मेरी कविताएँ
संतति हैं मेरी ।
मुझ जैसी ही
मौन, किन्तु
शब्दों के सागर में
गोते लगाती ।
कभी लहरों सी चंचल,
कभी किनारे सी गंभीर ।
कभी खिलखिलाती
बेपरवाह बच्चे सी,
कभी मापती
प्रौढ़ता की इकाई।
कभी हो जाती है
सरल,सहज
माँ के ममतामयी
आँचल जैसी।
क्षण में ही
जटिल होती
अभिमन्यु के व्यूह सी ।
कभी अग्नि,कभी नीर,
कभी वायु, कभी वेग,
कभी सँवरती,कभी ढुलकती,
कभी मचलती,कभी बरसती।
कभी नयी-नवेली
दुल्हन के घूंघटे जैसी,
कभी मौसम के
बदलते तेवर जैसी।
कुल मिलाकर
मेरा प्रतिरूप,
मेरा प्रतिबिंब हैं
मेरी कविताएँ!!
संतति हैं मेरी ।
मुझ जैसी ही
मौन, किन्तु
शब्दों के सागर में
गोते लगाती ।
कभी लहरों सी चंचल,
कभी किनारे सी गंभीर ।
कभी खिलखिलाती
बेपरवाह बच्चे सी,
कभी मापती
प्रौढ़ता की इकाई।
कभी हो जाती है
सरल,सहज
माँ के ममतामयी
आँचल जैसी।
क्षण में ही
जटिल होती
अभिमन्यु के व्यूह सी ।
कभी अग्नि,कभी नीर,
कभी वायु, कभी वेग,
कभी सँवरती,कभी ढुलकती,
कभी मचलती,कभी बरसती।
कभी नयी-नवेली
दुल्हन के घूंघटे जैसी,
कभी मौसम के
बदलते तेवर जैसी।
कुल मिलाकर
मेरा प्रतिरूप,
मेरा प्रतिबिंब हैं
मेरी कविताएँ!!

