Wednesday, November 27, 2019

शून्य

स्वीकार है मुझे
शून्य होना ।
हाँ स्वीकार है
तुच्छ होना ।
स्वयं जो अस्तित्वहीन
हो कर
समूचे ब्रह्मांड को
निर्मित कर दे ,
ओजपूर्ण है
ऐसा शून्य होना ।
साथ देने पर आऊँ
तो मूल्य बढ़ा दूँ ,
नष्ट करना चाहूँ
तो विलोप वहीं कर दूँ ,
गौरवान्वित है
ऐसा शून्य होना ।
स्वीकार है मुझे
शून्य होना ।
पूरी ना हो मुझ बिन
कोई गणना ,
मुझ बिन संभव
कोई अनुमान नहीं,
दुःख-सुख स्रोत
सभी मैं होऊँ ,
जिसका ना हो मापन
वो अंतरिक्ष मैं होऊँ ।
सौंदर्यपूर्ण है
ऐसा शून्य होना ।
हाँ स्वीकार है मुझे
अमूल्य होना ।

Saturday, November 23, 2019

वो जो कुछ धब्बे हैं न चंद्रमा पर ....

वो जो कुछ धब्बे हैं न
चंद्रमा पर ,
वो नहीं दिखाते
उसकी कुरूपता,
उसकी कमी,
अपूर्णता उसकी
परिलक्षित नहीं करते ।
वो बताते हैं कि
आदर्श कुछ नहीं होता,
पूर्णतया शुद्ध
कुछ नहीं होता ।
प्रतिशतता में शतांक
संभव नहीं ,
असंभव है किसी से
पूर्णता की अपेक्षा ।
व्यक्तित्व में होते हैं
दोनों ही ..
गुण-दोष, श्वेत-अश्वेत,
मीन-मेख,वेग-उद्वेग ।
भाग-निर्धारण
स्वयं ही करना है ,
स्वयं ही बनाने हैं
धन-ऋण के पाई चार्ट ।
धनात्मकता अधिक हुई तो
चंद्र का उजला भाग हो तुम..
जिसे देख
धब्बे भुला दिये जाते हैं व
यदि नकारात्मकता अधिक हुई,
तो वो धब्बा तुम ही हो ,
जो संपूर्ण प्रकाश निगल
मात्र अंधकार उगलता है ,
बन जाता है प्रतीक
चिर कुरूपता का ।।


Saturday, November 16, 2019

पूछो ही मत तुम जानां

तुम बिन जीवन कैसा है ये,
पूछो ही मत तुम जानां ।
जैसे सावन सूखा हो और
फागुन रंगों का जाना ।

तेरी बातें ऐसी जैसे ,
कविता में रंग जो भर दे ।
तुमसे मिलना साँसों में ,
आयु थोड़ी फिर जड़ दे ।
चुंबन तेरा भीतर-भीतर ,
सुलगाये जैसे पल-पल ।
आलिंगन तेरा जैसे ,
फूलों से मुझको मढ़ दे ।
तुमको लिखना सबसे सुंदर ,
प्रेम तुम्हीं से क्यों जानां ?
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।

रतरानी सी गंध कमर पर,
सिद्ध तुम्हें हाँ करतीं हैं ।
बिन काजल की मेरी आँखें ,
सौंदर्य अर्थ को गढ़तीं हैं ।
स्पर्श तुम्हारा हो जाता तो
बगिया मैं बन जाती हूँ ।
तारों की सब प्रेमी लड़ियाँ ,
पूर्ण चंद्र को करतीं हैं ।
प्रश्न सदा ही रहता वो ही,
विरह-क्षणें कब तक जानां ?
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।

तुमसे मंदिर, तुमसे पूजा ,
उपवास सभी तो तुमसे हैं ।
तुम हो तो वो ईश्वर है ,
विश्वास सभी हाँ तुमसे हैं ।
भाग्यों वाली रेखा में माना
तुम साजन ना बैठे हो ।
प्रेम-कहानी उच्चतम अपनी ,
इतिहास सुनहरे तुमसे हैं ।
अंतिम वेदी पर मेरी तुम ,
स्वप्न सभी रखना जानां ।
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।



Monday, November 11, 2019

मेरी 'माँ' सी धड़कन


उजालों में भी रौनकेंं दिखती नहीं शहरों में,
बागों में रंग-ए-खुशबू,मीठी हलचलें बीते जमाने की थी ।

छुप कर रोना, छुपा लेना दर्द-ए-रूह को,
ये हुनर तब आया,जब अपने ने करी छेड़खानी सी थी।

आ गया वक्त के संग थाम लेना लहरों को,
बड़बड़ करती झल्ली लड़की,बचपन-ए-कहानी की थी।

चाहत बन गयी हजारों शख्सियत की मैं,
चाहत तो एक कुर्बान होती मुहब्बत-ए-वादी की थी ।

हुस्न-ए-रंगत के आगे किसी ने देखा नहीं,
वरना मैं भी खूबसूरत किसी मासूम शहजादी सी थी।

दुखाया हर रिश्ते ने एक-एक कर के,
मेरी 'माँ' सी धड़कन कहाँ किसी रिश्तेदारी में थी ।



Friday, November 1, 2019

सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर

अर्पित तुम पर प्रति रोम-रोम,
तुझमें डूबी पिय पोर-पोर ।
आओ मेरे हृदि- मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।

तुम हो जीवन के रेख-बिन्दु से,
तुम ही मृत्यु के प्रिय तट सिन्धु ।
तुमको जीना यूँ गीत सरीखा ,
मरना जैसे अंक शिव-शम्भु ।
तुमसे ही उगती मेरी भोर-भोर ,
उत्सर्ग तुमपर नैनों के कोर-कोर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।

कल्पित सागर के मोती तुम ,
मेरी प्रेम-कथा के सत्-नायक ।
मैं बुनती शब्द-अक्षर में तुमको ,
तेरे स्वर मेरी कविता के गायक ।
बन बैठे तुम ही चित्त चोर-चोर,
तुमको ही खोजूं सब ओर-ओर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।

माथे पर पड़ता बल तुम ही हो,
करतल पर बैठे तब क्यूँ ना हो ?
मुखड़े की द्युति तुमसे ही है ,
माँग में सजते तुम क्यूँ ना हो ?
तुमसे ही जन्मों का मोल-मोल ,
तुमसे जुड़ते नस डोर-डोर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।