Friday, March 20, 2020

मैं पलकों पर बना रही हूँ

मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।
आलिंगन की मधुर गंध औ
प्रेमी धुन की मनरम माला ।।

तुम आये ले ज्योत प्रेम की ,
नयनों में उनको बसा लिया ।
धरते दीपक आँखों में ही ,
तुमको रघुवर तब बना लिया ।
तुमसे जीवन कनक सरीखा ,
तुमसे नियति यह भव्या आला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।१।।

तुमको जीया व प्रेम किया ,
मन से मन का संयोग किया ।
श्वांसों से ही गठबंधन है ,
प्रेम का मैंने उद्घोष किया ।
रीता जन्म-जन्म तुम्हीं पे,
तन-मन सब तुम पर ही ढाला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।२।।

तुम आये थे संग रवि लिये ,
अब गये आज त्यों साँझ किया ।
यायावर हो तुम, मान लिया
पर मुझको क्यों वनवास दिया ?
तुम बिन मुझमें पीड़ा बसती ,
बिन तेरे मैं विरही बाला ।
मैं पलकों पर बना रही हूँ ,
मिलन-क्षणों की सुंदर शाला ।।३।।


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