Sunday, July 12, 2020

महादेव को समर्पित (हरिगीतिका छंद)

गंगा जटा में थाम कर के,शिव प्रलय को रोकते ।
भरते शिरा में रक्त का कण ,प्राण वह ही सोखते ।।
आरंभ उनसे है धरा का, शब्द अंतिम वह हुए ।
विष को उतारे कंठ में हैं, घट सुधा का भी हुए ।।

नंदी विराजे सामने हैं, सर्प ग्रीवा पर दिखे ।
काया भभूतों से रँगी है, हस्त में डमरू रहे ।।
नाचे त्रिशूल लिये हुए ही, ध्यान में योगी हुए।
क्षण में मिले संतोष उनको, रुष्ट भी क्षण में हुए ।।

वह ही स्वयं हैं प्रेम शाला, अक्षरों में भी बसे ।
जग के प्रथम प्रेमी-वियोगी, प्रेम की भाषा रचे ।।
की है प्रतीक्षा युग-युगों तक,पीर में कितना जले ।
पाकर पुनः अपनी प्रिया को, रुद्र से भोले बने ।।

उपवास श्रावण का फलित है, शिव सजाते भाग्य हैं ।
देते उसे संयोग का वर , जो यहाँ वैराग्य है ।।
संन्यास में जिसका रमा मन, स्थिर हिया उसको मिला ।
माँगा शिवम से जो निलय सुख, वह हरित जीवन जिया ।।

हूँ पूजती उनको हृदय से, वह हृदय को शिव किये ।
हूँ बोलती शिव शिव सदा ही, बोल को शिव शिव किये ।।
आराधना उनकी करूँ अब, श्वास को भी तोड़ के ।
उनके चरण में धाम माँगूं , अंजुरी को जोड़ के ।।
©अनुश्री 'श्री'✍️


Saturday, June 20, 2020

पिता (हरिगीतिका छंद)

जीवन सुघर है छंद सा यह, शिल्प पक्ष हुए पिता ।
भूले दिखाना भाव तो भी, भावना लगते पिता ।।
संजीवनी सा अर्थ लेकर, वैद्य रूपी हैं पिता ।
नभ से वृहद कुछ है कहीं तो, मात्र वह जग में पिता ।।

आधार तरु का हैं स्वयं ही, शीर्ष भी बनते पिता ।
गृह नींव उनसे पुष्ट होती, छत्र भी लगते पिता ।।
बहते सदा तन में रुधिर बन, कोशिका केंद्रक पिता ।
करते प्रकाशित नेत्र मंडल, मंत्र के आगर पिता ।।

शृंगार माँ का पूर्ण उनसे , तेज उनका हैं पिता ।
माँ प्राण लगती हैं सदा ही, प्राण मारुत हैं पिता ।।
बंधन सुरक्षित है प्रसू से, डोर दृढ़ से हैं पिता ।
सब आरती में माँ बसी है, घंट ध्वनि से हैं पिता ।।

सागर लहर सा क्रोध है यदि,हैं शिवम भोले पिता ।
है नाम उनसे इस धरा पे, नाम सार्थक हैं पिता ।।
इच्छा स्वयं की त्याग देते, जागते हम में पिता ।
पूंजी समझ हमको स्वयं का, कष्ट भी भूले पिता ।।


Sunday, June 7, 2020

झाँइयाँ

मुझे बहुत प्रिय हैं
अपनी आँखों के नीचे
पड़ी हुई झाँइयाँ !
ये नहीं हैं प्रतीक
मेरी निर्बलता की,
मेरे दुःखों को
नहीं दर्शाती हैं ये,
नहीं लगातीं मुझ पर
कुरूपता का दोष ,
इनका कालापन
मेरे जीवन का धब्बा नहीं है !
ये करतीं हैं सिद्ध कि
झोंक दी है मैंने
अपनी आँखें
सत्यता की ज्वाला में,
जीवन-संघर्षों में
मैंने किस प्रकार
योद्धा बनाया है
अपनी आँखों को,
ये प्रमाण हैं उसका ।
जब भी पीड़ाओं को
सबसे छिपा कर
मात्र स्वयं में भरना चाहती हूँ,
तब-तब उभरती हैं ये !
लक्ष्य-प्राप्ति में जब-जब
तपती हूँ,
तब-तब उगती हैं ये !
मैं नहीं ढँकना चाहती इन्हें
बाह्य आवरणों से,
इनके अस्तित्व पर
मुझे लाज नहीं आती !
मेरी आँखों के लिए
काजल जैसी हैं ये,
मेरे मुखड़े का
अभिन्न अंग ,
अनवरत अपनी
धाक जमाती,
चंद्र की काया पर पड़ते
चिह्नों जैसी हैं ये !!


