प्रकृति ही आरंभ है, काल की वह प्रणेता ।
तेरे अपयश झेलती, किन्तु इति में विजेता ।।
जो बचाए स्व अग्नि से, ना तथा छत्र-छाया ।
कंट तुझे तेरा चुभे , है यही कर्म-माया ।।
तुमको ढोती कुक्षि में, भोग उदर का देती ।
दंड तेरे कुकर्म का, है निज कर पे लेती ।।
मात के शुद्ध प्रेम का, ना तुम्हें बोध कोई ।
अब जो ज्वाला हो गई, अकारण शोध कोई ।।
गौरी है जब शांत है, रौद्र किन्तु शिव सी है।
प्रलय जटा में रोकती, तांडव प्रचंड सी है।।
क्रोड़ भरे आशीष से, संपदा कुल लुटाए।
क्षरण देख निज देह का, धैर्य कब तक बनाए?
लेती है प्रतिशोध तो, डोलता हिय समूचा ।
आज धराशायी हुआ, तुम्हारा गर्व ऊँचा ।।
जिसे रहे तुम रौंदते, दैव्यता को भुलाए ।
तेरे द्वारे आ खड़ी, रक्त चख में समाए ।।
समय अभी भी शेष है, तज स्पृहा अहंकारी ।
मनुज! दैत्य तुम ना बनो, तुम्हीं से सृष्टि सारी ।।
ना कोई हो व्यग्रता, अब करो कर्म ऐसा ।
झूमे प्रकृति मोद में, नित करो पुण्य ऐसा ।।
(मुक्तामणि छंद)
तेरे अपयश झेलती, किन्तु इति में विजेता ।।
जो बचाए स्व अग्नि से, ना तथा छत्र-छाया ।
कंट तुझे तेरा चुभे , है यही कर्म-माया ।।
तुमको ढोती कुक्षि में, भोग उदर का देती ।
दंड तेरे कुकर्म का, है निज कर पे लेती ।।
मात के शुद्ध प्रेम का, ना तुम्हें बोध कोई ।
अब जो ज्वाला हो गई, अकारण शोध कोई ।।
गौरी है जब शांत है, रौद्र किन्तु शिव सी है।
प्रलय जटा में रोकती, तांडव प्रचंड सी है।।
क्रोड़ भरे आशीष से, संपदा कुल लुटाए।
क्षरण देख निज देह का, धैर्य कब तक बनाए?
लेती है प्रतिशोध तो, डोलता हिय समूचा ।
आज धराशायी हुआ, तुम्हारा गर्व ऊँचा ।।
जिसे रहे तुम रौंदते, दैव्यता को भुलाए ।
तेरे द्वारे आ खड़ी, रक्त चख में समाए ।।
समय अभी भी शेष है, तज स्पृहा अहंकारी ।
मनुज! दैत्य तुम ना बनो, तुम्हीं से सृष्टि सारी ।।
ना कोई हो व्यग्रता, अब करो कर्म ऐसा ।
झूमे प्रकृति मोद में, नित करो पुण्य ऐसा ।।
(मुक्तामणि छंद)






