विभिन्न आयामों,
अनेक आकारों,
अपरिचित,
संदेहात्मक दिशाओं
से होकर गुजरता
चित-परिचित
परंतु
रहस्यात्मक जीवन;
स्वयं का होकर भी
स्वयं में नहीं होता ।
कहने को तो
हमारे होते हैं
सभी स्वप्न,
उनके उद्देश्य,
सारे निर्णय,
परिश्रम सभी
लक्ष्य-प्राप्ति के ।
किन्तु मूल में
होते हैं
कुछ अदृश्य,
अबोले व
अनसुने कारण;
जिन्हें
संबोधित करते हैं हम
कभी भाग्य
तो कभी माया कहकर ।
ढूंढते हैं प्रसन्नता
कभी हस्त-रेखा
तो कभी कुंडली दिखाकर ।
लाखों प्रयत्नों के बाद भी
सुलझा ना पाया कोई
जीवन के उलझे,
मुड़े से,बिखरे धागों को ।
कठपुतली सा जीवन
प्रारंभ होता है
अकारण स्वयं के
विलाप से
व समाप्त हो जाता है
अपनों के प्रेमपूर्ण-
दुःखमयी विलाप से ।
संपूर्ण जीवन के
ये ही दो विलाप
श्रव्य होते हैं
समाज के द्वारा ।
इस आदि व अन्त
के मध्य
होती हैं
अनगिनत रूदनें,
अनंत सिसकियाँ
किन्तु रहतीं हैं
मौन रूप में;
जो ना सुनाई देती हैं,
ना ही दिखाई देती हैं।
मात्र करते हुए
कर्म अपना
बनाती हैं
इतिहास व
दीर्घ काल तक
जीवित रहने वाली
कहानियाँ ।
इस प्रकार
बनती है
एक श्रृंखला
निर्जीव-सजीव सम्मिश्रित
जीवन की
और
हो जाता है नामकरण
इसका--
'अद्भुत' ।।
अनेक आकारों,
अपरिचित,
संदेहात्मक दिशाओं
से होकर गुजरता
चित-परिचित
परंतु
रहस्यात्मक जीवन;
स्वयं का होकर भी
स्वयं में नहीं होता ।
कहने को तो
हमारे होते हैं
सभी स्वप्न,
उनके उद्देश्य,
सारे निर्णय,
परिश्रम सभी
लक्ष्य-प्राप्ति के ।
किन्तु मूल में
होते हैं
कुछ अदृश्य,
अबोले व
अनसुने कारण;
जिन्हें
संबोधित करते हैं हम
कभी भाग्य
तो कभी माया कहकर ।
ढूंढते हैं प्रसन्नता
कभी हस्त-रेखा
तो कभी कुंडली दिखाकर ।
लाखों प्रयत्नों के बाद भी
सुलझा ना पाया कोई
जीवन के उलझे,
मुड़े से,बिखरे धागों को ।
कठपुतली सा जीवन
प्रारंभ होता है
अकारण स्वयं के
विलाप से
व समाप्त हो जाता है
अपनों के प्रेमपूर्ण-
दुःखमयी विलाप से ।
संपूर्ण जीवन के
ये ही दो विलाप
श्रव्य होते हैं
समाज के द्वारा ।
इस आदि व अन्त
के मध्य
होती हैं
अनगिनत रूदनें,
अनंत सिसकियाँ
किन्तु रहतीं हैं
मौन रूप में;
जो ना सुनाई देती हैं,
ना ही दिखाई देती हैं।
मात्र करते हुए
कर्म अपना
बनाती हैं
इतिहास व
दीर्घ काल तक
जीवित रहने वाली
कहानियाँ ।
इस प्रकार
बनती है
एक श्रृंखला
निर्जीव-सजीव सम्मिश्रित
जीवन की
और
हो जाता है नामकरण
इसका--
'अद्भुत' ।।

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