कोई पैमाना
नहीं होता ,
जो माप सके
अंसुवन की
सीमा ...
जोर-जोर से
खिंचती
साँसों की
गतियाँ,
कंठ को
पिघलाती
भावपूर्ण
सिसकियाँ,
नयनों से निकल
गंगा बना दे जो
देह समेत आत्मा को;
उसकी गहराई
नापना
संभव नहीं होता ...
अपरिमित उद्वेग
उद्वेलित हो
जब छटकते हैं ,
बाण रूपी कष्ट
जब संपूर्ण बदन
को छलते हैं ,
उन घावों पर
कोई लेप
असर नहीं करता ..
कोई दर्पण
नहीं होता ,
जो दिखा सके
अंसुवन की पीड़ा ....
नहीं होता ,
जो माप सके
अंसुवन की
सीमा ...
जोर-जोर से
खिंचती
साँसों की
गतियाँ,
कंठ को
पिघलाती
भावपूर्ण
सिसकियाँ,
नयनों से निकल
गंगा बना दे जो
देह समेत आत्मा को;
उसकी गहराई
नापना
संभव नहीं होता ...
अपरिमित उद्वेग
उद्वेलित हो
जब छटकते हैं ,
बाण रूपी कष्ट
जब संपूर्ण बदन
को छलते हैं ,
उन घावों पर
कोई लेप
असर नहीं करता ..
कोई दर्पण
नहीं होता ,
जो दिखा सके
अंसुवन की पीड़ा ....




