Saturday, April 25, 2020

प्रतीक्षा में तुम्हारी मैं

प्रतीक्षा में तुम्हारी मैं, ना सोयी रात भर सजना ।
गुंथी वेणी नक्षत्रों की, सकल आकाश पर सजना ।।

बुहारे राह के कंटक, तुम्हारे पग की आशा में ।
भुलाई भौतिकी तृष्णा, तुम्हारी दृश्य-पिपासा में ।
कंटिका हैं चुभोती वक्ष का मध्य भाग ओ सजना ।
प्रतीक्षा में तुम्हारी मैं, ना सोयी रात भर सजना ।।

झरोखे बैठी, समीरण को अपलक ही निहारूँ मैं ।
निशा भर तेरी स्मृति से,अंबकजल खूब निखारूँ मैं ।
तेरी पुतली में मैं जड़ दूँ,‌ सुख के भाग्य सब सजना ।
गुंथी वेणी नक्षत्रों की, सकल आकाश पर सजना ।।

निर्झर सी प्रकृति लेकर, तेरे ही द्वार आयी हूँ ।
तुहिना भर कपोलों पर, तेरी चौखट पे आयी हूँ ।
तेरे बिन कट गया वपु जो, उसे उद्धार दो सजना ।
प्रतीक्षा में तुम्हारी मैं, ना सोयी रात भर सजना ।।

कलाएँ चंद्र की मुझको, प्रयत्न तेरे सुनातीं हैं ।
दिखा अभिसार को स्वप्न में,खुली आँखों सुलातीं हैं ।
सहस्रों युग का मैं यौवन,तुम्हीं पर वार दूँ सजना ।
गुंथी वेणी नक्षत्रों की, सकल आकाश पर सजना ।।


Sunday, April 19, 2020

तेरा मौन ही सुनती हूँ

संवाद संपूरित बंधों में
तेरा मौन ही सुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।

समर में उतरी है हृदय व्यथा,
सह में प्रेम , विपक्ष में भी ।
गगरी में मौन के प्रेम भरा,
है विजय, सूक्ष्म पराभव भी ।
युद्ध क्षेत्र की पराजित जड़ता
प्रेम आयुध से धुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।

उपवन की सभी सुमनावलियाँ
तेरे नामक हो गयीं हैं ।
मधुमास बना देह को मेरे
तेरा सावन हो गयीं हैं ।
अपनी काया शृंगार निमित्त
तेरा गंध मैं चुनती हूँ ।
संवाद संपूरित बंधों में
तेरा मौन ही सुनती हूँ ।

समर्पित तुम पर हर पुण्यकथा
जिनमें श्लोकों की जलधि है,
भाषा में ना बंधा है किन्तु
प्रेमार्थों की सम सन्धि है ।
उर में अपने उच्चारण तेरा
मंत्र तानों में गुनती हूँ ।
अनगढ़े तेरे हर प्रश्नों का
स्वयं ही उत्तर बुनती हूँ ।


Friday, April 17, 2020

दोहे

कंठी माला धार के ,जोगन कहाँ कहाय ।
करे सिद्ध जो प्रेम को,वह ना प्रेम सहाय ।।

परे जगत से प्रेम है, गणनाओं से दूर ।
रखे इसे जो तोल के, प्रेम नहीं वह सूर ।।

मंद लौ जो प्रेम पके, पाये रंग सुभाग ।
तरसे जो तन भोग को, सबसे बड़ा अभाग ।।

घट घट चुभता बाण हो, प्रेम रसीला घाव ।
पीर मिले जब प्रीत से, जन्मे पावन भाव ।।

परिसीमा ना प्रेम की, आखर स्वयं अछोर ।
है वर्णों में नित्यता, जैसे शम्भु अघोर ।।

Wednesday, April 15, 2020

तुमसे मन ये सरल हुआ है

ओ मन मेरे, मन के स्वामी ;
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।
तुममें ठहरा तो है लगता ,
निर्गुण था,अब सफल हुआ है ।।

शती मोह की मायाओं में
विभाग तेरा ही भाया है ।
बिन रण उतरे,जाने कितनों
को तुमने रज दिखलाया है ।
मेरे प्रेम के सरस गृह में
तेरा ही स्थल अचल हुआ है ।
तुममें ठहरा तो है लगता,
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।१।।

प्रेम को कहता प्रति प्रति अक्षर
तेरा स्वर्णिम प्रतिरूप लगे ।
विरह-विदा के क्षण में भी तू ,
संयोग विधा का रूप लगे ।
तू ही मेरे हिय का जोगी,
तू नयनों का कमल हुआ है ।
ओ मन मेरे, मन के स्वामी ;
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।२।।

तृषित नेत्र की है अभिलाषा
जल धारण गंगा घाट करे ।
अंगीकार करे ध्रुव तारा,
तन-मन तेरा आकाश करे ।
तेरी छाया छू ली मैंने,
मेरा भव तू सकल हुआ है।
तुममें ठहरा तो है लगता,
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।३।।


Tuesday, April 14, 2020

बलखाती नदी

बलखाती नदिया की,
प्रकृति है मुझ जैसी ;
तड़पे जो प्रेमी को तो,
लहरें बढ़ाती है ।।१।।