Wednesday, June 3, 2020

मैं (स्त्री)

एक शिवाला मेरे भीतर, सती रूप मुझमें है।
भस्म हुई यदि हिय ज्वाला से, निस्तारण मुझमें है।
संवेदन की सारी गतियाँ, मुझमें ही पनपीं हैं।
मुझमें आकर क्रोध तरंगें, गर्जन सी खनकीं हैं ।

मैं खींचूँ जो प्रत्यंचा को, वात-वेग बढ़ जाए ।
मेरे कर्णपटल में घुलने, नद मधु लोरी गाए ।
सावन माँगे दृग्जल मेरा, वसंत स्मिति मेरी है ।
मुझमें निर्मित वेद-कहानी, कथा-प्रीति मेरी है ।

सावित्री की सबल तपस्या ,सरल भक्ति शबरी की ।
चपल छबीली की मैं छाया, हूँ मेधा विदुषी की ।
कण-कण उज्ज्वल मेरे मुख से, सुरभित मुझसे बारी ।
पीड़ा तोड़े अस्थि भले पर, इच्छा मेरी भारी ।

उन्नत आशा मैं धरती की, कुंजी सब भावों की ।
मन पर लेकर ठोकर सारी, हूँ बूटी घावों की ।
अपनी चुनरी लहरा कर के, कर दूँ नभ सतरंगी ।
दीप्त कुटुंबों को कर दूँ मैं, बन प्रकाश की संगी ।

मेरा जीवन मेरा ही था, पर मैंने प्रेम लिया ।
रोआँ-रोआँ बाँट दिया सब, ना कोई आह किया ।
मैं ही अपनी हूँ निर्मात्री, अंत स्व की मैं ही हूँ ।
प्रेम-समर्पण की परिभाषा, प्रकृति सी मैं ही हूँ ।

(सार छंद)


Sunday, May 31, 2020

प्रकृति

प्रकृति ही आरंभ है, काल की वह प्रणेता ।
तेरे अपयश झेलती, किन्तु इति में विजेता ।।
जो बचाए स्व अग्नि से, ना तथा छत्र-छाया ।
कंट तुझे तेरा चुभे , है यही कर्म-माया ।।

तुमको ढोती कुक्षि में, भोग उदर का देती ।
दंड तेरे कुकर्म का, है निज कर पे लेती ।।
मात के शुद्ध प्रेम का, ना तुम्हें बोध कोई ।
अब जो ज्वाला हो गई, अकारण शोध कोई ।।

गौरी है जब शांत है, रौद्र किन्तु शिव सी है।
प्रलय जटा में रोकती, तांडव प्रचंड सी है।।
क्रोड़ भरे आशीष से, संपदा कुल लुटाए।
क्षरण देख निज देह का, धैर्य कब तक बनाए?

लेती है प्रतिशोध तो, डोलता हिय समूचा ।
आज धराशायी हुआ, तुम्हारा गर्व ऊँचा ।।
जिसे रहे तुम रौंदते, दैव्यता को भुलाए ।
तेरे द्वारे आ खड़ी, रक्त चख में समाए ।।

समय अभी भी शेष है, तज स्पृहा अहंकारी ।
मनुज! दैत्य तुम ना बनो, तुम्हीं से सृष्टि सारी ।।
ना कोई हो व्यग्रता, अब करो कर्म ऐसा ।
झूमे प्रकृति मोद में, नित करो पुण्य ऐसा ।।
(मुक्तामणि छंद)



Saturday, May 23, 2020

पदपादाकुलक छंद

कटि पर पीत वसन लिपटाए ,
श्यामल तन पर धूलि चढ़ाए ।
मोती सा रद उसका दमके ,
माणिक जैसे श्रुतिपट चमके ।

माखन छू पीयूष बनाए ,
गोकुल गलियाँ त्रिदिव बनाए ।
यमुना तट बंशी धुन बुनता ,
कान्हा में गोपी-हृदि घुलता।

पाटल-गुंचा सी स्मिति उसकी,
मोहे नटखट प्रतिमा जिसकी ।
छल भी उसका मन को भाए ,
छलिया छल कर औषधि लाए ।





Friday, May 22, 2020

मालती सवैया छंद

१--
धूमिल दर्पण माँगत दर्शन,रोवत नैनन में रज लेके ।
टूट कहीं चट से चटके वह, हारत ना हमरे गुण लेके ।
अश्रु भरे दृग पे मल अंजन, गात करो नम चंदन लेके ।
लेप लगा हृदि पे अब प्रीतम, आ बस दर्पण में छवि लेके ।

२--
देख लिया तुझमें जग पूरण,हो तुम जीवन-आँगन मेरे ।
बंदन शेखर का तुमसे घन, हाँ प्रिय हो तुम आँचल मेरे ।
मोद तुम्हीं तुम से दुख आवत, प्रेयस रीति तुम्हीं पिय मेरे ।
थाम मुझे कर दो सरला तुम, मैं मन हो तुम आतम मेरे ।

३--
देख पिया मुख चंचल भावक,भूल गयी सब लाजन मैं तो ।
चूम लिया दृग से चख-मस्तक, डेढ़ गुनी मनभावन मैं तो ।
थाम उसे अपने पलकों पर , बंद करी सब पाटन मैं तो ।
नेह भरे उपमा बनते क्षण, प्रेम पगी सहभागन मैं तो ।।

४--
चारु कपोल भए मनमोहक, दीठ तुम्हें नित साँझ बुलाती ।
केश हुए बदरा जस गाझिन, मैं कर पे पिय नाम गुदाती ।
अंग भरे जिन भी लय से यह, वे सब मोहित गीत बनाती ।
अर्पण है नव यौवन वल्लभ, स्वेद-पिया अब माँग सजाती ।

५--
प्रीतम-बालम-मोहन-साजन, दीपक हो तुम मैं इक बाती ।
मंदिर के तुम हो प्रभु मूरत ,मैं तुम पे यह प्राण लुटाती।
श्लोक गढ़े तुम पे बड़ सुंदर, जो व्रत धार सुहागिन गाती ।
प्रेमिल राग सिखावत हो तुम, मैं हिय के सब गान सुनाती ।।


