बलखाती नदिया की,
प्रकृति है मुझ जैसी ;
तड़पे जो प्रेमी को तो,
लहरें बढ़ाती है ।।१।।
तनवा पे ज्वार भरे,
मनवा में आह भरे ;
गुप-चुप रोते रोते,
रतियाँ बिताती है ।।२।।
प्रेम की है पाठशाला,
प्रेम की ही परिणीता ;
अंजुरी में प्रेम लेके,
प्रेम को मनाती है ।।३।।
कहती "ओ लक्ष्य मेरे,
अंग भरो अंक मेरे" ;
सिमट के सागर में,
ठुमरी सुनाती है ।।४।।
प्रकृति है मुझ जैसी ;
तड़पे जो प्रेमी को तो,
लहरें बढ़ाती है ।।१।।
तनवा पे ज्वार भरे,
मनवा में आह भरे ;
गुप-चुप रोते रोते,
रतियाँ बिताती है ।।२।।
प्रेम की है पाठशाला,
प्रेम की ही परिणीता ;
अंजुरी में प्रेम लेके,
प्रेम को मनाती है ।।३।।
कहती "ओ लक्ष्य मेरे,
अंग भरो अंक मेरे" ;
सिमट के सागर में,
ठुमरी सुनाती है ।।४।।

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