Thursday, May 30, 2019

वर्षा की प्रतीक्षा

सूखापन, ये सूनापन ..
हृदय का मेरे,
प्रतीक्षारत् देख रहा है..
अम्बर को...

यह लहलहाती, इठलाती ..
करती घुमड़-घुमड़ हवा,
कोई संदेशा दे रही है ,
जन-जन को...

दूत बन ये आयी है देव इन्द्र की,
ठुमक-ठुमक के मन मचलाती ...
यौवन दिखा रही है मेरा,
दरपन को...

प्रगाढ़ प्रतीक्षा वर्षा की,
व सौंधी सुगंध माटी की ..
महका रही है अभी से मेरे,
अंग-अंग को...

Tuesday, May 28, 2019

मैं स्वयं के साथ हूँ

नहीं चाहती करना
हर किसी से
अपने मन की बातें...
अन्तर्मुखी हूँ थोड़ी -सी,
छुपा कर ही रखती हूँ
अपने कुछ गूढ़ रहस्य ..
अधिक कुछ चाह
यदि उठी तो..
पन्ने पर उकेर देती हूँ
हृदय के कुछ चित्र ,
मैं अपने मुख से
कुछ नहीं कहती,
मात्र लेखन को
माध्यम बना लेती हूँ ..
मुझे समझने के प्रयास में
समय व्यर्थ ना करना..
कभी अग्नि हूँ, कभी वायु..
मात्र अनुभूत हो सकती हूँ ...
साथ यदि देना चाहो
तो स्वागत है,
अन्यथा मैं स्वयं के साथ
तो हूँ ही
व प्रसन्न भी हूँ ....

Friday, May 24, 2019

Yaadein

गर्मियों की रात में खुले आसमान के नीचे ,
अम्मा की गोद में परियों की कहानी सुनना ।
वो हर साल मुहर्रम, दशहरे के मेले में,
बाबा का शौक से मिठाइयाँ और खिलौने लाना।
वो बारिश के मौसम में छत से टपकती बूँदों को,
कटोरी में भरते-भरते उसको खेल बना जाना।
ठिठुरती हुई ठंड में कोयले की आग जलाकर ,
बार -बार उसमें आलू और बैंगन पकाते जाना।
कितने सारे किस्से हैं उस बचपन के आँगन के ,
कितनी सारी यादें हैं उस घर मिट्टी वाले के।
अम्मा की बातें, बाबा के गाने,
बुआ का दुपट्टा, चाचा के फ़साने।
सब कुछ बहुत याद आता है ,
वो मिट्टी वाला घर हमेशा याद आता है ।।

Tum chaho to. .

तुम चाहो तो ..
तुमको अपनी साँसें दे दूँ...
हर लम्हा कतरा-कतरा जीयूं तुमको,
जो तुम कह दो..
तुमको अपनी दिन और रातें दे दूँ...
नजरें मेरी बस तुमको देखे,
तुझमें अपनी दुनिया देखूँ,
कह कर देखो तो..
तुमको अपनी आँखें दे दूँ...
मेरी धड़कन पर नाम तुम्हारा हो,
दिल पर मेरे राज तुम्हारा हो,
जो तुम माँगो तो ..
तुमको अपनी बाँहें दे दूँ....
इश्क बन पल-पल तुम पर बरसूं मैं,
बन कर वफ़ा हरदम तुझमें धड़कूं मैं,
जो तुम चाहो तो ..
तुमको सारे वादें दे दूँ...
जो तुम चाहो तो ,
चाहत वाली सारी बातें दे दूँ...