तनवा पे ज्वार भरे,
मनवा में आह भरे ;
गुप-चुप रोते रोते,
रतियाँ बिताती है ।।२।।

प्रेम की है पाठशाला,
प्रेम की ही परिणीता ;
अंजुरी में प्रेम लेके,
प्रेम को मनाती है ।।३।।

कहती "ओ लक्ष्य मेरे,
अंग भरो अंक मेरे" ;
सिमट के सागर में,
ठुमरी सुनाती है ।।४‌।।




Sunday, April 12, 2020

होंठों पर नमक रखने वाली लड़कियाँ

बड़ी कसैली होतीं हैं
होंठों पर नमक रखने वाली
लड़कियाँ !
नहीं फाँकतीं आठों पहर
शक्कर के बड़े-बड़े दाने ,
भ्रमित नहीं होतीं
उचित-अनुचित के भेद में ।
वो करतीं हैं परास्त शत्रुओं को
मौखिक ब्रह्मास्त्रों से ,
अपनी बहुप्रतीक्षित विजय पर
अधरों की सीमा लाँघ कर
हँसतीं हैं ।
ताक पर रख
व्यर्थ रीतियों की बेड़ियाँ,
स्वच्छंदता से
इठलाती हुई चलतीं हैं ।
पुकारता है समाज उन्हें
भिन्न-भिन्न विचित्र नामों से,
वो बनतीं हैं उदाहरण
उस स्थिति की, जहाँ पहुँचकर
स्त्री, स्त्री नहीं रहती
बन जाती है बोझिल गठरी
धृष्टता की, मनमानियों की ‌।
विशेषज्ञता प्राप्त है उन्हें
आग लगाने में ,
राख करके
सामाजिक कुटिल-नियमों को
उड़ जातीं हैं स्वयं
धुएँ के छल्लों की भाँति
लहराती हुई ।
चौखट से भी अधिक चौड़ी
होती जातीं हैं वो ,
ऊर्ध्व होतीं हैं अपनी चहारदीवारी
से भी अधिक ।
हाँ, बड़ी ही कसैली होतीं हैं
होंठों पर नमक रखने वाली
वो लड़कियाँ !!







Saturday, April 11, 2020

तुम पे ही

परे तुम से न जा पाऊँ, मिटा दूँ साँस तुम पे ही ।
कभी चुपके चले आओ, बिछा दूँ राह तुम पे ही ।

कि तुम बिन रात आधी है, अधूरी जन्म की बातें,
भरे इस दर्द के वन में, लुटा दूँ हास तुम पे ही ।।

कहो तुम देखते हो क्या,बड़े ही मनचले हो क्या ?
बुझे उस दीप की लौ में, निभा दूँ रात तुम पे ही ।।

बिठाया होंठ पर जो तिल, तुझी को ताकता रहता ,
पलक तुमसे चमकते हैं, सजा दूँ आँख तुम पे ही ।।

धड़कती सौ तरह धड़कन, पिया का नाम रहता है,
बुलातीं हैं तुझे जुल्फ़ें, भुला दूँ शाम तुम पे ही ।।


Tuesday, April 7, 2020

मैं तुम पर हार करके मन

मैं तुम पर हार करके मन, तुम्हारी जीत करती हूँ ।
तुम्हीं सरगम मेरे प्रियवर, तुम्हीं को गीत करती हूँ ।

जो तुम संग याम बीते हैं सुनहरे कल्प की भाँति ,
उन्हें रख नेत्र पर अपने, शृंगारित दीठ करती हूँ ।

मैं आयी हूँ तुम्हारे भाग्य, तुम्हारी प्रेम-पुजारन हूँ ,
बिना बंधन की काया अर्द्ध, तुम्हें हृदय मीत करती हूँ।

धरा पर जो ये फैली है सुगंधित पुष्प की अवलि,
उन्हें ले कर के करतल में, तुम्हें गुल वीर करती हूँ ।

कि मानो न मेरे प्रियतम, तुम्हें बिंदिया बनाऊँगी,
मेरे मन में विराजे तुम, प्रियम तुम्हें रीत करती हूँ ।


Wednesday, April 1, 2020

राम कहो, तुम आओगे क्या

राम कहो, तुम आओगे क्या ?
बुझते दीप जलाओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
स्मिति से अधर सजाओगे क्या ?

पड़े हुए हैं द्वेष धरा पे,
निश्छलता कम हुई धरा पे ।
कैसा सूना जगत हुआ है,
वात भी बिकती है धरा पे ।
प्रकृति की वह सुंदरी गाथा ,
श्रवण कराने आओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी,
बुझते दीप जलाओगे क्या ?

हो अवधपति तुम पति सिया के ,
वनवासी व योगी प्रिया के ।
सत् प्रियतम की तुम परिभाषा ,
वियोगी हरि व वेद श्रिया के ।
छलता अब है प्रेम यहाँ पे ,
प्रेम पढ़ाने आओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
स्मिति से अधर सजाओगे क्या ?

मर्यादित‌ विचार तुम्हारे,
प्रस्तर के भी तुम रखवाले ।
अनुबंधों के विजित प्रणेता ,
कर्म ही हैं धर्म तुम्हारे ।
हुई कर्म में यहाँ हीनता ,
धर्म पुनः बतलाओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
राम कहो, तुम आओगे क्या ?