राम कहो, तुम आओगे क्या ?
बुझते दीप जलाओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
स्मिति से अधर सजाओगे क्या ?
पड़े हुए हैं द्वेष धरा पे,
निश्छलता कम हुई धरा पे ।
कैसा सूना जगत हुआ है,
वात भी बिकती है धरा पे ।
प्रकृति की वह सुंदरी गाथा ,
श्रवण कराने आओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी,
बुझते दीप जलाओगे क्या ?
हो अवधपति तुम पति सिया के ,
वनवासी व योगी प्रिया के ।
सत् प्रियतम की तुम परिभाषा ,
वियोगी हरि व वेद श्रिया के ।
छलता अब है प्रेम यहाँ पे ,
प्रेम पढ़ाने आओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
स्मिति से अधर सजाओगे क्या ?
मर्यादित विचार तुम्हारे,
प्रस्तर के भी तुम रखवाले ।
अनुबंधों के विजित प्रणेता ,
कर्म ही हैं धर्म तुम्हारे ।
हुई कर्म में यहाँ हीनता ,
धर्म पुनः बतलाओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
राम कहो, तुम आओगे क्या ?
बुझते दीप जलाओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
स्मिति से अधर सजाओगे क्या ?
पड़े हुए हैं द्वेष धरा पे,
निश्छलता कम हुई धरा पे ।
कैसा सूना जगत हुआ है,
वात भी बिकती है धरा पे ।
प्रकृति की वह सुंदरी गाथा ,
श्रवण कराने आओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी,
बुझते दीप जलाओगे क्या ?
हो अवधपति तुम पति सिया के ,
वनवासी व योगी प्रिया के ।
सत् प्रियतम की तुम परिभाषा ,
वियोगी हरि व वेद श्रिया के ।
छलता अब है प्रेम यहाँ पे ,
प्रेम पढ़ाने आओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
स्मिति से अधर सजाओगे क्या ?
मर्यादित विचार तुम्हारे,
प्रस्तर के भी तुम रखवाले ।
अनुबंधों के विजित प्रणेता ,
कर्म ही हैं धर्म तुम्हारे ।
हुई कर्म में यहाँ हीनता ,
धर्म पुनः बतलाओगे क्या ?
तुम बिन जनता है शोकमयी ,
राम कहो, तुम आओगे क्या ?

उत्तम❤️❤️🙏जय श्री राम
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