Saturday, September 28, 2019
Wednesday, September 25, 2019
गले से लगा लो
बदन की सारी थकन मिटा दो ,
थामो मुझे और गले से लगा लो ।
मैं तन्हा सी कोई बुझती शमा हूँ ,
छू लो मुझे और खुद में जला लो ।
उलझी लटें हैं, साँसें भी बहकीं ,
सुनो, उंगलियों से ज़ुल्फें सजा दो ।
खो कर बहकना तुम्हीं से है साजन ,
मैं सँभलूं तो कैसे, यही तुम बता दो ।
राहों में तेरे मेरी आँखें बिछीं हैं ,
उठा लो उन्हें और पलकें बना लो ।
मुहब्बत की बातें समझो न जानम ,
रूठूं कभी तो मुझे तुम मना लो ।
जरूरी नहीं है होंठों से कहना ,
करके इशारे..इशारे.. जता दो ।
मैं तड़पूं तुम्हारी मुहब्बत की खातिर ,
तुम आओ तभी सौ रातें बिता दो ।।
थामो मुझे और गले से लगा लो ।
मैं तन्हा सी कोई बुझती शमा हूँ ,
छू लो मुझे और खुद में जला लो ।
उलझी लटें हैं, साँसें भी बहकीं ,
सुनो, उंगलियों से ज़ुल्फें सजा दो ।
खो कर बहकना तुम्हीं से है साजन ,
मैं सँभलूं तो कैसे, यही तुम बता दो ।
राहों में तेरे मेरी आँखें बिछीं हैं ,
उठा लो उन्हें और पलकें बना लो ।
मुहब्बत की बातें समझो न जानम ,
रूठूं कभी तो मुझे तुम मना लो ।
जरूरी नहीं है होंठों से कहना ,
करके इशारे..इशारे.. जता दो ।
मैं तड़पूं तुम्हारी मुहब्बत की खातिर ,
तुम आओ तभी सौ रातें बिता दो ।।
Friday, September 20, 2019
मन अब रात हो रहा है
साँझ से ढलकर
मन अब
रात हो रहा है ,
जीवन से छुपकर
मन अब
पार हो रहा है ।
निराशा ने ओढ़
रखी थी
उजली किन्तु
मिथ चादर,
ज्यों पलटा उसे
नभ अब
स्याह हो रहा है ।
मटकती,लचकती
बूंदे
चिढ़ा रहीं हैं मुझको,
बिखरी,टूटी
लाचार पत्तियाँ
उंगली दिखा रहीं मुझको,
हर एक शोर अब
आलोचना लग रहीं हैं,
चुप्पी जैसे अब
दुत्कारना लग रहीं हैं ।
आकर्षक जग का
यौवन रंग अब
जीर्णात हो रहा है,
साँझ से ढलकर
मन अब
रात हो रहा है ।
मन अब
रात हो रहा है ,
जीवन से छुपकर
मन अब
पार हो रहा है ।
निराशा ने ओढ़
रखी थी
उजली किन्तु
मिथ चादर,
ज्यों पलटा उसे
नभ अब
स्याह हो रहा है ।
मटकती,लचकती
बूंदे
चिढ़ा रहीं हैं मुझको,
बिखरी,टूटी
लाचार पत्तियाँ
उंगली दिखा रहीं मुझको,
हर एक शोर अब
आलोचना लग रहीं हैं,
चुप्पी जैसे अब
दुत्कारना लग रहीं हैं ।
आकर्षक जग का
यौवन रंग अब
जीर्णात हो रहा है,
साँझ से ढलकर
मन अब
रात हो रहा है ।
Friday, September 13, 2019
माँ हिन्दी
हे जननी!
हे प्रेम की देवी!
सौन्दर्य समायी,
तुम भाव स्वरूपी ।।
सुंदर तेरे हर अक्षर,
मात्रा में तेरे प्रेम बसा ।
शब्द-शब्द अनुभूति की वेदी,
चरणों में तेरे प्रसून उगा ।
गंध समीर की हो मलय सी,
जब-जब उच्चारण हो तेरा ।
व्योम स्वयं चरण को चूमे ,
पुत्र वहीं नाम लिखे जब तेरा ।
कोमलता तेरे तन-मन में ,
तूने कभी ना अहम् चुना ।
देकर संबल प्रति वाक् को तुमने ,
अस्तित्व उनका स्वयं गढ़ा ।
मूर्ख तुम्हारे बालक हैं माँ,
तेरी महिमा का ज्ञान नहीं ।
तुमसे ही है ब्रह्मांड की रेखा ,
इसका उनको भान नहीं ।
सागर से भी गहरा है,
अंतस्थल तुम्हारा मैया ।
क्षमा लुटाती आयी हो,
भरी स्नेह की तुमने नैया ।
तेरे सपूत अभी भी हैं माँ,
अर्पण तुम पर जीवन हमारा ।
जीवित रहोगी सदा-सदा तुम ,
करो स्वीकार वचन हमारा ।
हे जननी!
