की ..
महका रही है अभी से मेरे,
अंग-अंग को...

Tuesday, May 28, 2019

मैं स्वयं के साथ हूँ

नहीं चाहती करना
हर किसी से
अपने मन की बातें...
अन्तर्मुखी हूँ थोड़ी -सी,
छुपा कर ही रखती हूँ
अपने कुछ गूढ़ रहस्य ..
अधिक कुछ चाह
यदि उठी तो..
पन्ने पर उकेर देती हूँ
हृदय के कुछ चित्र ,
मैं अपने मुख से
कुछ नहीं कहती,
मात्र लेखन को
माध्यम बना लेती हूँ ..
मुझे समझने के प्रयास में
समय व्यर्थ ना करना..
कभी अग्नि हूँ, कभी वायु..
मात्र अनुभूत हो सकती हूँ ...
साथ यदि देना चाहो
तो स्वागत है,
अन्यथा मैं स्वयं के साथ
तो हूँ ही
व प्रसन्न भी हूँ ....

Friday, May 24, 2019

Yaadein

गर्मियों की रात में खुले आसमान के नीचे ,
अम्मा की गोद में परियों की कहानी सुनना ।
वो हर साल मुहर्रम, दशहरे के मेले में,
बाबा का शौक से मिठाइयाँ और खिलौने लाना।
वो बारिश के मौसम में छत से टपकती बूँदों को,
कटोरी में भरते-भरते उसको खेल बना जाना।
ठिठुरती हुई ठंड में कोयले की आग जलाकर ,
बार -बार उसमें आलू और बैंगन पकाते जाना।
कितने सारे किस्से हैं उस बचपन के आँगन के ,
कितनी सारी यादें हैं उस घर मिट्टी वाले के।
अम्मा की बातें, बाबा के गाने,
बुआ का दुपट्टा, चाचा के फ़साने।
सब कुछ बहुत याद आता है ,
वो मिट्टी वाला घर हमेशा याद आता है ।।

Tum chaho to. .

तुम चाहो तो ..
तुमको अपनी साँसें दे दूँ...
हर लम्हा कतरा-कतरा जीयूं तुमको,
जो तुम कह दो..
तुमको अपनी दिन और रातें दे दूँ...
नजरें मेरी बस तुमको देखे,
तुझमें अपनी दुनिया देखूँ,
कह कर देखो तो..
तुमको अपनी आँखें दे दूँ...
मेरी धड़कन पर नाम तुम्हारा हो,
दिल पर मेरे राज तुम्हारा हो,
जो तुम माँगो तो ..
तुमको अपनी बाँहें दे दूँ....
इश्क बन पल-पल तुम पर बरसूं मैं,
बन कर वफ़ा हरदम तुझमें धड़कूं मैं,
जो तुम चाहो तो ..
तुमको सारे वादें दे दूँ...
जो तुम चाहो तो ,
चाहत वाली सारी बातें दे दूँ...

Friday, May 17, 2019

संघर्ष

आँखें ढूँढ रही हैं मेरी ,
एक प्रकाश के दीप को ।
जो मुझसे रूठ गया,
खोज रही उस मीत को ।
साँसें हुईं अधीर सी ,
नैनों में अरमान पले ।
एक जागृत सपने की खातिर ,
लड़ती रही लकीर से ।
सहृदय प्रतीक्षा जिसकी, हे भगवन्!
पता दो मेरा उस जीत को।
मैं बावली; क्या जानूँ तुम्हारे नियम ,
एक बार, बस एक बार
मेरे पक्ष में कर दो तुम अपनी रीत को ।
मालूम है इतिहास मुझे,
समय रहा नहीं किसी के हाथ में ।
मिलता है वो ही बस जो होता है भाग्य में।
पर मन की तड़पन को कैसे मैं आराम दिलाऊँ?
सपनों में खोये हृदय पर कैसे विराम लगाऊँ?
विजय धुन सिखला दो मुझे,
गा सकूँ फिर उस गीत को ।
कुछ नहीं तो साहस ही प्रदान करो इतना ,
कर सकूँ पराजय मैं जीवन के हर पीर को ।।

Tujhko sochu to..

