Saturday, November 16, 2019

पूछो ही मत तुम जानां

तुम बिन जीवन कैसा है ये,
पूछो ही मत तुम जानां ।
जैसे सावन सूखा हो और
फागुन रंगों का जाना ।

तेरी बातें ऐसी जैसे ,
कविता में रंग जो भर दे ।
तुमसे मिलना साँसों में ,
आयु थोड़ी फिर जड़ दे ।
चुंबन तेरा भीतर-भीतर ,
सुलगाये जैसे पल-पल ।
आलिंगन तेरा जैसे ,
फूलों से मुझको मढ़ दे ।
तुमको लिखना सबसे सुंदर ,
प्रेम तुम्हीं से क्यों जानां ?
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।

रतरानी सी गंध कमर पर,
सिद्ध तुम्हें हाँ करतीं हैं ।
बिन काजल की मेरी आँखें ,
सौंदर्य अर्थ को गढ़तीं हैं ।
स्पर्श तुम्हारा हो जाता तो
बगिया मैं बन जाती हूँ ।
तारों की सब प्रेमी लड़ियाँ ,
पूर्ण चंद्र को करतीं हैं ।
प्रश्न सदा ही रहता वो ही,
विरह-क्षणें कब तक जानां ?
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।

तुमसे मंदिर, तुमसे पूजा ,
उपवास सभी तो तुमसे हैं ।
तुम हो तो वो ईश्वर है ,
विश्वास सभी हाँ तुमसे हैं ।
भाग्यों वाली रेखा में माना
तुम साजन ना बैठे हो ।
प्रेम-कहानी उच्चतम अपनी ,
इतिहास सुनहरे तुमसे हैं ।
अंतिम वेदी पर मेरी तुम ,
स्वप्न सभी रखना जानां ।
तुम बिन जीवन कैसा है ये ,
पूछो ही मत तुम जानां ।



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