वीणा के झंकृत तानों में,
गायन के सुर-निनादों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।
तुमसे ही है लेखन निखरा,
तुम आयी तो पुष्प महका ।
मधुमास तुम्हारे होने से,
पीत-वसन अनुपम ओढ़ा ।
सरसों के कोमल भागों में,
चुनरी के पीले धागों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।
कोकिल ने स्वर तुमसे पाया,
उपजी तुमसे प्रकृति-माया ।
ऋषियों का गहरा ज्ञान सरस,
कुछ और नहीं, तुम्हरी छाया ।
वासंंती वात सुवासों में,
सुंदरता के व्याख्यानों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।
सरल कमल से दृग तुम्हरे,
पुस्तक शोभित कर में तुम्हरे ।
माथे पर तेज दिवाकर सा,
सौंदर्य सजे मन में तुम्हरे ।
पंखुड़ियों के आधारों में,
मेधा के सब आख्यानों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।
गायन के सुर-निनादों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।
तुमसे ही है लेखन निखरा,
तुम आयी तो पुष्प महका ।
मधुमास तुम्हारे होने से,
पीत-वसन अनुपम ओढ़ा ।
सरसों के कोमल भागों में,
चुनरी के पीले धागों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।
कोकिल ने स्वर तुमसे पाया,
उपजी तुमसे प्रकृति-माया ।
ऋषियों का गहरा ज्ञान सरस,
कुछ और नहीं, तुम्हरी छाया ।
वासंंती वात सुवासों में,
सुंदरता के व्याख्यानों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।
सरल कमल से दृग तुम्हरे,
पुस्तक शोभित कर में तुम्हरे ।
माथे पर तेज दिवाकर सा,
सौंदर्य सजे मन में तुम्हरे ।
पंखुड़ियों के आधारों में,
मेधा के सब आख्यानों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।

