Monday, November 11, 2019

मेरी 'माँ' सी धड़कन


उजालों में भी रौनकेंं दिखती नहीं शहरों में,
बागों में रंग-ए-खुशबू,मीठी हलचलें बीते जमाने की थी ।

छुप कर रोना, छुपा लेना दर्द-ए-रूह को,
ये हुनर तब आया,जब अपने ने करी छेड़खानी सी थी।

आ गया वक्त के संग थाम लेना लहरों को,
बड़बड़ करती झल्ली लड़की,बचपन-ए-कहानी की थी।

चाहत बन गयी हजारों शख्सियत की मैं,
चाहत तो एक कुर्बान होती मुहब्बत-ए-वादी की थी ।

हुस्न-ए-रंगत के आगे किसी ने देखा नहीं,
वरना मैं भी खूबसूरत किसी मासूम शहजादी सी थी।

दुखाया हर रिश्ते ने एक-एक कर के,
मेरी 'माँ' सी धड़कन कहाँ किसी रिश्तेदारी में थी ।



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