हे माँ हिन्दी!
सौन्दर्य समायी ,
तुम भाव स्वरूपी ।।।
हे प्रेम की देवी!
सौन्दर्य समायी,
तुम भाव स्वरूपी ।।
सुंदर तेरे हर अक्षर,
मात्रा में तेरे प्रेम बसा ।
शब्द-शब्द अनुभूति की वेदी,
चरणों में तेरे प्रसून उगा ।
गंध समीर की हो मलय सी,
जब-जब उच्चारण हो तेरा ।
व्योम स्वयं चरण को चूमे ,
पुत्र वहीं नाम लिखे जब तेरा ।
कोमलता तेरे तन-मन में ,
तूने कभी ना अहम् चुना ।
देकर संबल प्रति वाक् को तुमने ,
अस्तित्व उनका स्वयं गढ़ा ।
मूर्ख तुम्हारे बालक हैं माँ,
तेरी महिमा का ज्ञान नहीं ।
तुमसे ही है ब्रह्मांड की रेखा ,
इसका उनको भान नहीं ।
सागर से भी गहरा है,
अंतस्थल तुम्हारा मैया ।
क्षमा लुटाती आयी हो,
भरी स्नेह की तुमने नैया ।
तेरे सपूत अभी भी हैं माँ,
अर्पण तुम पर जीवन हमारा ।
जीवित रहोगी सदा-सदा तुम ,
करो स्वीकार वचन हमारा ।
हे जननी!
हे माँ हिन्दी!
सौन्दर्य समायी ,
तुम भाव स्वरूपी ।।।
Tuesday, September 10, 2019
मर्द
जब रोकती है दुनिया उसको
नीर बहाने से,दर्द बताने से ;
तो बताना चाहता है वो कि
इस मजबूत शरीर के भीतर
एक दिल भी है,
नाजुक सा,कोमल सा ;
जहाँ कायम हैं सभी एहसास
अपनों के लिए, अपने लिए ;
वो भी टूटता है,तड़पता है
जब हासिल नहीं कर पाता
प्रेम अपना ,स्वप्न अपना;
रोना चाहता है खुल कर ,
किसी बंद कोठरी में नहीं ,
खुले आकाश तले,
बनाना चाहता है
हृदय की तस्वीर
बस कागज पर ही नहीं,
भरी महफिल में ;
फिर याद आ जाती है उसे
समाज की खोखली सत्यता
कि वो मर्द है और
'मर्द को दर्द नहीं होता'
फिर बताता है खुद को भी
"तुम रो नहीं सकते
टूटना तुम्हारी प्रकृति पर
प्रश्नचिह्न लगायेगा,
यूं रो कर कैसे खरे उतरोगे
मर्दानगी की कसौटी पर ?
बनाये रखनी है तुम्हें
इस परिभाषा की मर्यादा ।"
और इस तरह
बन जाता है वो 'असली मर्द'
समाज की बेरंग नजरों में ;
पर बंद-अंधेरी-काली कोठरी में
वो आज भी 'लड़की' ही है ,
समाज की भाषा में 'कमजोर लड़की',
जिसकी खुशियाँ,जिसके दुःख
सब आँखों से निकलते हैं,
लेकिन वो तर जाता है हर रात
'लड़की' बनकर!!!
नीर बहाने से,दर्द बताने से ;
तो बताना चाहता है वो कि
इस मजबूत शरीर के भीतर
एक दिल भी है,
नाजुक सा,कोमल सा ;
जहाँ कायम हैं सभी एहसास
अपनों के लिए, अपने लिए ;
वो भी टूटता है,तड़पता है
जब हासिल नहीं कर पाता
प्रेम अपना ,स्वप्न अपना;
रोना चाहता है खुल कर ,
किसी बंद कोठरी में नहीं ,
खुले आकाश तले,
बनाना चाहता है
हृदय की तस्वीर
बस कागज पर ही नहीं,
भरी महफिल में ;
फिर याद आ जाती है उसे
समाज की खोखली सत्यता
कि वो मर्द है और
'मर्द को दर्द नहीं होता'
फिर बताता है खुद को भी
"तुम रो नहीं सकते
टूटना तुम्हारी प्रकृति पर
प्रश्नचिह्न लगायेगा,
यूं रो कर कैसे खरे उतरोगे
मर्दानगी की कसौटी पर ?
