Saturday, August 17, 2019

मैं लिखना चाहती हूँ

मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती मेरे अहसासों जितनी हों।
पन्नों को सजाना चाहती हूँ
इतने रंगों से,
जो जग निखारने के लिए काफ़ी हों ।
सूर्य से रोशनी लेकर,
चंद्र की शीतलता लेकर,
गंगा की निर्मलता लेकर,
धरती की सहनशीलता लेकर ,
मैं खुद को थोड़ा और बनाना चाहती हूँ ..
इतना थोड़ा कि
मेरी आँखें खुद को देखने के काबिल हों ।
मैं सोचना चाहती हूँ,
इतने सुन्दर विचार कि
मन निरर्थक सोच के लिए उपलब्ध ही न हो ।।

मैं बहकना चाहती हूँ
हर उस मोड़ पर
जब संसार मुझे अपने जैसा बनाना चाहता हो ...
मैं उड़ना चाहती हूँ,
बस इतना ऊँचा
जहाँ तक मेरे अपनों का साथ हो ।
बच्चों की मासूमियत लेकर,
चिड़ियों की चहचहाहट लेकर,
कवियों की तुकबंदी लेकर,
लेखकों की बुद्धिमानी लेकर ..
मैं खुद को थोड़ा और बनाना चाहती हूँ,
इतना थोड़ा कि
मेरे जीवन का कोई अध्याय अपराध ना हो ।।

मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती सुंदरता के पर्याय जितनी हो ।।
मैं लिखना चाहती हूँ
इतनी पंक्तियाँ ,
जिनकी गिनती मुहब्बत के पर्याय जितनी हो ।।

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