उजलापन तपती साँसों का,
यौवनता की चमक-दमक ।
मौलिकता सबकी तुमसे ही,
तुम देह का मेरे चंदन हो ।।
सादेपन के शृंगार सभी,
भावों के तुम स्रोत प्रमुख ।
सौंदर्य तुम्हारे लोचन में ही,
तुम नेत्र का मेरे अंजन हो ।।
जन्मों के तुम भाग्य-पुरुष,
आवाजाही का कारण ।
विष तुम औ अमृत तुम ही,
तुम मन में घुलता मंथन हो ।।
चैतन्य प्रेम के शीर्ष पे हम,
आत्म को छूता है चुंबन ।
प्राणों पर स्वत्व तुम्हारा ही,
तुम हिय का मेरे कंपन हो ।।
मंत्रों के प्रति उच्चारण पर,
तुमसा होता अभिमत स्वर।
मन मंदिर तुमसे मिलते ही,
तुम नेह का मेरे वंदन हो ।।
यौवनता की चमक-दमक ।
मौलिकता सबकी तुमसे ही,
तुम देह का मेरे चंदन हो ।।
सादेपन के शृंगार सभी,
भावों के तुम स्रोत प्रमुख ।
सौंदर्य तुम्हारे लोचन में ही,
तुम नेत्र का मेरे अंजन हो ।।
जन्मों के तुम भाग्य-पुरुष,
आवाजाही का कारण ।
विष तुम औ अमृत तुम ही,
तुम मन में घुलता मंथन हो ।।
चैतन्य प्रेम के शीर्ष पे हम,
आत्म को छूता है चुंबन ।
प्राणों पर स्वत्व तुम्हारा ही,
तुम हिय का मेरे कंपन हो ।।
मंत्रों के प्रति उच्चारण पर,
तुमसा होता अभिमत स्वर।
मन मंदिर तुमसे मिलते ही,
तुम नेह का मेरे वंदन हो ।।

अनहद❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
ReplyDeleteअनहद❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
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