Friday, December 20, 2019

स्मित रेखा रूठी मुझसे

स्मित रेखा रूठी मुझसे,
नयनों के शृंगार भी रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।

छमछम करतीं नुपूर ध्वनियाँ
देखो कैसे मौन हुईं हैं,
बालपने की सारी गतियाँ
अभी अभी ही प्रौढ़ हुईं हैं।
खो गईं सारी चंचल बातें
उलझी थीं जो परी-कथा में,
हँसतीं गातीं हास्य पंक्तियाँ
जाने कैसे रौद्र हुईं हैं।
गालों की है लाली रूठी,
मस्तक के तो भाग्य भी रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।।

ले आओ यदि थोड़ी प्रीति
अपना भी शृंगार करूँ,
छलनी मन पर धीरे-धीरे
औषध तेरा मान करूँ ।
विधि ने लिखी पीर यदि तो
कर दो उनका विनिमय तुम,
तुमसे जुड़कर जीवन के
स्वप्न सभी साकार करूँ ।
अभी तो सारी बस्ती रूठी,
'श्री' से सब उल्लास हैं रूठे ।
हर्षित नभ में जलते सारे,
ऋक्षों के प्रति भाग भी रूठे ।।

2 comments:

  1. अद्भुत रचना रस कवियत्री❤️❤️❤️❤️...
    वागेश्वरी का आशीर्वाद तुम पर सदैव बना रहे

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