Thursday, July 25, 2019

कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा?

कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।
मिलन-समागम हो ना हो,
श्वासों में श्वास तो भरता है ।।

आत्म-विचरता पंछी है ,
उड़-उड़ बहता आयेगा ..
लाख सुला लो अहसासें ,
जग-उठ तुम्हें सतायेगा ..
रोकोगे तुम बढ़ने से ,
सीमायें तब लाँघ चुकेगा ..
दीवारों से जब घेरोगे ,
पर्वत को भी पार चुकेगा ..
कायदे-नियम,ताने-वाने ;
सबसे आगे बढ़ता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।१।।

राधा के यह कान्हा सा ,
नटखट बाँसुरी वाला है ..
कान्हा के यह राधे सा ,
पावन-पूजित माला है ..
सदियों से यह प्रथा चली ,
पी-संगम, हाँ दुष्कर है ..
प्रभु ने भी दुःख झेला ,
उर उनके वेदन-पुष्कर है ..
सबको नीति-हर्ष सिखाकर ,
स्वयं विलाप तो करता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।२।।

लक्ष्य यदि ना पाया तो ,
जन्मों से यह सौदा कर ले ..
गेह में वास ना पाया तो ,
आँगन का यह पौधा बन ले ..
तरु से यह देना सीखे ,
तृण से कष्टों को सहना ..
नैत्रज से यह देह को सींचे ,
स्वाभाविक नित रात्रि बहना ..
स्वजन का यह मान रखे ,
भीतर-भीतर जलता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।३।।

Tuesday, July 23, 2019

पिंजर

सुंदरता जब अभिशाप लगे ,
जीवन भर का भार लगे ,
आकर्षित हो जब कोई नोचे ,
प्रेम कटु आघात लगे....
तोड़ के सारे पिंजर, शुका !
तुम नील गगन उड़ जाना ..
ना आना रस घोली बातों में ,
ठाठ-बाट से मुंह फिराना ...

स्वर्णिम पंख तुम्हारे सुन लो ,
कटने को ना उत्पन्न हुए ...
मीठे बोल तुम्हारे शुग्गा ,
विवशे क्यों व्युत्पन्न हुए ...
स्त्री जैसे तुम भी हो ,
उस जैसा ही चक्र तुम्हारा ..
तोड़ के बेड़ी गुलामी वाली ,
स्वातंत्र्य का उसको पाठ पढ़ाना..

रिश्ते जब कटु आहार लगें ,
प्रति क्षण डँसता नाग लगें ..
अपमानों की ही वर्षा हो ,
प्रेम क्षणिक एहसास लगे ...
छोड़ के झूठे महल, वनिता !
तुम अपने झोपड़ में आ जाना...
ना सहना तुम अपराधों को ,
नियति अपनी निज पा जाना ।।।

Monday, July 22, 2019

मृग मरीचिका

मृग मरीचिका ..
निःसहाय,विरक्त हृदयी..
लक्ष्यहीन यात्रा से
थकी-माँदी,
गर्म रेतों पर
डगमगाते कदमों से
बढ़ी जाती है ...
देखती है एक ताल
रजतवर्णम् अम्बु से भरा,
कर देती है गति तीव्र ..
अमृत-प्राप्ति की ललक
भुला देती है
दिन-भर की थकन...
कंठ की शुष्कता
निर्धारित करती है लक्ष्य ..
अंततः...
कदाचित् प्राप्त कर लिया...
आह!! यह क्या ??
विलुप्त हो गया
मायावी ताल....
सोचती है "भ्रम था क्या??
नहीं,भ्रम नहीं ।।
दूरी अभी शेष है ।।"
पुनः निर्धारण होता है
नवीन लक्ष्य का...
चलता रहता है क्रम
जीवनपर्यंत ...
अकेली तो नहीं मृगा
मरुथल के कपटों में फँसी,
भुक्तभोगी हैं सभी जीव..
विचरते हैं रेगिस्तान में
पात्र लिए आस के...
विहीन रह जाते हैं मगर
अंजुरी-भर पय-पान से....

