Sunday, April 12, 2020

होंठों पर नमक रखने वाली लड़कियाँ

बड़ी कसैली होतीं हैं
होंठों पर नमक रखने वाली
लड़कियाँ !
नहीं फाँकतीं आठों पहर
शक्कर के बड़े-बड़े दाने ,
भ्रमित नहीं होतीं
उचित-अनुचित के भेद में ।
वो करतीं हैं परास्त शत्रुओं को
मौखिक ब्रह्मास्त्रों से ,
अपनी बहुप्रतीक्षित विजय पर
अधरों की सीमा लाँघ कर
हँसतीं हैं ।
ताक पर रख
व्यर्थ रीतियों की बेड़ियाँ,
स्वच्छंदता से
इठलाती हुई चलतीं हैं ।
पुकारता है समाज उन्हें
भिन्न-भिन्न विचित्र नामों से,
वो बनतीं हैं उदाहरण
उस स्थिति की, जहाँ पहुँचकर
स्त्री, स्त्री नहीं रहती
बन जाती है बोझिल गठरी
धृष्टता की, मनमानियों की ‌।
विशेषज्ञता प्राप्त है उन्हें
आग लगाने में ,
राख करके
सामाजिक कुटिल-नियमों को
उड़ जातीं हैं स्वयं
धुएँ के छल्लों की भाँति
लहराती हुई ।
चौखट से भी अधिक चौड़ी
होती जातीं हैं वो ,
ऊर्ध्व होतीं हैं अपनी चहारदीवारी
से भी अधिक ।
हाँ, बड़ी ही कसैली होतीं हैं
होंठों पर नमक रखने वाली
वो लड़कियाँ !!







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