Saturday, May 16, 2020

बिछोह से ही सजाते हैं

समर्पण के सभी नियम, यूँ चल हम तक ही आते हैं ।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।

नहीं संवाद की गुत्थी, नहीं मौनों में वरमाला ।
नहीं ध्वनि का है आडम्बर,न गीतों पर लगा ताला ।
वचन का कोई बंधन ना, वचन फिर भी निभाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।१।।

दो रेखाएँ जो संग चलतीं, किन्तु जुड़ नहीं पातीं ।
जटिलताएँ दो पन्नों की, कभी क्यों नप नहीं पातीं ।
प्रिया के प्रश्न हैं दुष्कर, ना ज्योतिष भी बताते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।२।।

संकेतों से बने हैं क्षण, शाश्वत वो ही तो क्षण हैं ।
नवांकुर हम नहीं कोई, बलिष्ठ द्रुम का अचर कण हैं ।
ना कहते प्रेम है आधा, इसे अपार बनाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं‌‌ ।।३।।

क्या होगी स्पर्श की इच्छा, दो तन एक हो गए हैं ।
भाग्यों ने लिखा जो ना, वो प्रेमालेख हो गए हैं ।
हुई ना दीठ से क्रीड़ा, तो स्वप्नों में बुलाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।४।।

बनाया प्रेम का एक घर, वहीं निर्वाण भी होगा ।
मृदा में घुल के, अनगिन प्रेम का निर्माण फिर होगा ।
कथन इस लोक का जो ना,वही विश्व को सुनाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।५।।


Friday, May 15, 2020

माँ संतोषी वंदना


तेरी कृपा पे भक्त आश्रित, पीर तुम हो टालती ।
संतोष उर में ढाल के माँ, भाग्य में हो जागती ।।
मुखड़ा सुमन सा खिलखिलाता, देह तरु के पात सा ।
अंचल मधुर प्रभुभोज सा है, कंकणा धुन सात सा ।।

भद्रा तुम्हारी है दुलारी, प्रिय तुम्हें गुड़ औ चना ।
हरती नयन के नीर को तुम, शोक चाहे हो घना ।।
तुम हो सरल सी उत्तरों सी, प्रश्न तुमसे हल हुआ ।
तेरे चरण पड़ के मईया, अश्रु गंगाजल हुआ ।।

संतोष है तेरी कथा में, प्रेम है आधार में ।
ममता झलकती मूर्तियों में, प्रीत है उस सार में ।।
सारा जगत द्युतिहीन हो माँ, यदि रहो ना तुम यहाँ ।
ऊसर धरा पर पुष्प जन्में, पग तुम्हारे हों जहाँ ।।

मैं पीड़िता हारी जगत में, तुम मुझे संवारती ।
संताप के क्षण में सुभग माँ, है तुम्हारी आरती ।।
हो साक्ष्य तुम मेरे हृदय की, रोम में तुम हो बसी ।
होता कभी जो अंध जीवन, तुम हुई माँ भोर सी ।।

व्रत है तुम्हारा अमृता सा, दूर करता शोक को ।
छाया असित मन से मिटा के, भेजता आलोक को ।।
हूँ मैं तुम्हारी प्रेम-भक्तिन, दो चरण में स्थान माँ ।
ऐसे करूँ मैं कर्म जग में, हो तुम्हें अभिमान माँ ।।

Thursday, May 7, 2020

समर वसुधा की तप्तता में

समर वसुधा की तप्तता में, भले किये हों तुमने द्वंद्व ।
बैठ द्वार की उष्ण छाँव में, सहती थी मैं अंतर्द्वंद्व ।।

गोली खाई जब भी तुमने, ढोया छाती पर अंगार ।
सौंदर्य निखर कर आया त्यों, सत्रहवाँ मेरा शृंगार ।।

उजड़ गई मस्तक की लाली,हुए अवर्णे कक्ष-कपाट ।
विधवा बन भी पूर्ण सुहागन, मुखड़ा मेरा रहा सपाट ।।

तेरे विजय की सुगाथा में,हुआ समर्पित है सिंदूर ।
करने अमर तेरे गात्र को, हुआ अश्रु भी मुझसे दूर ।।

तुम्हें देखकर तीन रंग में, हावी पीड़ा पर अभिमान ।
छीन लिये सब गहने तुमने, दिया अमूल्य उच्च सम्मान ।।

हुई ओढ़नी वर्ण विहीना, पायल ने खोयी झंकार ।
गौण हैं सूचक समृध्दि के, प्रधान जन-गण-मन टंकार ।।

छोड़ अकेली यशोधरा को, देकर नन्हें से उपहार ।
चले गए तुम बुद्ध मार्ग पर, खोजने राष्ट्र में परिवार ।।

दर्पण में दिखती छवि तेरी, भौंहों मध्य तेरा प्रताप ।
लक्ष्मीबाई सा हिय मेरा, ना करने देता संताप ।।

अनुगामिन बनकर तेरी मैं, पाऊँ तुमसा ही प्रतिरूप ।
रख जीवित सर्वदा स्वयं में, बनूँ प्रेम का तेरे रूप ।।

समाधि स्थल पर जाकर प्रियवर,दे आऊँ तुम्हें प्रेम पत्र।
प्रति निशा सुहागन बन तेरी,आत्म पर वारूँ आत्म छत्र ।।


Saturday, May 2, 2020

सीता जयंती

वैशाख मास शुक्ला नवमी, पुष्य का मध्य काल ।
भूमिजा वह सीता सुवर्णी, बनीं जनक का भाल ।।

