मृग मरीचिका ..
निःसहाय,विरक्त हृदयी..
लक्ष्यहीन यात्रा से
थकी-माँदी,
गर्म रेतों पर
डगमगाते कदमों से
बढ़ी जाती है ...
देखती है एक ताल
रजतवर्णम् अम्बु से भरा,
कर देती है गति तीव्र ..
अमृत-प्राप्ति की ललक
भुला देती है
दिन-भर की थकन...
कंठ की शुष्कता
निर्धारित करती है लक्ष्य ..
अंततः...
कदाचित् प्राप्त कर लिया...
आह!! यह क्या ??
विलुप्त हो गया
मायावी ताल....
सोचती है "भ्रम था क्या??
नहीं,भ्रम नहीं ।।
दूरी अभी शेष है ।।"
पुनः निर्धारण होता है
नवीन लक्ष्य का...
चलता रहता है क्रम
जीवनपर्यंत ...
अकेली तो नहीं मृगा
मरुथल के कपटों में फँसी,
भुक्तभोगी हैं सभी जीव..
विचरते हैं रेगिस्तान में
पात्र लिए आस के...
विहीन रह जाते हैं मगर
अंजुरी-भर पय-पान से....
निःसहाय,विरक्त हृदयी..
लक्ष्यहीन यात्रा से
थकी-माँदी,
गर्म रेतों पर
डगमगाते कदमों से
बढ़ी जाती है ...
देखती है एक ताल
रजतवर्णम् अम्बु से भरा,
कर देती है गति तीव्र ..
अमृत-प्राप्ति की ललक
भुला देती है
दिन-भर की थकन...
कंठ की शुष्कता
निर्धारित करती है लक्ष्य ..
अंततः...
कदाचित् प्राप्त कर लिया...
आह!! यह क्या ??
विलुप्त हो गया
मायावी ताल....
सोचती है "भ्रम था क्या??
नहीं,भ्रम नहीं ।।
दूरी अभी शेष है ।।"
पुनः निर्धारण होता है
नवीन लक्ष्य का...
चलता रहता है क्रम
जीवनपर्यंत ...
अकेली तो नहीं मृगा
मरुथल के कपटों में फँसी,
भुक्तभोगी हैं सभी जीव..
विचरते हैं रेगिस्तान में
पात्र लिए आस के...
विहीन रह जाते हैं मगर
अंजुरी-भर पय-पान से....
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