Sunday, April 19, 2020

तेरा मौन ही सुनती हूँ

संवाद संपूरित बंधों में
तेरा मौन ही सुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।

समर में उतरी है हृदय व्यथा,
सह में प्रेम , विपक्ष में भी ।
गगरी में मौन के प्रेम भरा,
है विजय, सूक्ष्म पराभव भी ।
युद्ध क्षेत्र की पराजित जड़ता
प्रेम आयुध से धुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।

उपवन की सभी सुमनावलियाँ
तेरे नामक हो गयीं हैं ।
मधुमास बना देह को मेरे
तेरा सावन हो गयीं हैं ।
अपनी काया शृंगार निमित्त
तेरा गंध मैं चुनती हूँ ।
संवाद संपूरित बंधों में
तेरा मौन ही सुनती हूँ ।

समर्पित तुम पर हर पुण्यकथा
जिनमें श्लोकों की जलधि है,
भाषा में ना बंधा है किन्तु
प्रेमार्थों की सम सन्धि है ।
उर में अपने उच्चारण तेरा
मंत्र तानों में गुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।


No comments:

Post a Comment