Wednesday, April 15, 2020

तुमसे मन ये सरल हुआ है

ओ मन मेरे, मन के स्वामी ;
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।
तुममें ठहरा तो है लगता ,
निर्गुण था,अब सफल हुआ है ।।

शती मोह की मायाओं में
विभाग तेरा ही भाया है ।
बिन रण उतरे,जाने कितनों
को तुमने रज दिखलाया है ।
मेरे प्रेम के सरस गृह में
तेरा ही स्थल अचल हुआ है ।
तुममें ठहरा तो है लगता,
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।१।।

प्रेम को कहता प्रति प्रति अक्षर
तेरा स्वर्णिम प्रतिरूप लगे ।
विरह-विदा के क्षण में भी तू ,
संयोग विधा का रूप लगे ।
तू ही मेरे हिय का जोगी,
तू नयनों का कमल हुआ है ।
ओ मन मेरे, मन के स्वामी ;
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।२।।

तृषित नेत्र की है अभिलाषा
जल धारण गंगा घाट करे ।
अंगीकार करे ध्रुव तारा,
तन-मन तेरा आकाश करे ।
तेरी छाया छू ली मैंने,
मेरा भव तू सकल हुआ है।
तुममें ठहरा तो है लगता,
तुमसे मन ये सरल हुआ है ।।३।।


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