Tuesday, April 7, 2020

मैं तुम पर हार करके मन

मैं तुम पर हार करके मन, तुम्हारी जीत करती हूँ ।
तुम्हीं सरगम मेरे प्रियवर, तुम्हीं को गीत करती हूँ ।

जो तुम संग याम बीते हैं सुनहरे कल्प की भाँति ,
उन्हें रख नेत्र पर अपने, शृंगारित दीठ करती हूँ ।

मैं आयी हूँ तुम्हारे भाग्य, तुम्हारी प्रेम-पुजारन हूँ ,
बिना बंधन की काया अर्द्ध, तुम्हें हृदय मीत करती हूँ।

धरा पर जो ये फैली है सुगंधित पुष्प की अवलि,
उन्हें ले कर के करतल में, तुम्हें गुल वीर करती हूँ ।

कि मानो न मेरे प्रियतम, तुम्हें बिंदिया बनाऊँगी,
मेरे मन में विराजे तुम, प्रियम तुम्हें रीत करती हूँ ।


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