लघु नूपुर के झंकृत लय से, हुआ भवन कल्याण ।
मधुरिम स्वर की शुभ गूँजों से, भरीं भीत में प्राण ।।

शनैः-शनैः तरुणाई छायी, मुख पर उगता तेज ।
काया जस पावन मधुबन सी, सुरभित कलिका सेज ।।

स्वयंवर की वह धनु परीक्षा, सफल हुए श्रीराम ।
गठबंधित विष्णु-श्री धरा पे, सिय आयीं प्रभु धाम ।।

सुहागरात्रि की अवधि छोटी, खोईं स्वर्णिम हार ।
अर्द्धांगी बन त्यागीं विभवा, स्वीकारीं वन-भार ।।

प्रिय सह भोगी पीड़ा नारी, रचा प्रेम अध्याय ।
निश्छल हो जो प्रिया हृदय से, सीता-कण कहलाय ।।

ना धुंधलाई पीर रेखा, मिला अन्य आघात ।
छल से रावण सियहरण किया,चले भयंकर वात ।।

भींगे कानन नेत्रनीर से,जलमय तीनों लोक ।
अर्द्ध तन ले प्रिय खोजें प्रिया, दिखे देह में शोक ।।

पता लगा ज्यों वैदेही का, लंक चले श्रीराम ।
किया पराजित रावण को त्यों,लाये सिय को थाम ‌।।

पूर्ण हुआ काल वनवास का ,हुई अवध में भोर ।
रघुवर बने अवध के राजा,पर भींगे दृग छोर ।।

चलीं जानकी पुनः विटप में, लिये गर्भ में बीज ।
अश्रु अनगिन,अनंतम पीड़ा, ना मिले सुखद तीज ।।

हाय! कैसी थी नियति उनकी, सदैव सहा बिछोह ।
धर्म निभाते हृदि को छीला, त्यागा सुख का मोह ।।

लिये जन्म लव-कुश कुटिया में,मिले महा संस्कार ।
सिय ने मूरत ऐसी गढ़ दी, रघुवंशी आकार ।।

सौंप पुत्रों को पितु छाँव में, इच्छित कीं निर्वाण ।
जिस भू से उपजीं थीं सीता, माँगीं उनसे त्राण ।।

बन गयीं वह प्रेम परिभाषा,बनीं प्रीत आधार ।
कर्म-धर्म में सिय विजित हुईं, किया जन्म साकार ।।



Saturday, April 25, 2020

प्रतीक्षा में तुम्हारी मैं

प्रतीक्षा में तुम्हारी मैं, ना सोयी रात भर सजना ।
गुंथी वेणी नक्षत्रों की, सकल आकाश पर सजना ।।

बुहारे राह के कंटक, तुम्हारे पग की आशा में ।
भुलाई भौतिकी तृष्णा, तुम्हारी दृश्य-पिपासा में ।
कंटिका हैं चुभोती वक्ष का मध्य भाग ओ सजना ।
प्रतीक्षा में तुम्हारी मैं, ना सोयी रात भर सजना ।।

झरोखे बैठी, समीरण को अपलक ही निहारूँ मैं ।
निशा भर तेरी स्मृति से,अंबकजल खूब निखारूँ मैं ।
तेरी पुतली में मैं जड़ दूँ,‌ सुख के भाग्य सब सजना ।
गुंथी वेणी नक्षत्रों की, सकल आकाश पर सजना ।।

निर्झर सी प्रकृति लेकर, तेरे ही द्वार आयी हूँ ।
तुहिना भर कपोलों पर, तेरी चौखट पे आयी हूँ ।
तेरे बिन कट गया वपु जो, उसे उद्धार दो सजना ।
प्रतीक्षा में तुम्हारी मैं, ना सोयी रात भर सजना ।।

कलाएँ चंद्र की मुझको, प्रयत्न तेरे सुनातीं हैं ।
दिखा अभिसार को स्वप्न में,खुली आँखों सुलातीं हैं ।
सहस्रों युग का मैं यौवन,तुम्हीं पर वार दूँ सजना ।
गुंथी वेणी नक्षत्रों की, सकल आकाश पर सजना ।।


Sunday, April 19, 2020

तेरा मौन ही सुनती हूँ

संवाद संपूरित बंधों में
तेरा मौन ही सुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।

समर में उतरी है हृदय व्यथा,
सह में प्रेम , विपक्ष में भी ।
गगरी में मौन के प्रेम भरा,
है विजय, सूक्ष्म पराभव भी ।
युद्ध क्षेत्र की पराजित जड़ता
प्रेम आयुध से धुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।

उपवन की सभी सुमनावलियाँ
तेरे नामक हो गयीं हैं ।
मधुमास बना देह को मेरे
तेरा सावन हो गयीं हैं ।
अपनी काया शृंगार निमित्त
तेरा गंध मैं चुनती हूँ ।
संवाद संपूरित बंधों में
तेरा मौन ही सुनती हूँ ।

समर्पित तुम पर हर पुण्यकथा
जिनमें श्लोकों की जलधि है,
भाषा में ना बंधा है किन्तु
प्रेमार्थों की सम सन्धि है ।
उर में अपने उच्चारण तेरा
मंत्र तानों में गुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।


