Monday, March 30, 2020

देवी बनना.. वरदान या छल?

युग्मों में विशाल काले नेत्र,
उनके आवरण में प्रहरी बनी
घनी सी लुभावनी पलकें,
चौड़े से मस्तक पर पड़ते
अनगिनत से बल,
गुलाबी गालों पर उभरती
उषा काल की किरणें,
कुसुम पंखुड़ियों से सौम्य-
बुलबुल पंखों समान होंठ,
रजनी को आलिंगन में ढ़ाँकते
उसके सघन श्यामल केश..
साक्षात् देवी लगती है वह ।
किन्तु मानव रूप में है न
तो कुछ घाव पड़े हैं
नलिन रूपी नेत्रों के नीचे ,
होंठों से बहते रक्त
सूचित कर रहे हैं कि
बोल पड़ी थी वह सहसा ।
उसके आसपास बिखरे
केश के गुच्छों को
उनके संबंधियों से अलगाव का
दंड प्राप्त हुआ है ।
अपराध था उनका,
गर्वित होने लगे थे वे ।
दुर्गा रूप हैं तो क्या हुआ ?
पर्यायवाची तो उनका आज भी
'अबला' ही है ।
सरस्वती पुत्री हैं, फिर भी
सरल है क्या, बिना उद्दंड हुए
मन भर पा जाना ?
लक्ष्मी उनकी हथेली पर
सदियों से विराजमान हैं,
फिर भी झुलस जाती है
दहेज-अग्नि में
बड़ी सरलता से वह लक्ष्मी ।
ना जाने कितने जन्म लिये उसने
किन्तु ना पा सकी
इस यक्ष सरीखे प्रश्न का उत्तर
कि देवी बनना
वरदान है या मात्र छल....??


Friday, March 20, 2020

मैं पलकों पर बना रही हूँ

मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।
आलिंगन की मधुर गंध औ
प्रेमी धुन की मनरम माला ।।

तुम आये ले ज्योत प्रेम की ,
नयनों में उनको बसा लिया ।
धरते दीपक आँखों में ही ,
तुमको रघुवर तब बना लिया ।
तुमसे जीवन कनक सरीखा ,
तुमसे नियति यह भव्या आला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।१।।

तुमको जीया व प्रेम किया ,
मन से मन का संयोग किया ।
श्वांसों से ही गठबंधन है ,
प्रेम का मैंने उद्घोष किया ।
रीता जन्म-जन्म तुम्हीं पे,
तन-मन सब तुम पर ही ढाला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।२।।

तुम आये थे संग रवि लिये ,
अब गये आज त्यों साँझ किया ।
यायावर हो तुम, मान लिया
पर मुझको क्यों वनवास दिया ?
तुम बिन मुझमें पीड़ा बसती ,
बिन तेरे मैं विरही बाला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।३।।


Monday, March 16, 2020

तुम देह का मेरे चंदन हो

उजलापन तपती साँसों का,
यौवनता की चमक-दमक ।
मौलिकता सबकी तुमसे ही,
तुम देह का मेरे चंदन हो ।।

सादेपन के शृंगार सभी,
भावों के तुम स्रोत प्रमुख ।
सौंदर्य तुम्हारे लोचन में ही,
तुम नेत्र का मेरे अंजन हो ।।

जन्मों के तुम भाग्य-पुरुष,
आवाजाही का कारण ।
विष तुम औ अमृत तुम ही,
तुम मन में घुलता मंथन हो ।।

चैतन्य प्रेम के शीर्ष पे हम,
आत्म को छूता है चुंबन ।
प्राणों पर स्वत्व तुम्हारा ही,
तुम हिय का मेरे कंपन हो ।।

मंत्रों के प्रति उच्चारण पर,
तुमसा होता अभिमत स्वर।
मन मंदिर तुमसे मिलते ही,
तुम नेह का मेरे वंदन हो ।।


Saturday, March 7, 2020

वो जन्मतीं हैं

वो प्रायः मन्नतों से नहीं जन्मतीं ,
उपवासों से भी नहीं जन्मतीं ।
नहीं लगाने पड़ते फेरे बरगद के चारों ओर
उन्हें पाने के लिए,
देवी माँ से माँगना नहीं पड़ता उन्हें ।
वो स्वयं ही, यूँ ही
प्रकट हो जाती हैं ।
बिना अहंकार के, बिन बुलाई
अतिथि बन आतीं हैं ।
वो जन्मतीं हैं
क्योंकि जन्मना नियम है, प्रकृति है ।
वो जन्मतीं हैं
क्योंकि जन्मना रीति है, होनी है ।
जिस प्रकार
बिना कुछ सोचे बीज फेंक देने मात्र से
उग आती हैं पत्तियाँ,
मुस्कुराने लगते हैं प्रसून;
ठीक वैसे ही
लहलहाने लगतीं हैं वो भी
बिना किसी पूर्व योजना के ।
हो जाते हैं कुछ परिवर्तन
सूत्रों में
और आ जाती हैं वो
सुलझाने समानता-असमानता की
दुष्कर व उलझी सी गुत्थी ।
सुलझाने में घुमावदार पहेली
जाने कितनी बार
बनाती हैं अपने हृदय पर
पीड़ाओं से प्रेम की पंक्ति ।
नहीं आतीं लेकर स्वयं के लिए भाग्य
किन्तु
बन कर आतीं हैं अनगिनत संबंधों का
सौभाग्य ।
माथे के बल पर
अपना नाम नहीं लिखतीं,
हथेली पर रंगों से
अपना जीवन नहीं भरतीं ।
वो रहतीं हैं सदा उस पर्दे के पीछे,
जहाँ लिखी होती है
पुरूषों की सफलताओं की गाथा
स्वर्णिम अक्षरों में ।
वो कर जाती हैं
अविचारे-अबोले कार्य
बिना किसी पूर्व योजना के ।
बन जाती हैं खेल-खेल में
लक्ष्मीबाई ,
कलम घुमाते-घुमाते
महादेवी बन जाती हैं ।
रसोई से विद्यालय,विद्यालय से रसोई तक
दौड़ लगाने में पाती हैं नाम
हिमा दास सा ।
उड़ान भरते कल्पनाओं की
कल्पना बन जाती हैं ।
वो नहीं जन्मतीं सिद्ध करने
अपना अस्तित्व ।
वो नहीं जन्मतीं निर्मित करने
अपना कोई साम्राज्य ‌।
वो जन्मतीं हैं
पीढ़ियाँ बनाने को ।
वो जन्मतीं हैं
जन्म-अर्थ बतलाने को ।
वो बिल्कुल नहीं जन्मतीं
पूर्व योजना से,
वो जन्मतीं हैं
योजनाओं से संसार बनाने को ।