Monday, May 13, 2019

अंजान रिश्ता


जुलाई का महीना था । मैं और मेरी माँ दिल्ली से हरियाणा जा रहे थे । हमें हरियाणा में धुरेहरा जाना था। रात के लगभग 8:30 बज गये थे। मेट्रो से उतरकर हम बस पर चढ़े। बस के चलने में आधा घंटा बाकी था। दिन भर की भाग दौड़ और भीषण गर्मी की वजह से माँ के सिर में दर्द शुरू हो चुका था और प्यास भी लगी थी। हम दोनों अकेले ही सफर कर रहे थे तो मैंने ही दवा और कुछ खाने-पीने का सामान लाने का निश्चय किया।
                 तभी आगे की सीट से एक लड़का खड़ा हुआ। शायद उसने हमारी बातें सुनी थीं। उसने माँ से कहा, "आपको जो सामान चाहिए, मैं ला दूं?" अंजान शहर और अंजान लोग होने की वजह से माँ घबरायी हुई थी । उसने शायद माँ की परेशानी को भाँप लिया। उसने कहा , "घर पर मेरी भी माँ है, आपके ही जैसी और वो जानती है कि मैं उसका विश्वास कभी नहीं तोड़ूंगा। उसके ही जैसे आप भी मुझ पर विश्वास कर सकती हैं।"  ये सुनकर ना जाने माँ के मन में क्या आया, उन्होंने मुझे उसके साथ भेज दिया, क्योंकि दवा भी लानी थी।
                  मैं थोड़ा सहमी हुई थी, पर धीरे-धीरे उस पर विश्वास हो रहा था । मुझे कंफर्ट फील कराने के लिए वो कुछ कुछ देर पर मुझसे बातें कर रहा था। उसका साथ मुझे पसंद आ रहा था। मैं चाहती थी कि उससे बातें करूँ,उसका नाम पूछुं; पर ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि मेरे होंठ सिल गये हों। बस उसे देखते रहना ही इतना सुकून दे रहा था कि कुछ और मुमकिन ही नहीं था।
                     वो ड्राइवर की दूसरी साइड वाली सीट पर बैठा था और हम उसके पीछे वाली सीट पर। अंजान शहर होने की वजह से माँ परेशान थी, वो यह समझ रहा था,  इसलिए समय -समय पर हमें बता रहा था कि अभी कितना टाइम है पहुँचने में। उसके सामने एक छोटा सा मिरर लगा था , जिससे मैं उसे लगातार देखी जा रही थी और वो भी रह-रह कर मुझे उस मिरर से देख रहा था । जब भी हम दोनों की नज़रें मिलतीं,वो मुझे बहुत अपना सा लगता ।ऐसा लगता कि मैं उसे सदियों से जानती हूँ । हम दोनों अजनबी थे पर उसकी आँखों में वो ही एहसास पढ़ पा रही थी, जो मेरे दिल में थे। उससे मिलने के बाद मेरी सारी थकन मिट चुकी थी।
                   बस में कोई हरियाणवी गाना बज रहा था,  अच्छी तरह मुझे समझ में तो नहीं आ रहा था  पर ऐसा लग रहा था कि हम दोनों के लिए ही बज रहा हो।
                   वो प्यार नहीं था,इश्क नहीं था। पता नहीं क्या था , पर जो भी था बहुत हसीन था। ना जाने किस डोर ने हमें बाँध लिया था । ना नाम पता था,ना पता; और जानने की कोई खास जिद भी नहीं थी। वो 2 घंटे का सफर मेरी जिंदगी का एक खुशनुमा सफर बन गया।
                 जब हम धुरेहरा में उतरे तो जिस तरह उसने मुझे देखा , ऐसा लगा कि मैं किसी बहुत खास से अलग हो रही हूँ । उसने मुझसे कहा, "बाय,टेक केयर, सी यू"। मैं उसे बस देखती रह गई । उसके जाने के थोड़े देर बाद जब मैंने उसके शब्दों को दुहराया तो आश्चर्यचकित रह गई । "सी यू"?? " हम फिर मिलेंगे क्या? ?"
                   खैर , अब तक तो नहीं मिले हम और शायद कभी मिल भी ना सकें। इसका कोई गिला भी नहीं वैसे तो क्योंकि वो अजनबी मेरे जीवन की किताब का एक छोटा सा अध्याय तो बन ही गया।।।
    
#श्री

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