कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।
मिलन-समागम हो ना हो,
श्वासों में श्वास तो भरता है ।।
आत्म-विचरता पंछी है ,
उड़-उड़ बहता आयेगा ..
लाख सुला लो अहसासें ,
जग-उठ तुम्हें सतायेगा ..
रोकोगे तुम बढ़ने से ,
सीमायें तब लाँघ चुकेगा ..
दीवारों से जब घेरोगे ,
पर्वत को भी पार चुकेगा ..
कायदे-नियम,ताने-वाने ;
सबसे आगे बढ़ता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।१।।
राधा के यह कान्हा सा ,
नटखट बाँसुरी वाला है ..
कान्हा के यह राधे सा ,
पावन-पूजित माला है ..
सदियों से यह प्रथा चली ,
पी-संगम, हाँ दुष्कर है ..
प्रभु ने भी दुःख झेला ,
उर उनके वेदन-पुष्कर है ..
सबको नीति-हर्ष सिखाकर ,
स्वयं विलाप तो करता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।२।।
लक्ष्य यदि ना पाया तो ,
जन्मों से यह सौदा कर ले ..
गेह में वास ना पाया तो ,
आँगन का यह पौधा बन ले ..
तरु से यह देना सीखे ,
तृण से कष्टों को सहना ..
नैत्रज से यह देह को सींचे ,
स्वाभाविक नित रात्रि बहना ..
स्वजन का यह मान रखे ,
भीतर-भीतर जलता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।३।।
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।
मिलन-समागम हो ना हो,
श्वासों में श्वास तो भरता है ।।
आत्म-विचरता पंछी है ,
उड़-उड़ बहता आयेगा ..
लाख सुला लो अहसासें ,
जग-उठ तुम्हें सतायेगा ..
रोकोगे तुम बढ़ने से ,
सीमायें तब लाँघ चुकेगा ..
दीवारों से जब घेरोगे ,
पर्वत को भी पार चुकेगा ..
कायदे-नियम,ताने-वाने ;
सबसे आगे बढ़ता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।१।।
राधा के यह कान्हा सा ,
नटखट बाँसुरी वाला है ..
कान्हा के यह राधे सा ,
पावन-पूजित माला है ..
सदियों से यह प्रथा चली ,
पी-संगम, हाँ दुष्कर है ..
प्रभु ने भी दुःख झेला ,
उर उनके वेदन-पुष्कर है ..
सबको नीति-हर्ष सिखाकर ,
स्वयं विलाप तो करता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।२।।
लक्ष्य यदि ना पाया तो ,
जन्मों से यह सौदा कर ले ..
गेह में वास ना पाया तो ,
आँगन का यह पौधा बन ले ..
तरु से यह देना सीखे ,
तृण से कष्टों को सहना ..
नैत्रज से यह देह को सींचे ,
स्वाभाविक नित रात्रि बहना ..
स्वजन का यह मान रखे ,
भीतर-भीतर जलता है ..
कैसे कह दूँ प्रेम अधूरा ?
यह पूर्ण कहीं तो करता है ।।३।।