जीवन सुघर है छंद सा यह, शिल्प पक्ष हुए पिता ।
भूले दिखाना भाव तो भी, भावना लगते पिता ।।
संजीवनी सा अर्थ लेकर, वैद्य रूपी हैं पिता ।
नभ से वृहद कुछ है कहीं तो, मात्र वह जग में पिता ।।
आधार तरु का हैं स्वयं ही, शीर्ष भी बनते पिता ।
गृह नींव उनसे पुष्ट होती, छत्र भी लगते पिता ।।
बहते सदा तन में रुधिर बन, कोशिका केंद्रक पिता ।
करते प्रकाशित नेत्र मंडल, मंत्र के आगर पिता ।।
शृंगार माँ का पूर्ण उनसे , तेज उनका हैं पिता ।
माँ प्राण लगती हैं सदा ही, प्राण मारुत हैं पिता ।।
बंधन सुरक्षित है प्रसू से, डोर दृढ़ से हैं पिता ।
सब आरती में माँ बसी है, घंट ध्वनि से हैं पिता ।।
सागर लहर सा क्रोध है यदि,हैं शिवम भोले पिता ।
है नाम उनसे इस धरा पे, नाम सार्थक हैं पिता ।।
इच्छा स्वयं की त्याग देते, जागते हम में पिता ।
पूंजी समझ हमको स्वयं का, कष्ट भी भूले पिता ।।
भूले दिखाना भाव तो भी, भावना लगते पिता ।।
संजीवनी सा अर्थ लेकर, वैद्य रूपी हैं पिता ।
नभ से वृहद कुछ है कहीं तो, मात्र वह जग में पिता ।।
आधार तरु का हैं स्वयं ही, शीर्ष भी बनते पिता ।
गृह नींव उनसे पुष्ट होती, छत्र भी लगते पिता ।।
बहते सदा तन में रुधिर बन, कोशिका केंद्रक पिता ।
करते प्रकाशित नेत्र मंडल, मंत्र के आगर पिता ।।
शृंगार माँ का पूर्ण उनसे , तेज उनका हैं पिता ।
माँ प्राण लगती हैं सदा ही, प्राण मारुत हैं पिता ।।
बंधन सुरक्षित है प्रसू से, डोर दृढ़ से हैं पिता ।
सब आरती में माँ बसी है, घंट ध्वनि से हैं पिता ।।
सागर लहर सा क्रोध है यदि,हैं शिवम भोले पिता ।
है नाम उनसे इस धरा पे, नाम सार्थक हैं पिता ।।
इच्छा स्वयं की त्याग देते, जागते हम में पिता ।
पूंजी समझ हमको स्वयं का, कष्ट भी भूले पिता ।।


