गर्मियों की रात में खुले आसमान के नीचे ,
अम्मा की गोद में परियों की कहानी सुनना ।
वो हर साल मुहर्रम, दशहरे के मेले में,
बाबा का शौक से मिठाइयाँ और खिलौने लाना।
वो बारिश के मौसम में छत से टपकती बूँदों को,
कटोरी में भरते-भरते उसको खेल बना जाना।
ठिठुरती हुई ठंड में कोयले की आग जलाकर ,
बार -बार उसमें आलू और बैंगन पकाते जाना।
कितने सारे किस्से हैं उस बचपन के आँगन के ,
कितनी सारी यादें हैं उस घर मिट्टी वाले के।
अम्मा की बातें, बाबा के गाने,
बुआ का दुपट्टा, चाचा के फ़साने।
सब कुछ बहुत याद आता है ,
वो मिट्टी वाला घर हमेशा याद आता है ।।
अम्मा की गोद में परियों की कहानी सुनना ।
वो हर साल मुहर्रम, दशहरे के मेले में,
बाबा का शौक से मिठाइयाँ और खिलौने लाना।
वो बारिश के मौसम में छत से टपकती बूँदों को,
कटोरी में भरते-भरते उसको खेल बना जाना।
ठिठुरती हुई ठंड में कोयले की आग जलाकर ,
बार -बार उसमें आलू और बैंगन पकाते जाना।
कितने सारे किस्से हैं उस बचपन के आँगन के ,
कितनी सारी यादें हैं उस घर मिट्टी वाले के।
अम्मा की बातें, बाबा के गाने,
बुआ का दुपट्टा, चाचा के फ़साने।
सब कुछ बहुत याद आता है ,
वो मिट्टी वाला घर हमेशा याद आता है ।।
आपने उस समय की याद दिला दी जब लोगो के पास वक्त था।
ReplyDeleteAwesome
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