कंठी माला धार के ,जोगन कहाँ कहाय ।
करे सिद्ध जो प्रेम को,वह ना प्रेम सहाय ।।
परे जगत से प्रेम है, गणनाओं से दूर ।
रखे इसे जो तोल के, प्रेम नहीं वह सूर ।।
मंद लौ जो प्रेम पके, पाये रंग सुभाग ।
तरसे जो तन भोग को, सबसे बड़ा अभाग ।।
घट घट चुभता बाण हो, प्रेम रसीला घाव ।
पीर मिले जब प्रीत से, जन्मे पावन भाव ।।
परिसीमा ना प्रेम की, आखर स्वयं अछोर ।
है वर्णों में नित्यता, जैसे शम्भु अघोर ।।
करे सिद्ध जो प्रेम को,वह ना प्रेम सहाय ।।
परे जगत से प्रेम है, गणनाओं से दूर ।
रखे इसे जो तोल के, प्रेम नहीं वह सूर ।।
मंद लौ जो प्रेम पके, पाये रंग सुभाग ।
तरसे जो तन भोग को, सबसे बड़ा अभाग ।।
घट घट चुभता बाण हो, प्रेम रसीला घाव ।
पीर मिले जब प्रीत से, जन्मे पावन भाव ।।
परिसीमा ना प्रेम की, आखर स्वयं अछोर ।
है वर्णों में नित्यता, जैसे शम्भु अघोर ।।
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