Friday, October 25, 2019

मन में भी मेरा दीप जलाओ

आओ कभी तो सिरहाने तो बैठो,
मृतप्राय देह की आयु बढ़ाओ ।

चूमो हृदय को हृदय से तो अपने,
श्वेतार्क सा बंधन श्वेत बनाओ ।

ठहर जाऊँ आकर के आँगन में तेरे,
वहीं संग में मेरे जन्में बिताओ ।

समर्पित तुम्हीं पर हों सौभाग्य सारे ,
मुझ पर तुम अर्पित अश्रु कराओ ।

सदियों में ऐसा कभी ना हुआ जो,
ईश्वर सी गाथा कोई सजाओ ।

मैं लिखूँ तुम्हें ही प्रतिदिन क्षितिज पर,
वहीं से वो गीतें सभी को सुनाओ ।

उजियारे सदा ही हों जीवन में तेरे ,
मन में भी मेरा दीप जलाओ ।


Monday, October 21, 2019

ये रूप, श्रृंगार ..

ये रूप, श्रृंगार, अदायें निराली,
तुम से हैं जानां, तुम्हीं पे लुटाना ।

देखूँ मैं दर्पण,तुम्हीं तुम दिखे हो ,
नयनों से अपने मुझे तुम सजाना ।

मैं प्रश्नों भरी इक गहरी नदी हूँ ,
तुम उत्तर हो मेरा, मुझमें समाना ।

प्रेम की गलियाँ अग्नि सी तपतीं ,
तुम मुझमें पिघलकर उबटन लगाना ।

प्रीति की रीति कठिन तो बहुत है ,
तुमसे है निभना, तुम्हीं को निभाना ।

मैं पूजूं तुम्हें एक जोगन की भाँति ,
बनकर के ईश्वर, मुझे तप बनाना ।

आये कभी जो विदाई की बेला ,
तुममें है छिपना, तुम्हीं को छिपाना ।


Wednesday, October 16, 2019

तुम्हारा ख्याल

तुम्हारा ख्याल ...
तुम्हारा ख्याल सूरज की किरनों संग आता है ,
और तारों की छाँव तक साथ निभाता है ।

सुबह उठने पर जो पहली स्पष्ट
तस्वीर होती है न आँखों में,
वो तुम्हारी होती है ।
और नींद आने से पहले जो जरूरी बातें
करनी होतीं हैं खुद से ,
वो भी तुम्हारी होतीं हैं।

तुम्हारे एहसास  मुझसे बँध से गये हैं ,
बिल्कुल वैसे ही जैसे ...
मन्नतों वाले धागे पेड़ों से बँधे होते हैं।

अब तो मेरा दुपट्टा भी तुम्हें बुलाता है ,
उसको भी इंतजार है कि कब
तुम पीछे से आकर अपनी उंगलियों में
उसे दबा लो ।

मेरी कलम तो पहले ही तुम्हारी हो चुकी है ,
जब भी लिखती है तुम्हें ही लिखती है ।
उसे भी बेपनाह मुहब्बत है तुमसे ।

मेरी आँखें तो इतराती हैं खुद पर
क्योंकि उनमें चेहरा जो तुम्हारा होता है ,
सपने भी तुम्हारे रहते हैं। और आँसू...
आँसू भी तुम्हारे ही नाम के होते हैं।

मैं अपनी जुल्फें अक्सर बाँध कर ही रखती हूँ ,
क्योंकि जब-जब ये खुलते हैं
तुम्हारी शरारतें याद आतीं हैं ।
याद आतीं हैं वो बातें कि
खुले बालों में मैं तुम्हें अच्छी लगा करती थी ।
मेरी एक उंगली से अपने बालों को कान के पीछे करना
तुम्हें घायल कर जाता था ।

मेरे पास ऐसी अनगिनत यादें हैं ,
जो हर दिन मेरी मुहब्बत को फिर से नया कर जातीं हैं ।
हर रोज फिर से मुहब्बत करने का कारण दे जातीं हैं ।

पर मेरे होंठ अक्सर रूठे से रहते हैं मुझसे ,
उन्हें कभी इजाजत नहीं दी न मैंने
तुम्हारा नाम लेने की ।
उनके हिस्से तो बस मुस्कुराहट ही आयी है,
जो तुम्हारे कारण और भी मासूम हो जाती है ।

अब तो आदत सी हो गयी है तुम्हें सोचने की ,
ना सोचूं तो कुछ अधूरा सा लगता है ।
हर पल मुझे खूबसूरत और हसीन बना जाते हैं,
तुम्हारे ख्याल .....
©अनुश्री 'श्री'✍️


Monday, October 14, 2019

तुम ही जग बन जाओ न

सीने में तेरे छिपना है ,
स्थान कोई बनाओ न ।
जग से मन ये दुखता है ,
तुम ही जग बन जाओ न ।