Friday, April 17, 2020

दोहे

कंठी माला धार के ,जोगन कहाँ कहाय ।
करे सिद्ध जो प्रेम को,वह ना प्रेम सहाय ।।

परे जगत से प्रेम है, गणनाओं से दूर ।
रखे इसे जो तोल के, प्रेम नहीं वह सूर ।।

मंद लौ जो प्रेम पके, पाये रंग सुभाग ।
तरसे जो तन भोग को, सबसे बड़ा अभाग ।।

घट घट चुभता बाण हो, प्रेम रसीला घाव ।
पीर मिले जब प्रीत से, जन्मे पावन भाव ।।

परिसीमा ना प्रेम की, आखर स्वयं अछोर ।
है वर्णों में नित्यता, जैसे शम्भु अघोर ।।

Wednesday, April 15, 2020

तुमसे मन ये सरल हुआ है

ओ मन मेरे, मन के स्वामी ;
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।
तुममें ठहरा तो है लगता ,
निर्गुण था,अब सफल हुआ है ।।

शती मोह की मायाओं में
विभाग तेरा ही भाया है ।
बिन रण उतरे,जाने कितनों
को तुमने रज दिखलाया है ।
मेरे प्रेम के सरस गृह में
तेरा ही स्थल अचल हुआ है ।
तुममें ठहरा तो है लगता,
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।१।।

प्रेम को कहता प्रति प्रति अक्षर
तेरा स्वर्णिम प्रतिरूप लगे ।
विरह-विदा के क्षण में भी तू ,
संयोग विधा का रूप लगे ।
तू ही मेरे हिय का जोगी,
तू नयनों का कमल हुआ है ।
ओ मन मेरे, मन के स्वामी ;
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।२।।

तृषित नेत्र की है अभिलाषा
जल धारण गंगा घाट करे ।
अंगीकार करे ध्रुव तारा,
तन-मन तेरा आकाश करे ।
तेरी छाया छू ली मैंने,
मेरा भव तू सकल हुआ है।
तुममें ठहरा तो है लगता,
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।३।।


Tuesday, April 14, 2020

बलखाती नदी

बलखाती नदिया की,
प्रकृति है मुझ जैसी ;
तड़पे जो प्रेमी को तो,
लहरें बढ़ाती है ।।१।।

तनवा पे ज्वार भरे,
मनवा में आह भरे ;
गुप-चुप रोते रोते,
रतियाँ बिताती है ।।२।।

प्रेम की है पाठशाला,
प्रेम की ही परिणीता ;
अंजुरी में प्रेम लेके,
प्रेम को मनाती है ।।३।।

कहती "ओ लक्ष्य मेरे,
अंग भरो अंक मेरे" ;
सिमट के सागर में,
ठुमरी सुनाती है ।।४‌।।




Sunday, April 12, 2020

होंठों पर नमक रखने वाली लड़कियाँ

बड़ी कसैली होतीं हैं
होंठों पर नमक रखने वाली
लड़कियाँ !
नहीं फाँकतीं आठों पहर
शक्कर के बड़े-बड़े दाने ,
भ्रमित नहीं होतीं
उचित-अनुचित के भेद में ।
वो करतीं हैं परास्त शत्रुओं को
मौखिक ब्रह्मास्त्रों से ,
अपनी बहुप्रतीक्षित विजय पर
अधरों की सीमा लाँघ कर
हँसतीं हैं ।
ताक पर रख
व्यर्थ रीतियों की बेड़ियाँ,
स्वच्छंदता से
इठलाती हुई चलतीं हैं ।
पुकारता है समाज उन्हें
भिन्न-भिन्न विचित्र नामों से,
वो बनतीं हैं उदाहरण
उस स्थिति की, जहाँ पहुँचकर
स्त्री, स्त्री नहीं रहती
बन जाती है बोझिल गठरी
धृष्टता की, मनमानियों की ‌।
विशेषज्ञता प्राप्त है उन्हें
आग लगाने में ,
राख करके
सामाजिक कुटिल-नियमों को
उड़ जातीं हैं स्वयं
धुएँ के छल्लों की भाँति
लहराती हुई ।
चौखट से भी अधिक चौड़ी
होती जातीं हैं वो ,
ऊर्ध्व होतीं हैं अपनी चहारदीवारी
से भी अधिक ।
हाँ, बड़ी ही कसैली होतीं हैं
होंठों पर नमक रखने वाली
वो लड़कियाँ !!







Saturday, April 11, 2020

तुम पे ही

परे तुम से न जा पाऊँ, मिटा दूँ साँस तुम पे ही ।
कभी चुपके चले आओ, बिछा दूँ राह तुम पे ही ।

कि तुम बिन रात आधी है, अधूरी जन्म की बातें,
भरे इस दर्द के वन में, लुटा दूँ हास तुम पे ही ।।

कहो तुम देखते हो क्या,बड़े ही मनचले हो क्या ?
बुझे उस दीप की लौ में, निभा दूँ रात तुम पे ही ।।

बिठाया होंठ पर जो तिल, तुझी को ताकता रहता ,
पलक तुमसे चमकते हैं, सजा दूँ आँख तुम पे ही ।।

धड़कती सौ तरह धड़कन, पिया का नाम रहता है,
बुलातीं हैं तुझे जुल्फ़ें, भुला दूँ शाम तुम पे ही ।।


Tuesday, April 7, 2020

मैं तुम पर हार करके मन

मैं तुम पर हार करके मन, तुम्हारी जीत करती हूँ ।
तुम्हीं सरगम मेरे प्रियवर, तुम्हीं को गीत करती हूँ ।

