युग्मों में विशाल काले नेत्र,
उनके आवरण में प्रहरी बनी
घनी सी लुभावनी पलकें,
चौड़े से मस्तक पर पड़ते
अनगिनत से बल,
गुलाबी गालों पर उभरती
उषा काल की किरणें,
कुसुम पंखुड़ियों से सौम्य-
बुलबुल पंखों समान होंठ,
रजनी को आलिंगन में ढ़ाँकते
उसके सघन श्यामल केश..
साक्षात् देवी लगती है वह ।
किन्तु मानव रूप में है न
तो कुछ घाव पड़े हैं
नलिन रूपी नेत्रों के नीचे ,
होंठों से बहते रक्त
सूचित कर रहे हैं कि
बोल पड़ी थी वह सहसा ।
उसके आसपास बिखरे
केश के गुच्छों को
उनके संबंधियों से अलगाव का
दंड प्राप्त हुआ है ।
अपराध था उनका,
गर्वित होने लगे थे वे ।
दुर्गा रूप हैं तो क्या हुआ ?
पर्यायवाची तो उनका आज भी
'अबला' ही है ।
सरस्वती पुत्री हैं, फिर भी
सरल है क्या, बिना उद्दंड हुए
मन भर पा जाना ?
लक्ष्मी उनकी हथेली पर
सदियों से विराजमान हैं,
फिर भी झुलस जाती है
दहेज-अग्नि में
बड़ी सरलता से वह लक्ष्मी ।
ना जाने कितने जन्म लिये उसने
किन्तु ना पा सकी
इस यक्ष सरीखे प्रश्न का उत्तर
कि देवी बनना
वरदान है या मात्र छल....??
उनके आवरण में प्रहरी बनी
घनी सी लुभावनी पलकें,
चौड़े से मस्तक पर पड़ते
अनगिनत से बल,
गुलाबी गालों पर उभरती
उषा काल की किरणें,
कुसुम पंखुड़ियों से सौम्य-
बुलबुल पंखों समान होंठ,
रजनी को आलिंगन में ढ़ाँकते
उसके सघन श्यामल केश..
साक्षात् देवी लगती है वह ।
किन्तु मानव रूप में है न
तो कुछ घाव पड़े हैं
नलिन रूपी नेत्रों के नीचे ,
होंठों से बहते रक्त
सूचित कर रहे हैं कि
बोल पड़ी थी वह सहसा ।
उसके आसपास बिखरे
केश के गुच्छों को
उनके संबंधियों से अलगाव का
दंड प्राप्त हुआ है ।
अपराध था उनका,
गर्वित होने लगे थे वे ।
दुर्गा रूप हैं तो क्या हुआ ?
पर्यायवाची तो उनका आज भी
'अबला' ही है ।
सरस्वती पुत्री हैं, फिर भी
सरल है क्या, बिना उद्दंड हुए
मन भर पा जाना ?
लक्ष्मी उनकी हथेली पर
सदियों से विराजमान हैं,
फिर भी झुलस जाती है
दहेज-अग्नि में
बड़ी सरलता से वह लक्ष्मी ।
ना जाने कितने जन्म लिये उसने
किन्तु ना पा सकी
इस यक्ष सरीखे प्रश्न का उत्तर
कि देवी बनना
वरदान है या मात्र छल....??



