Sunday, August 25, 2019

अंसुवन की पीड़ा

कोई पैमाना
नहीं होता ,
जो माप सके
अंसुवन की
सीमा ...
जोर-जोर से
खिंचती
साँसों की
गतियाँ,
कंठ को
पिघलाती
भावपूर्ण
सिसकियाँ,
नयनों से निकल
गंगा बना दे जो
देह समेत आत्मा को;
उसकी गहराई
नापना
संभव नहीं होता ...
अपरिमित उद्वेग
उद्वेलित हो
जब छटकते हैं ,
बाण रूपी कष्ट
जब संपूर्ण बदन
को छलते हैं ,
उन घावों पर
कोई लेप
असर नहीं करता ..
कोई दर्पण
नहीं होता ,
जो दिखा सके
अंसुवन की पीड़ा ....

Wednesday, August 21, 2019

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा ...
जैसे कोई उलझन
उलझे केश
सजाने की ,
व्याकुलता कोई
जैसे
अमरत्व पा लेने की ,
क्षण-क्षण
पावक को
अपना मन सौंपना ..
जैसे
बहती लहरों को
आँखों में भर लेना ।

प्रतीक्षा ...
भावों का आग्रह ,
हठता ..जैसे
चंद्र क्रीड़ की ,
धुंधलेपन में
जैसे
सौंदर्य निहार लेने की ,
पग-पग
राहों पर
अपने स्वप्न सींचना ..
जैसे
घनी निशा को
हौले से भोर कर लेना ।।

नदी किनारे बैठी मैं

नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ, खुद जल जाऊँ ।
वेग सहूँ फिर धार सहूँ  ..
उफान मचाती लय बन जाऊँ ।

उमड़-घुमड़ जो सरपट दौड़े ,
मेघ की प्यारी बरखा हूँ ..
मंदिर में जो सुगन्ध बहे ,
लोबान से उठती लपटा हूँ ..
एक फकीर की सूफी हूंँ मैं ,
किसी देह की रक्ता हूंँ ,
प्रिय की यादों में जकड़ी ,
अनुराधा हूँ, मैं मीरा हूँ ..
जीवन को ही प्रेम बनाकर
प्रीत में डूबी रस बन जाऊँ..
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ, खुद जल जाऊँ।।

चढ़ते यौवन की तरूणाई ,
मेरे मन से जोड़ करे ..
वाचाल,बिखरता चित्त मेरा
जब-तब बैठे योग करे..
परिक्रमा में उस योगी के,
सुफल मेरा हर चक्रण हो..
उसकी धुरी पर चलना ,
जैसे जीवन रक्षण हो..
निर्जन वन की यात्रा में
भ्रमणी यूँ ही बन जाऊँ..
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ,खुद जल जाऊँ ।।

छाया जब उस छलिये की
तन पर मेरे पड़ती है..
वर्ण बदलता,रूप निखरता
रात भी पूनम होती है ..
वात चले जब सौंधी सी
मुझ में वो बस 'बस' जाये..
मयूरी मोहक नृत्य-भंगिमा
काया पर मेरी रच रच जाये..
थकन भरी हर रजनी में
अँगड़ाई उसकी बन जाऊँ...
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ,खुद जल जाऊँ ।।।

Saturday, August 17, 2019

मैं लिखना चाहती हूँ

मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती मेरे अहसासों जितनी हों।
पन्नों को सजाना चाहती हूँ
इतने रंगों से,
जो जग निखारने के लिए काफ़ी हों ।
सूर्य से रोशनी लेकर,
चंद्र की शीतलता लेकर,
गंगा की निर्मलता लेकर,
धरती की सहनशीलता लेकर ,
मैं खुद को थोड़ा और बनाना चाहती हूँ ..
इतना थोड़ा कि
मेरी आँखें खुद को देखने के काबिल हों ।
मैं सोचना चाहती हूँ,
इतने सुन्दर विचार कि
मन निरर्थक सोच के लिए उपलब्ध ही न हो ।।

मैं बहकना चाहती हूँ
हर उस मोड़ पर
जब संसार मुझे अपने जैसा बनाना चाहता हो ...
मैं उड़ना चाहती हूँ,
बस इतना ऊँचा
जहाँ तक मेरे अपनों का साथ हो ।
बच्चों की मासूमियत लेकर,
चिड़ियों की चहचहाहट लेकर,
कवियों की तुकबंदी लेकर,
लेखकों की बुद्धिमानी लेकर ..
मैं खुद को थोड़ा और बनाना चाहती हूँ,
इतना थोड़ा कि
मेरे जीवन का कोई अध्याय अपराध ना हो ।।

मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती सुंदरता के पर्याय जितनी हो ।।
मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती मुहब्बत के पर्याय जितनी हो ।।

Thursday, August 15, 2019

रक्षाबंधन पर्व पवित्र काल सा

श्रावण मासीय पूर्णिम चंद्र ,
छटा समेटे परलोक ताल सा ।
रेशम-धागे का स्वर्णिम रूप ,
सैरन्ध्री-गोविन्द श्वेतानुराग सा ।।

वचनों का सीधा मौन कथन ,
यथ चीर द्रौपदी दीर्घकाय सा ।
द्युति बंधन का अति उजला ,
निशदिन उगते रवि-प्रात सा ।।

बंधु-बांधवी स्नेह मनोरम ,
कोकिल गुंजन मधुर तान सा ।
भ्रातृ-भगिनी युद्ध हासप्रद ,
पशु मुख गर्जन हास्य वाण सा ।।

कुटुंब के द्वि स्तंभी धरोहर ,
एक गौरव,एक भव्य मान सा ।
गृह की शोभा दोनों से ही ,
केंद्रित तत्र मोहित बाग सा ।।