Friday, May 17, 2019

संघर्ष

आँखें ढूँढ रही हैं मेरी ,
एक प्रकाश के दीप को ।
जो मुझसे रूठ गया,
खोज रही उस मीत को ।
साँसें हुईं अधीर सी ,
नैनों में अरमान पले ।
एक जागृत सपने की खातिर ,
लड़ती रही लकीर से ।
सहृदय प्रतीक्षा जिसकी, हे भगवन्!
पता दो मेरा उस जीत को।
मैं बावली; क्या जानूँ तुम्हारे नियम ,
एक बार, बस एक बार
मेरे पक्ष में कर दो तुम अपनी रीत को ।
मालूम है इतिहास मुझे,
समय रहा नहीं किसी के हाथ में ।
मिलता है वो ही बस जो होता है भाग्य में।
पर मन की तड़पन को कैसे मैं आराम दिलाऊँ?
सपनों में खोये हृदय पर कैसे विराम लगाऊँ?
विजय धुन सिखला दो मुझे,
गा सकूँ फिर उस गीत को ।
कुछ नहीं तो साहस ही प्रदान करो इतना ,
कर सकूँ पराजय मैं जीवन के हर पीर को ।।

Tujhko sochu to..

तुझको सोचूँ तो पल-पल सँवरती रहती हूँ ,
धीरे-धीरे, हौले-हौले महकती रहती हूँ ।
सारे कायनात की खूबसूरती मुझमें समा जाती है ,
तुझे सोच-सोच कर हिना सी निखरती रहती हूँ ।।

Kis bandhan me baandhu tumko

किस बंधन में बाँधूं तुमको,
किस भाव से तुमको थामूं ..
कि जुड़ जाऊँ तुमसे
मैं जन्मों-जन्म के लिए ...

ना हो कोई बेड़ी पाँव में,
ना देह पर जंजीरें हों...
तुम रहो, मैं होऊँ..
संग अपने बस प्रीत लिए ...

राधा बनाऊँ,वैदेही बनाऊँ..
या बनाऊँ स्वयं को गौरी...
दुर्गम राहों पर चल जाऊँ,
नयनों में तुम्हारी बस चाह लिए ...

किस लोक में जाऊँ संग तुम्हारे ,
संग तुम्हारे किस रंग में रंग जाऊँ...
कैसे भक्ति करूँ ईश्वर की,
कि हो जाऊँ तुम्हारी सदैव के लिए ...

Thursday, May 16, 2019

आदत

आदत सी हो गयी है ,
हर बार तेरी आँखों में ..
अपना चेहरा देखने की ...
हर रात नींद से उठकर ,
तुम्हारे लिए प्रार्थना करने की ..
सजदे में सिर झुका कर ,
प्रत्येक समय तुम्हारा नाम लेने की ..
आदत सी हो गयी है ,
प्रत्येक मधुर, प्रेम भरे गीतों में...
तुम्हें खोजते रहने की ..
अपनी प्रत्येक कविता में
तुम्हारा नाम छिपाते रहने की ...
आदत सी हो गयी है ,
अपने दृगों से बिन कारण
निर्झरिणी बहाते रहने की ..
बिन कारण मन-मस्तिष्क में
तुम्हें बसाये रखने की...
आदत सी हो गयी है ।।

Wednesday, May 15, 2019

Bas tera....❤

मेरी आँखों का ये आँसू पुकारे नाम बस तेरा,
मेरे दिल का धड़कना वो दिलाये याद बस तेरा ।
तेरी परछाइयों से पूछ कर तेरा पता आऊँ,
मेरा मंदिर,मेरा मस्जिद सभी घर-बार बस तेरा ।।
❤ ❤ 

Tuesday, May 14, 2019

इस धूप के सफ़र में

इस धूप के सफ़र में
फूलों सा बदन
कुम्हलाया जा रहा है मेरा ...
बाट जोह रही है आँखें
कुछ शीतल पवनों की ..
भरी दुपहरी चाकरी करते
जी अलसाया जा रहा है मेरा ...
#अनुश्री_श्री

