Sunday, May 31, 2020

प्रकृति

प्रकृति ही आरंभ है, काल की वह प्रणेता ।
तेरे अपयश झेलती, किन्तु इति में विजेता ।।
जो बचाए स्व अग्नि से, ना तथा छत्र-छाया ।
कंट तुझे तेरा चुभे , है यही कर्म-माया ।।

तुमको ढोती कुक्षि में, भोग उदर का देती ।
दंड तेरे कुकर्म का, है निज कर पे लेती ।।
मात के शुद्ध प्रेम का, ना तुम्हें बोध कोई ।
अब जो ज्वाला हो गई, अकारण शोध कोई ।।

गौरी है जब शांत है, रौद्र किन्तु शिव सी है।
प्रलय जटा में रोकती, तांडव प्रचंड सी है।।
क्रोड़ भरे आशीष से, संपदा कुल लुटाए।
क्षरण देख निज देह का, धैर्य कब तक बनाए?

लेती है प्रतिशोध तो, डोलता हिय समूचा ।
आज धराशायी हुआ, तुम्हारा गर्व ऊँचा ।।
जिसे रहे तुम रौंदते, दैव्यता को भुलाए ।
तेरे द्वारे आ खड़ी, रक्त चख में समाए ।।

समय अभी भी शेष है, तज स्पृहा अहंकारी ।
मनुज! दैत्य तुम ना बनो, तुम्हीं से सृष्टि सारी ।।
ना कोई हो व्यग्रता, अब करो कर्म ऐसा ।
झूमे प्रकृति मोद में, नित करो पुण्य ऐसा ।।
(मुक्तामणि छंद)



Saturday, May 23, 2020

पदपादाकुलक छंद

कटि पर पीत वसन लिपटाए ,
श्यामल तन पर धूलि चढ़ाए ।
मोती सा रद उसका दमके ,
माणिक जैसे श्रुतिपट चमके ।

माखन छू पीयूष बनाए ,
गोकुल गलियाँ त्रिदिव बनाए ।
यमुना तट बंशी धुन बुनता ,
कान्हा में गोपी-हृदि घुलता।

पाटल-गुंचा सी स्मिति उसकी,
मोहे नटखट प्रतिमा जिसकी ।
छल भी उसका मन को भाए ,
छलिया छल कर औषधि लाए ।





Friday, May 22, 2020

मालती सवैया छंद

१--
धूमिल दर्पण माँगत दर्शन,रोवत नैनन में रज लेके ।
टूट कहीं चट से चटके वह, हारत ना हमरे गुण लेके ।
अश्रु भरे दृग पे मल अंजन, गात करो नम चंदन लेके ।
लेप लगा हृदि पे अब प्रीतम, आ बस दर्पण में छवि लेके ।

२--
देख लिया तुझमें जग पूरण,हो तुम जीवन-आँगन मेरे ।
बंदन शेखर का तुमसे घन, हाँ प्रिय हो तुम आँचल मेरे ।
मोद तुम्हीं तुम से दुख आवत, प्रेयस रीति तुम्हीं पिय मेरे ।
थाम मुझे कर दो सरला तुम, मैं मन हो तुम आतम मेरे ।

३--
देख पिया मुख चंचल भावक,भूल गयी सब लाजन मैं तो ।
चूम लिया दृग से चख-मस्तक, डेढ़ गुनी मनभावन मैं तो ।
थाम उसे अपने पलकों पर , बंद करी सब पाटन मैं तो ।
नेह भरे उपमा बनते क्षण, प्रेम पगी सहभागन मैं तो ।।

४--
चारु कपोल भए मनमोहक, दीठ तुम्हें नित साँझ बुलाती ।
केश हुए बदरा जस गाझिन, मैं कर पे पिय नाम गुदाती ।
अंग भरे जिन भी लय से यह, वे सब मोहित गीत बनाती ।
अर्पण है नव यौवन वल्लभ, स्वेद-पिया अब माँग सजाती ।

