हे जननी!
हे प्रेम की देवी!
सौन्दर्य समायी,
तुम भाव स्वरूपी ।।
सुंदर तेरे हर अक्षर,
मात्रा में तेरे प्रेम बसा ।
शब्द-शब्द अनुभूति की वेदी,
चरणों में तेरे प्रसून उगा ।
गंध समीर की हो मलय सी,
जब-जब उच्चारण हो तेरा ।
व्योम स्वयं चरण को चूमे ,
पुत्र वहीं नाम लिखे जब तेरा ।
कोमलता तेरे तन-मन में ,
तूने कभी ना अहम् चुना ।
देकर संबल प्रति वाक् को तुमने ,
अस्तित्व उनका स्वयं गढ़ा ।
मूर्ख तुम्हारे बालक हैं माँ,
तेरी महिमा का ज्ञान नहीं ।
तुमसे ही है ब्रह्मांड की रेखा ,
इसका उनको भान नहीं ।
सागर से भी गहरा है,
अंतस्थल तुम्हारा मैया ।
क्षमा लुटाती आयी हो,
भरी स्नेह की तुमने नैया ।
तेरे सपूत अभी भी हैं माँ,
अर्पण तुम पर जीवन हमारा ।
जीवित रहोगी सदा-सदा तुम ,
करो स्वीकार वचन हमारा ।
हे जननी!
हे माँ हिन्दी!
सौन्दर्य समायी ,
तुम भाव स्वरूपी ।।।
हे प्रेम की देवी!
सौन्दर्य समायी,
तुम भाव स्वरूपी ।।
सुंदर तेरे हर अक्षर,
मात्रा में तेरे प्रेम बसा ।
शब्द-शब्द अनुभूति की वेदी,
चरणों में तेरे प्रसून उगा ।
गंध समीर की हो मलय सी,
जब-जब उच्चारण हो तेरा ।
व्योम स्वयं चरण को चूमे ,
पुत्र वहीं नाम लिखे जब तेरा ।
कोमलता तेरे तन-मन में ,
तूने कभी ना अहम् चुना ।
देकर संबल प्रति वाक् को तुमने ,
अस्तित्व उनका स्वयं गढ़ा ।
मूर्ख तुम्हारे बालक हैं माँ,
तेरी महिमा का ज्ञान नहीं ।
तुमसे ही है ब्रह्मांड की रेखा ,
इसका उनको भान नहीं ।
सागर से भी गहरा है,
अंतस्थल तुम्हारा मैया ।
क्षमा लुटाती आयी हो,
भरी स्नेह की तुमने नैया ।
तेरे सपूत अभी भी हैं माँ,
अर्पण तुम पर जीवन हमारा ।
जीवित रहोगी सदा-सदा तुम ,
करो स्वीकार वचन हमारा ।
हे जननी!
हे माँ हिन्दी!
सौन्दर्य समायी ,
तुम भाव स्वरूपी ।।।

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