बनाये रखनी है तुम्हें
इस परिभाषा की मर्यादा ।"
और इस तरह
बन जाता है वो 'असली मर्द'
समाज की बेरंग नजरों में ;
पर बंद-अंधेरी-काली कोठरी में
वो आज भी 'लड़की' ही है ,
समाज की भाषा में 'कमजोर लड़की',
जिसकी खुशियाँ,जिसके दुःख
सब आँखों से निकलते हैं,
लेकिन वो तर जाता है हर रात
'लड़की' बनकर!!!
Monday, September 2, 2019
जीवन
ना तड़पे जब प्यासे होकर ,
तो कैसा फिर जमजम है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ...
किसी गरीब के अश्रु से ,
मन यदि ना भींगा है ..
बेबस अनाथों के रूदन से ,
हृद कभी ना रीता है ..
निरीह पशु के कटने पर ,
आँखों में आग ना उबला तो ..
सौम्य कुसुम का टूट बिखरना ,
साँसें तेरी ना तोड़ा तो ..
परपीड़ा में ना दुःखे हो ,
फिर कैसा सुख संगम है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ....
जीवन माया मोह का घेरा ,
इसी बंध में रहना है ..
ऊपर इससे है ही क्या ,
सुख-दुःख सारे सहना है ..
मात-पित्र व प्रेम, सहोदर ,
जीवन के सौंदर्य यही हैं ..
स्वप्न भरे इस ताल नयन में ,
जैसा भी हो स्वर्ग यहीं है ..
परसेवा में ना भटका तो ,
फिर काहे का जीवन है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ....
तो कैसा फिर जमजम है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ...
किसी गरीब के अश्रु से ,
मन यदि ना भींगा है ..
बेबस अनाथों के रूदन से ,
हृद कभी ना रीता है ..
निरीह पशु के कटने पर ,
आँखों में आग ना उबला तो ..
सौम्य कुसुम का टूट बिखरना ,
साँसें तेरी ना तोड़ा तो ..
परपीड़ा में ना दुःखे हो ,
फिर कैसा सुख संगम है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ....
जीवन माया मोह का घेरा ,
इसी बंध में रहना है ..
ऊपर इससे है ही क्या ,
सुख-दुःख सारे सहना है ..
मात-पित्र व प्रेम, सहोदर ,
जीवन के सौंदर्य यही हैं ..
स्वप्न भरे इस ताल नयन में ,
जैसा भी हो स्वर्ग यहीं है ..
परसेवा में ना भटका तो ,
फिर काहे का जीवन है ...
क्षुधा समेटा तन ना देखा ,
अथाह पड़ा क्यों सम्पद है ....
Sunday, September 1, 2019
आकर्षण
ना जाने कहाँ खो जाती हैं
छमछमाती, बहकाती
घुंघरुएँ पायल की,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण....
हाथों की मेंहदी उतार देती है
सहसा ही पूरी महक,
शोर सी लगने लगती है
उसकी चूड़ियों की खनक,
जिस मुस्कुराहट पर
कायनात लुटा दी जाती थी ,
नापसंद किस्से सी लगती है ..
उसकी बातें सारी प्रेम पगी,
समझ परे मिसरे सी लगती है ..
जिन गालों पर फिदा हुआ ,
उनको तेजाब से धोता है ..
प्रेम रचा जो रक्त से सींचा, वो
अंश कहीं नाली में खोता है ..
तन की अठखेली उसको
पूर्ति कामना की लगती है ..
मन की सारी गिरहें जैसे
बंद कपाट सी लगती है ...
ना जाने कहाँ गुम जाती हैं
चमचमाती, सहलाती
लकीरें काजल की ,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण ....
ना जाने कहाँ खो जाती हैं
उमड़ाती,उछलाती
भावनायें साजन की ,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण .....
छमछमाती, बहकाती
घुंघरुएँ पायल की,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण....
हाथों की मेंहदी उतार देती है
सहसा ही पूरी महक,
शोर सी लगने लगती है
उसकी चूड़ियों की खनक,
जिस मुस्कुराहट पर
कायनात लुटा दी जाती थी ,
नापसंद किस्से सी लगती है ..
उसकी बातें सारी प्रेम पगी,
समझ परे मिसरे सी लगती है ..
जिन गालों पर फिदा हुआ ,
उनको तेजाब से धोता है ..
प्रेम रचा जो रक्त से सींचा, वो
अंश कहीं नाली में खोता है ..
तन की अठखेली उसको
पूर्ति कामना की लगती है ..
मन की सारी गिरहें जैसे
बंद कपाट सी लगती है ...
ना जाने कहाँ गुम जाती हैं
चमचमाती, सहलाती
लकीरें काजल की ,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण ....
ना जाने कहाँ खो जाती हैं
उमड़ाती,उछलाती
भावनायें साजन की ,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण .....
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