तुझको सोचूँ तो पल-पल सँवरती रहती हूँ ,
धीरे-धीरे, हौले-हौले महकती रहती हूँ ।
सारे कायनात की खूबसूरती मुझमें समा जाती है ,
तुझे सोच-सोच कर हिना सी निखरती रहती हूँ ।।

Kis bandhan me baandhu tumko

किस बंधन में बाँधूं तुमको,
किस भाव से तुमको थामूं ..
कि जुड़ जाऊँ तुमसे
मैं जन्मों-जन्म के लिए ...

ना हो कोई बेड़ी पाँव में,
ना देह पर जंजीरें हों...
तुम रहो, मैं होऊँ..
संग अपने बस प्रीत लिए ...

राधा बनाऊँ,वैदेही बनाऊँ..
या बनाऊँ स्वयं को गौरी...
दुर्गम राहों पर चल जाऊँ,
नयनों में तुम्हारी बस चाह लिए ...

किस लोक में जाऊँ संग तुम्हारे ,
संग तुम्हारे किस रंग में रंग जाऊँ...
कैसे भक्ति करूँ ईश्वर की,
कि हो जाऊँ तुम्हारी सदैव के लिए ...

Thursday, May 16, 2019

आदत

आदत सी हो गयी है ,
हर बार तेरी आँखों में ..
अपना चेहरा देखने की ...
हर रात नींद से उठकर ,
तुम्हारे लिए प्रार्थना करने की ..
सजदे में सिर झुका कर ,
प्रत्येक समय तुम्हारा नाम लेने की ..
आदत सी हो गयी है ,
प्रत्येक मधुर, प्रेम भरे गीतों में...
तुम्हें खोजते रहने की ..
अपनी प्रत्येक कविता में
तुम्हारा नाम छिपाते रहने की ...
आदत सी हो गयी है ,
अपने दृगों से बिन कारण
निर्झरिणी बहाते रहने की ..
बिन कारण मन-मस्तिष्क में
तुम्हें बसाये रखने की...
आदत सी हो गयी है ।।

Wednesday, May 15, 2019

Bas tera....❤

मेरी आँखों का ये आँसू पुकारे नाम बस तेरा,
मेरे दिल का धड़कना वो दिलाये याद बस तेरा ।
तेरी परछाइयों से पूछ कर तेरा पता आऊँ,
मेरा मंदिर,मेरा मस्जिद सभी घर-बार बस तेरा ।।
❤ ❤ 

Tuesday, May 14, 2019

इस धूप के सफ़र में

इस धूप के सफ़र में
फूलों सा बदन
कुम्हलाया जा रहा है मेरा ...
बाट जोह रही है आँखें
कुछ शीतल पवनों की ..
भरी दुपहरी चाकरी करते
जी अलसाया जा रहा है मेरा ...
#अनुश्री_श्री

