Saturday, June 29, 2019

किसी कवि की कल्पना बनना चाहती हूँ

किसी कवि की कल्पना बनना चाहती हूँ ,
किसी कलम की तमन्ना बनना चाहती हूँ ।
चाहत है मुझे किसी की गज़ल बनूँ ,
किसी महबूब की मैं गीत बनूँ ,
कोई सुंदर सी मैं नज़्म बन पन्ने पर उतारी जाऊँ,
मेरे लिए पढ़ी जाये कविता महफिल में,
कविता के रूप में मैं सराही जाऊँ ।

मालूम है मुझे ,
बहुत हसीन नहीं मैं ।
सुंदरता के पैमाने पर खरी उतरती
व्यक्तित्व नहीं मैं ।
फिर भी ख्वाहिश है ,
चाँद से तुलना हो मेरी ।
कोई शायर हो,जो झील देख ले
आँखों में मेरी ।
यूँ तो तारीफ़ें मिलती रहती हैं ,
पर इच्छा है ..
अंदाज ज़रा शायराना हो ।
बातें तो अभी भी होती हैं मेरी ,
पर जो महफिल लूट सके ..
वो शायरी कातिलाना हो ।
शब्दजाल के बंधन से कोई ,
मुझे परिभाषित करे ।
इश्क और कविता की पर्याय बनूँ ,
कोई यूँ मुझे परावर्तित करे ।
लफ्ज़ों के मोती के
केंद्र में मैं बैठूं ,
काव्य रूपी बगिया के
फूलों सी महकूं ,
कोई मुझको यूँ लिख दे कि
श्रृंगार रस की उदाहरण बन जाऊँ ।
फिर तत्पर ही मन की शक्ति को
यूँ पढ़ दे कि
वीर रस की उदाहरण बन जाऊँ ।

कोई मुझमें भी राधा सी प्रेयसी देखे ,
मीरा सी भक्ति मुझमें भी प्रदर्शित हो ,
मैं प्रसाद की अब श्रद्धा बनना चाहती हूँ ,
किसी कवि की कल्पना बनना चाहती हूँ ।।।

2 comments:

  1. सिर्फ ये ख़ाक के बदन है ,जो तेरे काम की है,और तो दश्त (हाथ का सामान पड़ा है मुझमे.जैसे गुजरा हो कोई दरवेश ए ख्याल वक्त ने शायद ठीक से बरता नहीं मुझको ,अभी भी इक सुलगता हुआ लोबान पड़ा है मुझमें

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