५--
प्रीतम-बालम-मोहन-साजन, दीपक हो तुम मैं इक बाती ।
मंदिर के तुम हो प्रभु मूरत ,मैं तुम पे यह प्राण लुटाती।
श्लोक गढ़े तुम पे बड़ सुंदर, जो व्रत धार सुहागिन गाती ।
प्रेमिल राग सिखावत हो तुम, मैं हिय के सब गान सुनाती ।।


Saturday, May 16, 2020

बिछोह से ही सजाते हैं

समर्पण के सभी नियम, यूँ चल हम तक ही आते हैं ।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।

नहीं संवाद की गुत्थी, नहीं मौनों में वरमाला ।
नहीं ध्वनि का है आडम्बर,न गीतों पर लगा ताला ।
वचन का कोई बंधन ना, वचन फिर भी निभाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।१।।

दो रेखाएँ जो संग चलतीं, किन्तु जुड़ नहीं पातीं ।
जटिलताएँ दो पन्नों की, कभी क्यों नप नहीं पातीं ।
प्रिया के प्रश्न हैं दुष्कर, ना ज्योतिष भी बताते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।२।।

संकेतों से बने हैं क्षण, शाश्वत वो ही तो क्षण हैं ।
नवांकुर हम नहीं कोई, बलिष्ठ द्रुम का अचर कण हैं ।
ना कहते प्रेम है आधा, इसे अपार बनाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं‌‌ ।।३।।

क्या होगी स्पर्श की इच्छा, दो तन एक हो गए हैं ।
भाग्यों ने लिखा जो ना, वो प्रेमालेख हो गए हैं ।
हुई ना दीठ से क्रीड़ा, तो स्वप्नों में बुलाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।४।।

बनाया प्रेम का एक घर, वहीं निर्वाण भी होगा ।
मृदा में घुल के, अनगिन प्रेम का निर्माण फिर होगा ।
कथन इस लोक का जो ना,वही विश्व को सुनाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।५।।


Friday, May 15, 2020

माँ संतोषी वंदना


तेरी कृपा पे भक्त आश्रित, पीर तुम हो टालती ।
संतोष उर में ढाल के माँ, भाग्य में हो जागती ।।
मुखड़ा सुमन सा खिलखिलाता, देह तरु के पात सा ।
अंचल मधुर प्रभुभोज सा है, कंकणा धुन सात सा ।।

भद्रा तुम्हारी है दुलारी, प्रिय तुम्हें गुड़ औ चना ।
हरती नयन के नीर को तुम, शोक चाहे हो घना ।।
तुम हो सरल सी उत्तरों सी, प्रश्न तुमसे हल हुआ ।
तेरे चरण पड़ के मईया, अश्रु गंगाजल हुआ ।।

संतोष है तेरी कथा में, प्रेम है आधार में ।
ममता झलकती मूर्तियों में, प्रीत है उस सार में ।।
सारा जगत द्युतिहीन हो माँ, यदि रहो ना तुम यहाँ ।
ऊसर धरा पर पुष्प जन्में, पग तुम्हारे हों जहाँ ।।

मैं पीड़िता हारी जगत में, तुम मुझे संवारती ।
संताप के क्षण में सुभग माँ, है तुम्हारी आरती ।।
हो साक्ष्य तुम मेरे हृदय की, रोम में तुम हो बसी ।
होता कभी जो अंध जीवन, तुम हुई माँ भोर सी ।।

व्रत है तुम्हारा अमृता सा, दूर करता शोक को ।
छाया असित मन से मिटा के, भेजता आलोक को ।।
हूँ मैं तुम्हारी प्रेम-भक्तिन, दो चरण में स्थान माँ ।
ऐसे करूँ मैं कर्म जग में, हो तुम्हें अभिमान माँ ।।

Thursday, May 7, 2020

समर वसुधा की तप्तता में

समर वसुधा की तप्तता में, भले किये हों तुमने द्वंद्व ।
बैठ द्वार की उष्ण छाँव में, सहती थी मैं अंतर्द्वंद्व ।।

गोली खाई जब भी तुमने, ढोया छाती पर अंगार ।
सौंदर्य निखर कर आया त्यों, सत्रहवाँ मेरा शृंगार ।।

