Monday, February 3, 2020

अभी-अभी तारुण्य मिला है

सहमी-सकुची, घबरायी सी,
वह युद्ध क्षेत्र में आयी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है ।

बाला थी कभी नखरीली सी,
अपनी धुन में रहती थी ।
दादी वाली परी कथा को,
सत्य सहज समझती थी ।
माँ देती थी आँचल अपना,
सब प्रहर वहीं वह रहती थी ।
बाबा कहते थे सोनचिड़ी,
तब स्वर्ण सरल समझती थी ।
अब यथार्थ से टकराई तो
कुंदन बन तपने आयी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है।।१।।

प्रथम समय में ब्याह को जाना,
गुड्डे-गुड़ियों सा रीत सुहाना ।
"बिन सौदों के मेल होएगा",
मिलन को उसने कम आँका ।
छोटी उसकी शृंगार पेटी थी,
कुमकुम, सेन्हुर से भरती थी ।
अनभिज्ञ जगत-नियम से वह,
गहनों को रज-कण कहती थी ।
मोल बताया पापी जग ने तो
शृंगार से मुँह बिचकायी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है ।।२।।

क्यों बैठे वह भला तुला में,
वित्त ना उस सा हो पायेगा ।
उस सा गुण और भाव सुनहरे,
कृत्रिम पत्र ना ला पायेगा ।
निःस्वार्थ-निष्कपट प्रेम कभी,
मिथ जेवर से ना तोलो तुम ।
अनघ शगुन के आगे, मानुष !
बढ़ती गिनती ना बोलो तुम ।
तुम जैसों के कारण ही तो
देखो, कोयल चुप्पायी है ।
अभी-अभी तारुण्य मिला है,
और मूल्य चुकाने आयी है।।३।।


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