जो तुम संग याम बीते हैं सुनहरे कल्प की भाँति ,
उन्हें रख नेत्र पर अपने, शृंगारित दीठ करती हूँ ।

मैं आयी हूँ तुम्हारे भाग्य, तुम्हारी प्रेम-पुजारन हूँ ,
बिना बंधन की काया अर्द्ध, तुम्हें हृदय मीत करती हूँ।

धरा पर जो ये फैली है सुगंधित पुष्प की अवलि,
उन्हें ले कर के करतल में, तुम्हें गुल वीर करती हूँ ।

कि मानो न मेरे प्रियतम, तुम्हें बिंदिया बनाऊँगी,
मेरे मन में विराजे तुम, प्रियम तुम्हें रीत करती हूँ ।


Wednesday, April 1, 2020

राम कहो, तुम आओगे क्या

राम कहो, तुम आओगे क्या ?
बुझते दीप जलाओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
स्मिति से अधर सजाओगे क्या ?

पड़े हुए हैं द्वेष धरा पे,
निश्छलता कम हुई धरा पे ।
कैसा सूना जगत हुआ है,
वात भी बिकती है धरा पे ।
प्रकृति की वह सुंदरी गाथा ,
श्रवण कराने आओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी,
बुझते दीप जलाओगे क्या ?

हो अवधपति तुम पति सिया के ,
वनवासी व योगी प्रिया के ।
सत् प्रियतम की तुम परिभाषा ,
वियोगी हरि व वेद श्रिया के ।
छलता अब है प्रेम यहाँ पे ,
प्रेम पढ़ाने आओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
स्मिति से अधर सजाओगे क्या ?

मर्यादित‌ विचार तुम्हारे,
प्रस्तर के भी तुम रखवाले ।
अनुबंधों के विजित प्रणेता ,
कर्म ही हैं धर्म तुम्हारे ।
हुई कर्म में यहाँ हीनता ,
धर्म पुनः बतलाओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
राम कहो, तुम आओगे क्या ?




Monday, March 30, 2020

देवी बनना.. वरदान या छल?

युग्मों में विशाल काले नेत्र,
उनके आवरण में प्रहरी बनी
घनी सी लुभावनी पलकें,
चौड़े से मस्तक पर पड़ते
अनगिनत से बल,
गुलाबी गालों पर उभरती
उषा काल की किरणें,
कुसुम पंखुड़ियों से सौम्य-
बुलबुल पंखों समान होंठ,
रजनी को आलिंगन में ढ़ाँकते
उसके सघन श्यामल केश..
साक्षात् देवी लगती है वह ।
किन्तु मानव रूप में है न
तो कुछ घाव पड़े हैं
नलिन रूपी नेत्रों के नीचे ,
होंठों से बहते रक्त
सूचित कर रहे हैं कि
बोल पड़ी थी वह सहसा ।
उसके आसपास बिखरे
केश के गुच्छों को
उनके संबंधियों से अलगाव का
दंड प्राप्त हुआ है ।
अपराध था उनका,
गर्वित होने लगे थे वे ।
दुर्गा रूप हैं तो क्या हुआ ?
पर्यायवाची तो उनका आज भी
'अबला' ही है ।
सरस्वती पुत्री हैं, फिर भी
सरल है क्या, बिना उद्दंड हुए
मन भर पा जाना ?
लक्ष्मी उनकी हथेली पर
सदियों से विराजमान हैं,
फिर भी झुलस जाती है
दहेज-अग्नि में
बड़ी सरलता से वह लक्ष्मी ।
ना जाने कितने जन्म लिये उसने
किन्तु ना पा सकी
इस यक्ष सरीखे प्रश्न का उत्तर
कि देवी बनना
वरदान है या मात्र छल....??


Friday, March 20, 2020

मैं पलकों पर बना रही हूँ

मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।
आलिंगन की मधुर गंध औ
प्रेमी धुन की मनरम माला ।।

तुम आये ले ज्योत प्रेम की ,
नयनों में उनको बसा लिया ।
धरते दीपक आँखों में ही ,
तुमको रघुवर तब बना लिया ।
तुमसे जीवन कनक सरीखा ,
तुमसे नियति यह भव्या आला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।१।।

तुमको जीया व प्रेम किया ,
मन से मन का संयोग किया ।
श्वांसों से ही गठबंधन है ,
प्रेम का मैंने उद्घोष किया ।
रीता जन्म-जन्म तुम्हीं पे,
तन-मन सब तुम पर ही ढाला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।२।।

तुम आये थे संग रवि लिये ,
अब गये आज त्यों साँझ किया ।
यायावर हो तुम, मान लिया
पर मुझको क्यों वनवास दिया ?
तुम बिन मुझमें पीड़ा बसती ,
बिन तेरे मैं विरही बाला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।३।।


Monday, March 16, 2020

तुम देह का मेरे चंदन हो

उजलापन तपती साँसों का,
यौवनता की चमक-दमक ।
मौलिकता सबकी तुमसे ही,
तुम देह का मेरे चंदन हो ।।

सादेपन के शृंगार सभी,
भावों के तुम स्रोत प्रमुख ।
सौंदर्य तुम्हारे लोचन में ही,
तुम नेत्र का मेरे अंजन हो ।।

जन्मों के तुम भाग्य-पुरुष,
आवाजाही का कारण ।
विष तुम औ अमृत तुम ही,
तुम मन में घुलता मंथन हो ।।

