Friday, July 12, 2019

अंतर्द्वंद

अंतर्द्वंद मेरे
झकझोरते हैं..
यदा-कदा
मस्तिष्क नसें
चढ़ने लगती हैं..
कोमल से भाव कभी
शूल सी प्रतीति
देते हैं..
भावों की अधिकता
जब आकाश छूती है..
चित्त पथभ्रमित
होने लगते हैं..
अनवरत् लिखने
की चाह
कचोटती है हृदय को..
शुद्धता का
आत्मीय चिंतन
बाँधे रखता है
विचारों में...
बरबस ही
उपजती है कोई रचना..
कलित अथवा अकलित...
प्रदान कर जाती है
मनस को
गहन आमोद..
जैसे
तृप्त हो जाता है
चातक
स्वाति के मिलन से...

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