पिघले चंदा बदन पर मेरे ,
मैं तेरे बदन को तड़पूं ।
तकना चाहे प्रभा मुझे ,
मैं तेरे दरस को तरसूं ।
सुमन सुगन्धित हो मुझसे ,
पर मैं तेरे स्वेद से महकूं ।
हूँ मैं शीतल वायु जैसी,पर
जब-तब तेरे विरह में दहकूं ।
जनम-जनम से प्यासी हूँ,
सुरभोग प्रीत का लाओ न ।
जग से मन ये दुखता है ,
तुम ही जग बन जाओ न ।।

हाथों पर जब तुम हाथ रखो ,
प्रेमी घाटी में खो जाऊँ ।
उंगली में हो फँसी उंगलियाँ ,
काँधे पर तेरे सो जाऊँ ।
जीवन-चक्र पर बढ़ते-बढ़ते ,
प्रेम गली में रुक जाऊँ ।
उम्र बिता दूँ तुझमें ही बस ,
साँसों में तेरे थम जाऊँ ।
तुझ संग पल-पल मरना है ,
जीवन तुम्हीं हराओ न ।
जग से मन ये दुखता है ,
तुम ही जग बन जाओ न ।।।


Thursday, October 10, 2019

यक्ष-परीक्षा

कठिनाइयाँ सारी
धर जब छद्म-वेश
आयेंगी तुमसे पूछने
अर्थ प्रेम का ,
तब रख लेना
तुम धैर्य थोड़ा ,
होगी ये तुम्हारी
यक्ष-परीक्षा ।
भाँति-भाँति के प्रश्न होंगे ,
तुम सभी का उत्तर
सावधानी से देना ।
एक लुभावनी सी
झील होगी ,
जिसके दूसरी ओर होगा
तुम्हारा प्रेमी-जीवन ।
प्यास की चिंता किए बिना
मात्र लक्ष्य याद रखना ।
स्मरण रहे ,
युद्ध-काल का अंतिम समय ही
अधिक बलवान होता है ;
एक चूक कर देगी तुम्हें
प्रेम -विहीन ।
पा तो जाओगे
चमकता मीठा जल ,
परंतु
नष्ट कर देगा ये तुम्हारे
वास्तविक प्रेम के अस्तित्व को ।

Monday, October 7, 2019

पीड़ा सारी सिमट के मन की

पीड़ा सारी सिमट के मन की ,
क्षण पर भारी होती है ।
मन पर उगते कृशानु विटप ,
घाव की धारी होती है ।

मेघों पर बनते चित्र अपरिचित ,
नभ-अंधियारे कहाँ हैं छँटते ।
छवि स्वयं की धुंध सी लगती ,
आकार संयमित कहाँ हैं लगते ।
बरसे मन तो तन-मन पर,
घनघोर सी आँधी होती है ।
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।

खिंचता है प्रति रोम देह का,
धमनी भी कट-कट कटती है ।
प्राणों की रेखा बाधित सी ,
श्वासें भी तप-तप तपती हैं ।
जीवन के गूढ़ से सागर में,
बड़वाग्नि दशा सी होती है ।
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।

होते हैं कुछ अशांत से सरवर,
लहरें प्रचंड उत्पात मचाती हैं ।
ना कोई श्रोता,ना कोई दर्शक,
मुख बाण ही भेदी जाती है ।
फूलों की सी सेज ही सहसा ,
क्यों कंट विधा सी होती है ?
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।


Thursday, October 3, 2019

ना होता जो प्रेम यदि...

ना होता जो
प्रेम यदि ,
मैं भी शायद
ना होती ।
मधुर-मधुर संबंध
ना होते ,
'श्री' भी कायम
ना होती ।
क्या रचती मैं
पन्नों में,
कलम सुनहरी
क्या करती ,
ना होती जो
भाव की गंगा,
आँखों से मेरे
क्या बहती...
ना होता जो
प्रेम यदि ,
मैं भी शायद
ना होती।।

शबरी के मुख
लग कर के ,
बेर जो मीठे
ना होते ।
भगीरथ के
तप से जो ,
गंगा में जल-कण
ना होते ।
उस शून्य में
जलता दीप यदि
जग में ज्योत्
जो ना भरता ।
महादेव व गौरी का
प्रेम
जो शाश्वत
ना होता ।
रह जाता एक
पिंड खोखला ,
धरा सुनहरी
ना होती ।
ना होता जो
प्रेम यदि,
मैं भी शायद
ना होती ।।

बिना प्रेम के
जीवन कैसा,
तन पर मेरे
प्रेम ही बसता ।
कोटि-कोटि हों
पीर भले ही ,
मन पर मेरे
प्रेम ही रमता ।
प्रेम में देना
ना कुछ पाना ,
यही हृदय की
भक्ति है ।
ना पाऊँ
ऐश्वर्य भले ही ,
प्रेम ही सच्ची
शक्ति है ।
ना होता जो
कष्ट कोई ,
खुशियाँ सुखकर
ना होतीं ।
ना होता जो
प्रेम यदि,
मैं भी शायद
ना होती ।।।