उजड़ गई मस्तक की लाली,हुए अवर्णे कक्ष-कपाट ।
विधवा बन भी पूर्ण सुहागन, मुखड़ा मेरा रहा सपाट ।।

तेरे विजय की सुगाथा में,हुआ समर्पित है सिंदूर ।
करने अमर तेरे गात्र को, हुआ अश्रु भी मुझसे दूर ।।

तुम्हें देखकर तीन रंग में, हावी पीड़ा पर अभिमान ।
छीन लिये सब गहने तुमने, दिया अमूल्य उच्च सम्मान ।।

हुई ओढ़नी वर्ण विहीना, पायल ने खोयी झंकार ।
गौण हैं सूचक समृध्दि के, प्रधान जन-गण-मन टंकार ।।

छोड़ अकेली यशोधरा को, देकर नन्हें से उपहार ।
चले गए तुम बुद्ध मार्ग पर, खोजने राष्ट्र में परिवार ।।

दर्पण में दिखती छवि तेरी, भौंहों मध्य तेरा प्रताप ।
लक्ष्मीबाई सा हिय मेरा, ना करने देता संताप ।।

अनुगामिन बनकर तेरी मैं, पाऊँ तुमसा ही प्रतिरूप ।
रख जीवित सर्वदा स्वयं में, बनूँ प्रेम का तेरे रूप ।।

समाधि स्थल पर जाकर प्रियवर,दे आऊँ तुम्हें प्रेम पत्र।
प्रति निशा सुहागन बन तेरी,आत्म पर वारूँ आत्म छत्र ।।


Saturday, May 2, 2020

सीता जयंती

वैशाख मास शुक्ला नवमी, पुष्य का मध्य काल ।
भूमिजा वह सीता सुवर्णी, बनीं जनक का भाल ।।

लघु नूपुर के झंकृत लय से, हुआ भवन कल्याण ।
मधुरिम स्वर की शुभ गूँजों से, भरीं भीत में प्राण ।।

शनैः-शनैः तरुणाई छायी, मुख पर उगता तेज ।
काया जस पावन मधुबन सी, सुरभित कलिका सेज ।।

स्वयंवर की वह धनु परीक्षा, सफल हुए श्रीराम ।
गठबंधित विष्णु-श्री धरा पे, सिय आयीं प्रभु धाम ।।

सुहागरात्रि की अवधि छोटी, खोईं स्वर्णिम हार ।
अर्द्धांगी बन त्यागीं विभवा, स्वीकारीं वन-भार ।।

प्रिय सह भोगी पीड़ा नारी, रचा प्रेम अध्याय ।
निश्छल हो जो प्रिया हृदय से, सीता-कण कहलाय ।।

ना धुंधलाई पीर रेखा, मिला अन्य आघात ।
छल से रावण सियहरण किया,चले भयंकर वात ।।

भींगे कानन नेत्रनीर से,जलमय तीनों लोक ।
अर्द्ध तन ले प्रिय खोजें प्रिया, दिखे देह में शोक ।।

पता लगा ज्यों वैदेही का, लंक चले श्रीराम ।
किया पराजित रावण को त्यों,लाये सिय को थाम ‌।।

पूर्ण हुआ काल वनवास का ,हुई अवध में भोर ।
रघुवर बने अवध के राजा,पर भींगे दृग छोर ।।

चलीं जानकी पुनः विटप में, लिये गर्भ में बीज ।
अश्रु अनगिन,अनंतम पीड़ा, ना मिले सुखद तीज ।।

हाय! कैसी थी नियति उनकी, सदैव सहा बिछोह ।
धर्म निभाते हृदि को छीला, त्यागा सुख का मोह ।।

लिये जन्म लव-कुश कुटिया में,मिले महा संस्कार ।
सिय ने मूरत ऐसी गढ़ दी, रघुवंशी आकार ।।

सौंप पुत्रों को पितु छाँव में, इच्छित कीं निर्वाण ।
जिस भू से उपजीं थीं सीता, माँगीं उनसे त्राण ।।

बन गयीं वह प्रेम परिभाषा,बनीं प्रीत आधार ।
कर्म-धर्म में सिय विजित हुईं, किया जन्म साकार ।।