किस बंधन में बाँधूं तुमको,
किस भाव से तुमको थामूं ..
कि जुड़ जाऊँ तुमसे
मैं जन्मों-जन्म के लिए ...
ना हो कोई बेड़ी पाँव में,
ना देह पर जंजीरें हों...
तुम रहो, मैं होऊँ..
संग अपने बस प्रीत लिए ...
राधा बनाऊँ,वैदेही बनाऊँ..
या बनाऊँ स्वयं को गौरी...
दुर्गम राहों पर चल जाऊँ,
नयनों में तुम्हारी बस चाह लिए ...
किस लोक में जाऊँ संग तुम्हारे ,
संग तुम्हारे किस रंग में रंग जाऊँ...
कैसे भक्ति करूँ ईश्वर की,
कि हो जाऊँ तुम्हारी सदैव के लिए ...
किस भाव से तुमको थामूं ..
कि जुड़ जाऊँ तुमसे
मैं जन्मों-जन्म के लिए ...
ना हो कोई बेड़ी पाँव में,
ना देह पर जंजीरें हों...
तुम रहो, मैं होऊँ..
संग अपने बस प्रीत लिए ...
राधा बनाऊँ,वैदेही बनाऊँ..
या बनाऊँ स्वयं को गौरी...
दुर्गम राहों पर चल जाऊँ,
नयनों में तुम्हारी बस चाह लिए ...
किस लोक में जाऊँ संग तुम्हारे ,
संग तुम्हारे किस रंग में रंग जाऊँ...
कैसे भक्ति करूँ ईश्वर की,
कि हो जाऊँ तुम्हारी सदैव के लिए ...
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