Monday, May 13, 2019

अंजान रिश्ता


जुलाई का महीना था । मैं और मेरी माँ दिल्ली से हरियाणा जा रहे थे । हमें हरियाणा में धुरेहरा जाना था। रात के लगभग 8:30 बज गये थे। मेट्रो से उतरकर हम बस पर चढ़े। बस के चलने में आधा घंटा बाकी था। दिन भर की भाग दौड़ और भीषण गर्मी की वजह से माँ के सिर में दर्द शुरू हो चुका था और प्यास भी लगी थी। हम दोनों अकेले ही सफर कर रहे थे तो मैंने ही दवा और कुछ खाने-पीने का सामान लाने का निश्चय किया।
                 तभी आगे की सीट से एक लड़का खड़ा हुआ। शायद उसने हमारी बातें सुनी थीं। उसने माँ से कहा, "आपको जो सामान चाहिए, मैं ला दूं?" अंजान शहर और अंजान लोग होने की वजह से माँ घबरायी हुई थी । उसने शायद माँ की परेशानी को भाँप लिया। उसने कहा , "घर पर मेरी भी माँ है, आपके ही जैसी और वो जानती है कि मैं उसका विश्वास कभी नहीं तोड़ूंगा। उसके ही जैसे आप भी मुझ पर विश्वास कर सकती हैं।"  ये सुनकर ना जाने माँ के मन में क्या आया, उन्होंने मुझे उसके साथ भेज दिया, क्योंकि दवा भी लानी थी।
                  मैं थोड़ा सहमी हुई थी, पर धीरे-धीरे उस पर विश्वास हो रहा था । मुझे कंफर्ट फील कराने के लिए वो कुछ कुछ देर पर मुझसे बातें कर रहा था। उसका साथ मुझे पसंद आ रहा था। मैं चाहती थी कि उससे बातें करूँ,उसका नाम पूछुं; पर ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि मेरे होंठ सिल गये हों। बस उसे देखते रहना ही इतना सुकून दे रहा था कि कुछ और मुमकिन ही नहीं था।
                     वो ड्राइवर की दूसरी साइड वाली सीट पर बैठा था और हम उसके पीछे वाली सीट पर। अंजान शहर होने की वजह से माँ परेशान थी, वो यह समझ रहा था,  इसलिए समय -समय पर हमें बता रहा था कि अभी कितना टाइम है पहुँचने में। उसके सामने एक छोटा सा मिरर लगा था , जिससे मैं उसे लगातार देखी जा रही थी और वो भी रह-रह कर मुझे उस मिरर से देख रहा था । जब भी हम दोनों की नज़रें मिलतीं,वो मुझे बहुत अपना सा लगता ।ऐसा लगता कि मैं उसे सदियों से जानती हूँ । हम दोनों अजनबी थे पर उसकी आँखों में वो ही एहसास पढ़ पा रही थी, जो मेरे दिल में थे। उससे मिलने के बाद मेरी सारी थकन मिट चुकी थी।
                   बस में कोई हरियाणवी गाना बज रहा था,  अच्छी तरह मुझे समझ में तो नहीं आ रहा था  पर ऐसा लग रहा था कि हम दोनों के लिए ही बज रहा हो।
                   वो प्यार नहीं था,इश्क नहीं था। पता नहीं क्या था , पर जो भी था बहुत हसीन था। ना जाने किस डोर ने हमें बाँध लिया था । ना नाम पता था,ना पता; और जानने की कोई खास जिद भी नहीं थी। वो 2 घंटे का सफर मेरी जिंदगी का एक खुशनुमा सफर बन गया।
                 जब हम धुरेहरा में उतरे तो जिस तरह उसने मुझे देखा , ऐसा लगा कि मैं किसी बहुत खास से अलग हो रही हूँ । उसने मुझसे कहा, "बाय,टेक केयर, सी यू"। मैं उसे बस देखती रह गई । उसके जाने के थोड़े देर बाद जब मैंने उसके शब्दों को दुहराया तो आश्चर्यचकित रह गई । "सी यू"?? " हम फिर मिलेंगे क्या? ?"
                   खैर , अब तक तो नहीं मिले हम और शायद कभी मिल भी ना सकें। इसका कोई गिला भी नहीं वैसे तो क्योंकि वो अजनबी मेरे जीवन की किताब का एक छोटा सा अध्याय तो बन ही गया।।।
    
#श्री