Saturday, July 20, 2019

यह जीवन तो विरह में बीता

यह जीवन तो विरह में बीता,
अन्य लोक में मिलें कभी।
तुम रहना बस हम होंगे ,
दृग में चंदा जले कभी।

निर्मित करना छोटी कुटिया ,
मैं उसको घर कर दूँगी ।
तुम बोना कुछ पुष्प प्रेम के ,
मैं उनमें रंग भर दूँगी ।
जब-जब सूरज तापे मुझको ,
बन कर साँझ चले आना ।
रहना मुझमें मेरा बनकर ,
'मैं-तुम' संग 'हम' बनें कभी ।
यह जीवन तो विरह में बीता,
अन्य लोक में मिलें कभी ।।१।।

मन,मन से ही बतिया लेगा,
नैनों-नैनों में शोर करेंगे ।
कुछ किस्से संबंधों वाले ,
रातें-रातें फिर भोर करेंगे ।
पाठ पढ़ाने ऊँच-नीच का,
कोई ग्रंथ ना आयेगा ।
प्रेम-नगर बसा लेना संग,
प्रेम-ग्रंथ फिर रचें कभी ।
यह जीवन तो विरह में बीता,
अन्य लोक में मिलें कभी ।।२।।

इस पीड़ा को मुस्कान बना
हम खिड़की पर टँक देंगे ।
आँसू लेकर अपने सारे,
सब गागर-सागर भर देंगे ।
भावुकता के मोती से तुम
मेरा शृंगार करा देना ।
मुझको थाम ना पाते हो,
पर एक-दूजे में ढलें कभी।
यह जीवन तो विरह में बीता,
अन्य लोक में मिलें कभी ।।३।।

Monday, July 15, 2019

सावन आने वाला है

कुछ प्रेममयी,कुछ द्वेष रहित,
सौगातें लाने वाला है ..
झमझम जैसी ध्वनियों संग,
अब सावन आने वाला है ।।

नयी-नवेली दुल्हन अब,
पीहर के सपने देखेगी..
प्रियतम की वो बाँहों में,
बन मयूरी अब चहकेगी..
बारिश वाली मिट्टी सी,
मेंहदी सौंधी महकेगी..
आँगन में वो झूले डाले,
संग सुहाग के झूलेगी..
चपला की वो गर्जन सुन,
स्वामी-वक्षों में सहमेगी..
प्रियतम अपनी प्यारी का,
संसार सजाने वाला है...
झमझम जैसी ध्वनियों संग,
अब सावन आने वाला है ।।१।।

सोलह साला कन्या वो,
कुछ नये वेश में सँवरेगी..
हरी चूड़ियों की हरियाली,
अपने तन पर खोजेगी..
वो कागज की नावें उसको,
अब कतई ना भायेंगी..
हर कागज के टुकड़े लेकर,
शब्द प्रेम के जोड़ेगी..
बागों वाले झूले पर वो,
संग सखियों के उछलेगी..
नयी उमर का खेल नया,
उसको तड़पाने वाला है...
झमझम जैसी ध्वनियों संग,
अब सावन आने वाला है ।।२।।

Saturday, July 13, 2019

संवेदना

संध्या-तट पर बैठे,
दर्शती हूँ कुछ बूँदें..
कुसुम पर पड़ते...
आभास होता है,
उनकी सजीवता का..
किस प्रकार
मनोहरता में डूबी,
जलकण को
सुख-साधन
बना लेती हैं...
खिल उठती हैं
स्पर्श मात्र से...
सुंदरता की इकाई से
प्राप्त होती हैं
अनंतता को.....
ठीक उसी प्रकार
जैसे नवयुवतियाँ
हर्षती हैं..
प्रेमी को पाकर...
उनके प्रभाव से
निखरते हुए
गढ़ती हैं परिभाषायें
प्रेम की ...
उर की व्यथा से
प्राप्त कर लेती हैं
संवेदना को....

Friday, July 12, 2019

अंतर्द्वंद

अंतर्द्वंद मेरे
झकझोरते हैं..
यदा-कदा
मस्तिष्क नसें
चढ़ने लगती हैं..
कोमल से भाव कभी
शूल सी प्रतीति
देते हैं..
भावों की अधिकता
जब आकाश छूती है..
चित्त पथभ्रमित
होने लगते हैं..
अनवरत् लिखने
की चाह
कचोटती है हृदय को..
शुद्धता का
आत्मीय चिंतन
बाँधे रखता है
विचारों में...
बरबस ही
उपजती है कोई रचना..
कलित अथवा अकलित...
प्रदान कर जाती है
मनस को
गहन आमोद..
जैसे
तृप्त हो जाता है
चातक
स्वाति के मिलन से...