Monday, May 13, 2019

अंजान रिश्ता


जुलाई का महीना था । मैं और मेरी माँ दिल्ली से हरियाणा जा रहे थे । हमें हरियाणा में धुरेहरा जाना था। रात के लगभग 8:30 बज गये थे। मेट्रो से उतरकर हम बस पर चढ़े। बस के चलने में आधा घंटा बाकी था। दिन भर की भाग दौड़ और भीषण गर्मी की वजह से माँ के सिर में दर्द शुरू हो चुका था और प्यास भी लगी थी। हम दोनों अकेले ही सफर कर रहे थे तो मैंने ही दवा और कुछ खाने-पीने का सामान लाने का निश्चय किया।
                 तभी आगे की सीट से एक लड़का खड़ा हुआ। शायद उसने हमारी बातें सुनी थीं। उसने माँ से कहा, "आपको जो सामान चाहिए, मैं ला दूं?" अंजान शहर और अंजान लोग होने की वजह से माँ घबरायी हुई थी । उसने शायद माँ की परेशानी को भाँप लिया। उसने कहा , "घर पर मेरी भी माँ है, आपके ही जैसी और वो जानती है कि मैं उसका विश्वास कभी नहीं तोड़ूंगा। उसके ही जैसे आप भी मुझ पर विश्वास कर सकती हैं।"  ये सुनकर ना जाने माँ के मन में क्या आया, उन्होंने मुझे उसके साथ भेज दिया, क्योंकि दवा भी लानी थी।
                  मैं थोड़ा सहमी हुई थी, पर धीरे-धीरे उस पर विश्वास हो रहा था । मुझे कंफर्ट फील कराने के लिए वो कुछ कुछ देर पर मुझसे बातें कर रहा था। उसका साथ मुझे पसंद आ रहा था। मैं चाहती थी कि उससे बातें करूँ,उसका नाम पूछुं; पर ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि मेरे होंठ सिल गये हों। बस उसे देखते रहना ही इतना सुकून दे रहा था कि कुछ और मुमकिन ही नहीं था।
                     वो ड्राइवर की दूसरी साइड वाली सीट पर बैठा था और हम उसके पीछे वाली सीट पर। अंजान शहर होने की वजह से माँ परेशान थी, वो यह समझ रहा था,  इसलिए समय -समय पर हमें बता रहा था कि अभी कितना टाइम है पहुँचने में। उसके सामने एक छोटा सा मिरर लगा था , जिससे मैं उसे लगातार देखी जा रही थी और वो भी रह-रह कर मुझे उस मिरर से देख रहा था । जब भी हम दोनों की नज़रें मिलतीं,वो मुझे बहुत अपना सा लगता ।ऐसा लगता कि मैं उसे सदियों से जानती हूँ । हम दोनों अजनबी थे पर उसकी आँखों में वो ही एहसास पढ़ पा रही थी, जो मेरे दिल में थे। उससे मिलने के बाद मेरी सारी थकन मिट चुकी थी।
                   बस में कोई हरियाणवी गाना बज रहा था,  अच्छी तरह मुझे समझ में तो नहीं आ रहा था  पर ऐसा लग रहा था कि हम दोनों के लिए ही बज रहा हो।
                   वो प्यार नहीं था,इश्क नहीं था। पता नहीं क्या था , पर जो भी था बहुत हसीन था। ना जाने किस डोर ने हमें बाँध लिया था । ना नाम पता था,ना पता; और जानने की कोई खास जिद भी नहीं थी। वो 2 घंटे का सफर मेरी जिंदगी का एक खुशनुमा सफर बन गया।
                 जब हम धुरेहरा में उतरे तो जिस तरह उसने मुझे देखा , ऐसा लगा कि मैं किसी बहुत खास से अलग हो रही हूँ । उसने मुझसे कहा, "बाय,टेक केयर, सी यू"। मैं उसे बस देखती रह गई । उसके जाने के थोड़े देर बाद जब मैंने उसके शब्दों को दुहराया तो आश्चर्यचकित रह गई । "सी यू"?? " हम फिर मिलेंगे क्या? ?"
                   खैर , अब तक तो नहीं मिले हम और शायद कभी मिल भी ना सकें। इसका कोई गिला भी नहीं वैसे तो क्योंकि वो अजनबी मेरे जीवन की किताब का एक छोटा सा अध्याय तो बन ही गया।।।
    
#श्री

Thursday, April 4, 2019

खुद में जान बहुत है

चलने को धरती कम नहीं,
उड़ने को आकाश बहुत है।
मंजिल अब इतनी भी दूर नहीं,
आँखों में ख्वाब बहुत है।
चलोगे सुबह तो सूरज की किरनें साथ होंगीं,
रातों में चाँद की चाँदनी साथ चलेगी ।
अमावस के अँधेरे की फिक्र करना नहीं,
प्रकाश करने को तो तारों की बारात बहुत है।
राहों में काँटे भी चुभते हैं,
फूलों की बरसात भी होती है ।
आँखों से आँसू भी निकलते हैं,
राहत की साँस भी होती है ।
हर पल एक सा मौसम हो सकता नहीं,
ऐसे में भी जीने का मजा बहुत है।
चलते-चलते थक जाना नहीं,
बढ़ते-बढ़ते रुक जाना नहीं,
राहों में मुश्किलें इतनी भी नहीं,
उनसे निपटने को खुद में जान बहुत है।।