चैतन्य प्रेम के शीर्ष पे हम,
आत्म को छूता है चुंबन ।
प्राणों पर स्वत्व तुम्हारा ही,
तुम हिय का मेरे कंपन हो ।।

मंत्रों के प्रति उच्चारण पर,
तुमसा होता अभिमत स्वर।
मन मंदिर तुमसे मिलते ही,
तुम नेह का मेरे वंदन हो ।।


Saturday, March 7, 2020

वो जन्मतीं हैं

वो प्रायः मन्नतों से नहीं जन्मतीं ,
उपवासों से भी नहीं जन्मतीं ।
नहीं लगाने पड़ते फेरे बरगद के चारों ओर
उन्हें पाने के लिए,
देवी माँ से माँगना नहीं पड़ता उन्हें ।
वो स्वयं ही, यूँ ही
प्रकट हो जाती हैं ।
बिना अहंकार के, बिन बुलाई
अतिथि बन आतीं हैं ।
वो जन्मतीं हैं
क्योंकि जन्मना नियम है, प्रकृति है ।
वो जन्मतीं हैं
क्योंकि जन्मना रीति है, होनी है ।
जिस प्रकार
बिना कुछ सोचे बीज फेंक देने मात्र से
उग आती हैं पत्तियाँ,
मुस्कुराने लगते हैं प्रसून;
ठीक वैसे ही
लहलहाने लगतीं हैं वो भी
बिना किसी पूर्व योजना के ।
हो जाते हैं कुछ परिवर्तन
सूत्रों में
और आ जाती हैं वो
सुलझाने समानता-असमानता की
दुष्कर व उलझी सी गुत्थी ।
सुलझाने में घुमावदार पहेली
जाने कितनी बार
बनाती हैं अपने हृदय पर
पीड़ाओं से प्रेम की पंक्ति ।
नहीं आतीं लेकर स्वयं के लिए भाग्य
किन्तु
बन कर आतीं हैं अनगिनत संबंधों का
सौभाग्य ।
माथे के बल पर
अपना नाम नहीं लिखतीं,
हथेली पर रंगों से
अपना जीवन नहीं भरतीं ।
वो रहतीं हैं सदा उस पर्दे के पीछे,
जहाँ लिखी होती है
पुरूषों की सफलताओं की गाथा
स्वर्णिम अक्षरों में ।
वो कर जाती हैं
अविचारे-अबोले कार्य
बिना किसी पूर्व योजना के ।
बन जाती हैं खेल-खेल में
लक्ष्मीबाई ,
कलम घुमाते-घुमाते
महादेवी बन जाती हैं ।
रसोई से विद्यालय,विद्यालय से रसोई तक
दौड़ लगाने में पाती हैं नाम
हिमा दास सा ।
उड़ान भरते कल्पनाओं की
कल्पना बन जाती हैं ।
वो नहीं जन्मतीं सिद्ध करने
अपना अस्तित्व ।
वो नहीं जन्मतीं निर्मित करने
अपना कोई साम्राज्य ‌।
वो जन्मतीं हैं
पीढ़ियाँ बनाने को ।
वो जन्मतीं हैं
जन्म-अर्थ बतलाने को ।
वो बिल्कुल नहीं जन्मतीं
पूर्व योजना से,
वो जन्मतीं हैं
योजनाओं से संसार बनाने को ।

Saturday, February 15, 2020

सपने और प्रेमी

जब निकलोगे‌ ढूँढने
आशियाना
उसकी पलकों तले,
याद रखना
स्थान शेष नहीं है वहाँ
तुम्हारे ठहरने के लिए ।
उसकी घनी पलकों की
सघन छाँव में
तुमसे पहले ही
कुछ जिद्दी से सपने
डेरा डालकर
तय कर चुके हैं
स्थान अपना ।
तुम्हें क्या लगता है
यूँ ही खूबसूरत हैं
उसकी आँखें
या फिर तुम्हारे इश्क़ में
सँवर गयीं हैं?
नहीं, यह तो जादू है
उन बागी, अड़ियल‌ और
सामाजिक भाषा में
ढीठ सपनों का;
जिन्हें वह बड़ी सहजता से
छुपा लेती है यदा-कदा,
कभी रसोई के
मेवों वाले डिब्बे में,
तो कभी
आरती वाली पुस्तक में ।
छत का वह कोना
उसे इसीलिए प्रिय है क्योंकि
उसने देखा है
वह उमड़ता हुआ
बेख़ौफ़ पागलपन,
जो तुमने भी नहीं देखा ।
उसकी मासूम आँखों से
छलकते बूँद
गंगाजल से क्यों लगते हैं,
मालूम भी है?
हिमालय सरीखे
उच्च स्वप्नों का स्पर्श पा
ना जाने कितने ईंटों का
घाव सहा है उन्होंने,
तब जाकर मिली है
उसके गालों की भूमि ।
उसकी पलकों में
रहना चाहते हो?
तो करना होगा
समझौता तुम्हें
उन हठी सपनों से,
उसको अपनाने से पूर्व
स्वीकारना होगा
उसके प्यारे सपनों को ।
एक प्रेम-पत्र
उन्हें भी लिखना मन से,
कुछ गीतों का उपहार
उन पागल से
सपनों को भी देना ।
शर्तों का पुलिंदा
ना पेश़ करना उसके सामने,
चुनाव की नीति तो
उसे कभी ना बताना ;
क्योंकि
खाली तो कर देगी
तुम्हारे कहने पर
अपनी खूबसूरत पलकें
अंध-प्रेम में,
पर क्या रह पाओगे तुम
खंडहर से दिखने वाले
एक निर्जन से मकान में
ताउम्र??


