सूखापन, ये सूनापन ..
हृदय का मेरे,
प्रतीक्षारत् देख रहा है..
अम्बर को...
यह लहलहाती, इठलाती ..
करती घुमड़-घुमड़ हवा,
कोई संदेशा दे रही है ,
जन-जन को...
दूत बन ये आयी है देव इन्द्र की,
ठुमक-ठुमक के मन मचलाती ...
यौवन दिखा रही है मेरा,
दरपन को...
प्रगाढ़ प्रतीक्षा वर्षा की,
व सौंधी सुगंध माटी की ..
महका रही है अभी से मेरे,
अंग-अंग को...
हृदय का मेरे,
प्रतीक्षारत् देख रहा है..
अम्बर को...
यह लहलहाती, इठलाती ..
करती घुमड़-घुमड़ हवा,
कोई संदेशा दे रही है ,
जन-जन को...
दूत बन ये आयी है देव इन्द्र की,
ठुमक-ठुमक के मन मचलाती ...
यौवन दिखा रही है मेरा,
दरपन को...
प्रगाढ़ प्रतीक्षा वर्षा की,
व सौंधी सुगंध माटी की ..
महका रही है अभी से मेरे,
अंग-अंग को...
Bahut sundar
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