एक सूत्र में बंध अटूट बँधा ,
आत्म संयोजित ईश आस सा ।
नेह कोटि-सहस्र युगों का ,
रक्षाबंधन पर्व पवित्र काल सा ।।।


Wednesday, August 14, 2019

भारत माता

बहे सुधा आँचल में तेरे,
नद वंदन तेरा किया करे,
मुख तेरा पावन क्षीर सा,
हिम शोभित ललाट किया करे ।

त्रि-दिशीय सागर खारे,
चरणों से तेरे निर्मल हों,
छूकर तेरे वस्त्र सुनहरे,
मही माँ हरित-लेप स्व किया करे ।

तुम संस्कृति, तुम संस्कार भी,
सभ्यता मनुज की तुम ही हो,
युगों-युगों की तुम रक्षक, माते !
कल्प निर्मण तुमसे निज किया करे ।

विश्व गुरु हम तुमसे ही हैं ,
तुम सौंदर्या खग-स्वर्णा हो ,
कर तेरे मनहर कुसुम उगे,
केश तुम्हारे अंध हर किया करे ।

नवीन वेश में कुछ तुम प्राची हो ,
जंजीरें तोड़ीं तुमने,तुम अवतारी हो,
दंश सहा वर्ष -वर्षों तक, माँ!
स्नेहोपचार सपूत अब किया करे ।

अंचल तेरे रक्त सुशोभित ,
वीरों ने तुमको उपहार दिये ,
वैभव अमर,कहानी उज्ज्वल ,
मन-तन अर्पित तुमको किया करे ।।।

Tuesday, August 13, 2019

अग्निपरीक्षा

कहो जानकी,जनकनंदिनी ;
दी तुमने क्यों अग्नि परीक्षा ?
अड़ जाती तुम, लड़ जाती तुम ..
सहती गई क्यों प्रत्येक समीक्षा ?

चुप्पी साधे सुनती थी,
नयनों में सिंधु गुनती थी,
तोड़ के बाँध दिखा देती,
विवेचन सारे झुठला देती,
क्यों झुक गई कहो मैथिली ?
करती गई क्यों मात्र प्रतीक्षा ?

हाँ,माना ...तुम बंदी थी,पर..
दोष तुम्हारा कुछ ना था,
लक्ष्मण-रेखा पार करी थी,
कृत्य कोई यह सज्जन था,
क्यों आरोपित तुम हुई सिया ?
तुम तो थी माँ पवित्र सुदीक्षा ....

क्यों ना कहा तभी रघुवर से..
"एकाकी क्यों चलूँ आग पे?"
यह क्या हुई भई रीत भला ..
प्रजा-प्रेम में विश्वास ढहा...
वियोग सहा था दोनों ने ही,
मात्र तुम्हीं को मिली उपेक्षा ...

सत्य यही तुम संस्कारी थी ,
पतिव्रता तुम, गुणवती नारी थी,
मर्यादा पुरुषोत्तम थे वे,क्यों
उन्हें उचित यह अध्याय लगा ?
क्यों ना बदल दिया नियति को ,
क्या थी इससे उन्हें अपेक्षा ?

आदिकाल की रीति वही ,
अब भी स्त्री को दहलाती है ..
अबोध कलयुगी पीढ़ी मैया,
रमणी को ही कूटे जाती है..
अज्ञान भरा हर कुएँ में,अब
करो आवंटित तुम माँ सुशिक्षा ....

Sunday, August 11, 2019

सरल नहीं है

सरल नहीं है
बुनना
मन के बिखरे
धागों को ....
हृदय पर पड़ी गाँठ
खोलना
कहाँ आसान ....
कितना दुरूह है
घावों की दवा से
पहचान कराना ....
कलम को
दर्द की स्याही में
डुबोकर
कृति सुसज्जित करना
कितना सुविध ....
कवि-मन ही
जानता है
ऊहापोह का स्तर ,
टूटे-बिखरे तिनके
जोड़कर
महल बनाने का मंतर ...
अश्रु को सागर
बनाने की कला
अन्य किसने जानी ,
किसने सीखा
मृत्युशैय्या पर
पुहुप उगाने का तंतर.....

Saturday, August 10, 2019

पवित्रता

पवित्रता ..
सिद्ध नहीं होती
कायाकल्प से,
रंग से,
मापदण्ड नहीं होते,
संरचना कोई
परिभाषित नहीं करती
पवित्रता को ...
नश्वर देह की
परिवर्तनशीलता
पवित्रता-निर्धारण
नहीं करती ।

मन की सौन्दर्यता,
स्वच्छता आत्मा की,
विचारों की उत्तमता ,
अहम् रहित भक्ति ,
गंगाजल समान
नेत्रनीर ..
पवित्रता के
उद्गम होते हैं ...
उच्चता प्राप्त करते
भाव ही
प्रकट करते हैं
पवित्रता ।।

Friday, August 2, 2019

सृजनता

सृजनता ..
सदा ही प्रिय होती है
सर्जक को ,
सृजनता के क्रम में
जीता है वह
प्रति क्षण को ,
प्रकृति से सभी मोह
अंजुरी में ले
भर लेता है
नयन संग हृदय में ,
सृजनता का
विकास
शनैः शनैः
विकसित करता है
सर्जक को भी ,
प्रहरी की भाँति
रक्षा करता है
सर्जक
सृजनता की ..
विपदाओं से बचाते
झोंक देता है
स्वयं को
सृजन की निगरानी में ,
सृजनता ..
चाहे शिशु हो ,पौध हो
या कोई लेख
सदा ही प्रिय होती है
सर्जक को ....