Monday, February 3, 2020

अभी-अभी तारुण्य मिला है

सहमी-सकुची, घबरायी सी,
वह युद्ध क्षेत्र में आयी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है ।

बाला थी कभी नखरीली सी,
अपनी धुन में रहती थी ।
दादी वाली परी कथा को,
सत्य सहज समझती थी ।
माँ देती थी आँचल अपना,
सब प्रहर वहीं वह रहती थी ।
बाबा कहते थे सोनचिड़ी,
तब स्वर्ण सरल समझती थी ।
अब यथार्थ से टकराई तो
कुंदन बन तपने आयी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है।।१।।

प्रथम समय में ब्याह को जाना,
गुड्डे-गुड़ियों सा रीत सुहाना ।
"बिन सौदों के मेल होएगा",
मिलन को उसने कम आँका ।
छोटी उसकी शृंगार पेटी थी,
कुमकुम, सेन्हुर से भरती थी ।
अनभिज्ञ जगत-नियम से वह,
गहनों को रज-कण कहती थी ।
मोल बताया पापी जग ने तो
शृंगार से मुँह बिचकायी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है ।।२।।

क्यों बैठे वह भला तुला में,
वित्त ना उस सा हो पायेगा ।
उस सा गुण और भाव सुनहरे,
कृत्रिम पत्र ना ला पायेगा ।
निःस्वार्थ-निष्कपट प्रेम कभी,
मिथ जेवर से ना तोलो तुम ।
अनघ शगुन के आगे, मानुष !
बढ़ती गिनती ना बोलो तुम ।
तुम जैसों के कारण ही तो
देखो, कोयल चुप्पायी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है।।३।।


Sunday, February 2, 2020

अद्भुत जीवन

विभिन्न आयामों,
अनेक आकारों,
अपरिचित,
संदेहात्मक दिशाओं
से होकर गुजरता
चित-परिचित
परंतु
रहस्यात्मक जीवन;
स्वयं का होकर भी
स्वयं में नहीं होता ।
कहने को तो
हमारे होते हैं
सभी स्वप्न,
उनके उद्देश्य,
सारे निर्णय,
परिश्रम सभी
लक्ष्य-प्राप्ति के ।
किन्तु मूल में
होते हैं
कुछ अदृश्य,
अबोले व
अनसुने कारण;
जिन्हें
संबोधित करते हैं हम
कभी भाग्य
तो कभी माया कहकर ।
ढूंढते हैं प्रसन्नता
कभी हस्त-रेखा
तो कभी कुंडली दिखाकर ।
लाखों प्रयत्नों के बाद भी
सुलझा ना पाया कोई
जीवन के उलझे,
मुड़े से,बिखरे धागों को ।
कठपुतली सा जीवन
प्रारंभ होता है
अकारण स्वयं के
विलाप से
व समाप्त हो जाता है
अपनों के प्रेमपूर्ण-
दुःखमयी विलाप से ।
संपूर्ण जीवन के
ये ही दो विलाप
श्रव्य होते हैं
समाज के द्वारा ।
इस आदि व अन्त
के मध्य
होती हैं
अनगिनत रूदनें,
अनंत सिसकियाँ
किन्तु रहतीं हैं
मौन रूप में;
जो ना सुनाई देती हैं,
ना ही दिखाई देती हैं।
मात्र करते हुए
कर्म अपना
बनाती हैं
इतिहास व
दीर्घ काल तक
जीवित रहने वाली
कहानियाँ ।
इस प्रकार
बनती है
एक श्रृंखला
निर्जीव-सजीव सम्मिश्रित
जीवन की
और
हो जाता है नामकरण
इसका--
'अद्भुत' ।।

Thursday, January 30, 2020

माँ सरस्वती (वंदना)

वीणा के झंकृत तानों में,
गायन के सुर-निनादों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।

तुमसे ही है लेखन निखरा,
तुम आयी तो पुष्प महका ।
मधुमास तुम्हारे होने से,
पीत-वसन अनुपम ओढ़ा ।
सरसों के कोमल भागों में,
चुनरी के पीले धागों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।

कोकिल ने स्वर तुमसे पाया,
उपजी तुमसे प्रकृति-माया ।
ऋषियों का गहरा ज्ञान सरस,
कुछ और नहीं, तुम्हरी छाया ।
वासंंती वात सुवासों में,
सुंदरता के व्याख्यानों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।

सरल कमल से दृग तुम्हरे,
पुस्तक शोभित कर में तुम्हरे ।
माथे पर तेज दिवाकर सा,
सौंदर्य सजे मन में तुम्हरे ।
पंखुड़ियों के आधारों में,
मेधा के सब आख्यानों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।


Wednesday, January 1, 2020

प्रेम

मैं तुमसे प्रेम करती हूँ,
यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं।
किन्तु
मैं तुम्हारे प्रेम को जीती हूँ,
मरती हूँ प्रति क्षण
तुम्हारे प्रेम में,
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है ..
क्योंकि 'करना' तो
मात्र एक क्रिया है,
जो समय के साथ
वर्तमान से भूत में
परिवर्तित हो जाती है।
परंतु 'जीना' व 'मरना'
शाश्वत प्रक्रियाएँ है,
जो सभी परिवर्तनों के बाद भी
चलती रहतीं हैं
निर्बाध गति से
अपरिमित काल तक।।