Saturday, February 15, 2020

सपने और प्रेमी

जब निकलोगे‌ ढूँढने
आशियाना
उसकी पलकों तले,
याद रखना
स्थान शेष नहीं है वहाँ
तुम्हारे ठहरने के लिए ।
उसकी घनी पलकों की
सघन छाँव में
तुमसे पहले ही
कुछ जिद्दी से सपने
डेरा डालकर
तय कर चुके हैं
स्थान अपना ।
तुम्हें क्या लगता है
यूँ ही खूबसूरत हैं
उसकी आँखें
या फिर तुम्हारे इश्क़ में
सँवर गयीं हैं?
नहीं, यह तो जादू है
उन बागी, अड़ियल‌ और
सामाजिक भाषा में
ढीठ सपनों का;
जिन्हें वह बड़ी सहजता से
छुपा लेती है यदा-कदा,
कभी रसोई के
मेवों वाले डिब्बे में,
तो कभी
आरती वाली पुस्तक में ।
छत का वह कोना
उसे इसीलिए प्रिय है क्योंकि
उसने देखा है
वह उमड़ता हुआ
बेख़ौफ़ पागलपन,
जो तुमने भी नहीं देखा ।
उसकी मासूम आँखों से
छलकते बूँद
गंगाजल से क्यों लगते हैं,
मालूम भी है?
हिमालय सरीखे
उच्च स्वप्नों का स्पर्श पा
ना जाने कितने ईंटों का
घाव सहा है उन्होंने,
तब जाकर मिली है
उसके गालों की भूमि ।
उसकी पलकों में
रहना चाहते हो?
तो करना होगा
समझौता तुम्हें
उन हठी सपनों से,
उसको अपनाने से पूर्व
स्वीकारना होगा
उसके प्यारे सपनों को ।
एक प्रेम-पत्र
उन्हें भी लिखना मन से,
कुछ गीतों का उपहार
उन पागल से
सपनों को भी देना ।
शर्तों का पुलिंदा
ना पेश़ करना उसके सामने,
चुनाव की नीति तो
उसे कभी ना बताना ;
क्योंकि
खाली तो कर देगी
तुम्हारे कहने पर
अपनी खूबसूरत पलकें
अंध-प्रेम में,
पर क्या रह पाओगे तुम
खंडहर से दिखने वाले
एक निर्जन से मकान में
ताउम्र??


Monday, February 3, 2020

अभी-अभी तारुण्य मिला है

सहमी-सकुची, घबरायी सी,
वह युद्ध क्षेत्र में आयी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है ।

बाला थी कभी नखरीली सी,
अपनी धुन में रहती थी ।
दादी वाली परी कथा को,
सत्य सहज समझती थी ।
माँ देती थी आँचल अपना,
सब प्रहर वहीं वह रहती थी ।
बाबा कहते थे सोनचिड़ी,
तब स्वर्ण सरल समझती थी ।
अब यथार्थ से टकराई तो
कुंदन बन तपने आयी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है।।१।।

प्रथम समय में ब्याह को जाना,
गुड्डे-गुड़ियों सा रीत सुहाना ।
"बिन सौदों के मेल होएगा",
मिलन को उसने कम आँका ।
छोटी उसकी शृंगार पेटी थी,
कुमकुम, सेन्हुर से भरती थी ।
अनभिज्ञ जगत-नियम से वह,
गहनों को रज-कण कहती थी ।
मोल बताया पापी जग ने तो
शृंगार से मुँह बिचकायी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है ।।२।।

क्यों बैठे वह भला तुला में,
वित्त ना उस सा हो पायेगा ।
उस सा गुण और भाव सुनहरे,
कृत्रिम पत्र ना ला पायेगा ।
निःस्वार्थ-निष्कपट प्रेम कभी,
मिथ जेवर से ना तोलो तुम ।
अनघ शगुन के आगे, मानुष !
बढ़ती गिनती ना बोलो तुम ।
तुम जैसों के कारण ही तो
देखो, कोयल चुप्पायी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है।।३।।


Sunday, February 2, 2020

अद्भुत जीवन

विभिन्न आयामों,
अनेक आकारों,
अपरिचित,
संदेहात्मक दिशाओं
से होकर गुजरता
चित-परिचित
परंतु
रहस्यात्मक जीवन;
स्वयं का होकर भी
स्वयं में नहीं होता ।
कहने को तो
हमारे होते हैं
सभी स्वप्न,
उनके उद्देश्य,
सारे निर्णय,
परिश्रम सभी
लक्ष्य-प्राप्ति के ।
किन्तु मूल में
होते हैं
कुछ अदृश्य,
अबोले व
अनसुने कारण;
जिन्हें
संबोधित करते हैं हम
कभी भाग्य
तो कभी माया कहकर ।
ढूंढते हैं प्रसन्नता
कभी हस्त-रेखा
तो कभी कुंडली दिखाकर ।
लाखों प्रयत्नों के बाद भी
सुलझा ना पाया कोई
जीवन के उलझे,
मुड़े से,बिखरे धागों को ।
कठपुतली सा जीवन
प्रारंभ होता है
अकारण स्वयं के
विलाप से
व समाप्त हो जाता है
अपनों के प्रेमपूर्ण-
दुःखमयी विलाप से ।
संपूर्ण जीवन के
ये ही दो विलाप
श्रव्य होते हैं
समाज के द्वारा ।
इस आदि व अन्त
के मध्य
होती हैं
अनगिनत रूदनें,
अनंत सिसकियाँ
किन्तु रहतीं हैं
मौन रूप में;
जो ना सुनाई देती हैं,
ना ही दिखाई देती हैं।
मात्र करते हुए
कर्म अपना
बनाती हैं
इतिहास व
दीर्घ काल तक
जीवित रहने वाली
कहानियाँ ।
इस प्रकार
बनती है
एक श्रृंखला
निर्जीव-सजीव सम्मिश्रित
जीवन की
और
हो जाता है नामकरण
इसका--
'अद्भुत' ।।