Sunday, December 29, 2019

मेरी कविताएँ

मेरी कविताएँ
संतति हैं मेरी ।
मुझ जैसी ही
मौन, किन्तु
शब्दों के सागर में
गोते लगाती ।
कभी लहरों सी चंचल,
कभी किनारे सी गंभीर ।
कभी खिलखिलाती
बेपरवाह बच्चे सी,
कभी मापती
प्रौढ़ता की इकाई।
कभी हो जाती है
सरल,सहज
माँ के ममतामयी
आँचल जैसी।
क्षण में ही
जटिल होती
अभिमन्यु के व्यूह सी ।
कभी अग्नि,कभी नीर,
कभी वायु, कभी वेग,
कभी सँवरती,कभी ढुलकती,
कभी मचलती,कभी बरसती।
कभी नयी-नवेली
दुल्हन के घूंघटे जैसी,
कभी मौसम के
बदलते तेवर जैसी।
कुल मिलाकर
मेरा प्रतिरूप,
मेरा प्रतिबिंब हैं
मेरी कविताएँ!!

Friday, December 20, 2019

स्मित रेखा रूठी मुझसे

स्मित रेखा रूठी मुझसे,
नयनों के शृंगार भी रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।

छमछम करतीं नुपूर ध्वनियाँ
देखो कैसे मौन हुईं हैं,
बालपने की सारी गतियाँ
अभी अभी ही प्रौढ़ हुईं हैं।
खो गईं सारी चंचल बातें
उलझी थीं जो परी-कथा में,
हँसतीं गातीं हास्य पंक्तियाँ
जाने कैसे रौद्र हुईं हैं।
गालों की है लाली रूठी,
मस्तक के तो भाग्य भी रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।।

ले आओ यदि थोड़ी प्रीति
अपना भी शृंगार करूँ,
छलनी मन पर धीरे-धीरे
औषध तेरा मान करूँ ।
विधि ने लिखी पीर यदि तो
कर दो उनका विनिमय तुम,
तुमसे जुड़कर जीवन के
स्वप्न सभी साकार करूँ ।
अभी तो सारी बस्ती रूठी,
'श्री' से सब उल्लास हैं रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।।

Wednesday, December 18, 2019

प्रेम-प्रस्ताव

जब भी मिला
प्रेम-प्रस्ताव मुझे,
विश्वास दिलाया गया
कि मैं जग की
विशिष्टतम् स्त्री हूँ!
मुझसा सौंदर्य,
मुझसा तेज,
मुझसा गुण,
मुझसा शील,
अन्य किसी में नहीं !
मानो मुझे पाकर
कोई पुरुष
ऐसे धन्य हो जाये
जैसे ईश-बोध मिले
ध्यान-मग्न संत को !
वस्तुतः ये मात्र
आकर्षक लहरों
के समान थे,
जो उस संबंध में
समा जाने,डूब जाने को
प्रेरित करते थे
व जैसे ही
प्रारंभ किया मैंने
डूबना वहाँ,
अहसास दिलाया गया मुझे
कि ये छलित शब्दों से इतर
कुछ भी नहीं !
संसार की अनगिनत
साधारण स्त्रियों से भिन्न
मेरा कोई अस्तित्व नहीं,
किसी भी प्रकार
मैं विशेष नहीं !
फिर तैरती रही मैं
किसी शव समान
उन्हीं लहरों पर,
अगला प्रेम-प्रस्ताव
आने तक व
चलती रही
यह प्रक्रिया अनवरत !
जब तक ना मिल गया
क्षयी वपु को
अनैच्छिक निर्वाण !!