Thursday, January 30, 2020

माँ सरस्वती (वंदना)

वीणा के झंकृत तानों में,
गायन के सुर-निनादों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।

तुमसे ही है लेखन निखरा,
तुम आयी तो पुष्प महका ।
मधुमास तुम्हारे होने से,
पीत-वसन अनुपम ओढ़ा ।
सरसों के कोमल भागों में,
चुनरी के पीले धागों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।

कोकिल ने स्वर तुमसे पाया,
उपजी तुमसे प्रकृति-माया ।
ऋषियों का गहरा ज्ञान सरस,
कुछ और नहीं, तुम्हरी छाया ।
वासंंती वात सुवासों में,
सुंदरता के व्याख्यानों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।

सरल कमल से दृग तुम्हरे,
पुस्तक शोभित कर में तुम्हरे ।
माथे पर तेज दिवाकर सा,
सौंदर्य सजे मन में तुम्हरे ।
पंखुड़ियों के आधारों में,
मेधा के सब आख्यानों में,
तुम हो माँ! हाँ,तुम ही तो हो;
गीतों के अन्तःस्थानों में ।।


Wednesday, January 1, 2020

प्रेम

मैं तुमसे प्रेम करती हूँ,
यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं।
किन्तु
मैं तुम्हारे प्रेम को जीती हूँ,
मरती हूँ प्रति क्षण
तुम्हारे प्रेम में,
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है ..
क्योंकि 'करना' तो
मात्र एक क्रिया है,
जो समय के साथ
वर्तमान से भूत में
परिवर्तित हो जाती है।
परंतु 'जीना' व 'मरना'
शाश्वत प्रक्रियाएँ है,
जो सभी परिवर्तनों के बाद भी
चलती रहतीं हैं
निर्बाध गति से
अपरिमित काल तक।।