Saturday, July 13, 2019

संवेदना

संध्या-तट पर बैठे,
दर्शती हूँ कुछ बूँदें..
कुसुम पर पड़ते...
आभास होता है,
उनकी सजीवता का..
किस प्रकार
मनोहरता में डूबी,
जलकण को
सुख-साधन
बना लेती हैं...
खिल उठती हैं
स्पर्श मात्र से...
सुंदरता की इकाई से
प्राप्त होती हैं
अनंतता को.....
ठीक उसी प्रकार
जैसे नवयुवतियाँ
हर्षती हैं..
प्रेमी को पाकर...
उनके प्रभाव से
निखरते हुए
गढ़ती हैं परिभाषायें
प्रेम की ...
उर की व्यथा से
प्राप्त कर लेती हैं
संवेदना को....

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