Sunday, September 1, 2019

आकर्षण

ना जाने कहाँ खो जाती हैं
छमछमाती, बहकाती
घुंघरुएँ पायल की,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण....
हाथों की मेंहदी उतार देती है
सहसा ही पूरी महक,
शोर सी लगने लगती है
उसकी चूड़ियों की खनक,
जिस मुस्कुराहट पर
कायनात लुटा दी जाती थी ,
नापसंद किस्से सी लगती है ..
उसकी बातें सारी प्रेम पगी,
समझ परे मिसरे सी लगती है ..
जिन गालों पर फिदा हुआ ,
उनको तेजाब से धोता है ..
प्रेम रचा जो रक्त से सींचा, वो
अंश कहीं नाली में खोता है ..
तन की अठखेली उसको
पूर्ति कामना की लगती है ..
मन की सारी गिरहें जैसे
बंद कपाट सी लगती है ...
ना जाने कहाँ गुम जाती हैं
चमचमाती, सहलाती
लकीरें काजल की ,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण ....
ना जाने कहाँ खो जाती हैं
उमड़ाती,उछलाती
भावनायें साजन की ,
जब धुंधला पड़ जाता है
आकर्षण .....

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