Friday, November 1, 2019

सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर

अर्पित तुम पर प्रति रोम-रोम,
तुझमें डूबी पिय पोर-पोर ।
आओ मेरे हृदि- मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।

तुम हो जीवन के रेख-बिन्दु से,
तुम ही मृत्यु के प्रिय तट सिन्धु ।
तुमको जीना यूँ गीत सरीखा ,
मरना जैसे अंक शिव-शम्भु ।
तुमसे ही उगती मेरी भोर-भोर ,
उत्सर्ग तुमपर नैनों के कोर-कोर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।

कल्पित सागर के मोती तुम ,
मेरी प्रेम-कथा के सत्-नायक ।
मैं बुनती शब्द-अक्षर में तुमको ,
तेरे स्वर मेरी कविता के गायक ।
बन बैठे तुम ही चित्त चोर-चोर,
तुमको ही खोजूं सब ओर-ओर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में ,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।

माथे पर पड़ता बल तुम ही हो,
करतल पर बैठे तब क्यूँ ना हो ?
मुखड़े की द्युति तुमसे ही है ,
माँग में सजते तुम क्यूँ ना हो ?
तुमसे ही जन्मों का मोल-मोल ,
तुमसे जुड़ते नस डोर-डोर ।
आओ मेरे हृदि-मंदिर में,
सौंपूं तुमको प्रति छोर-छोर ।।



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