मुझे बहुत प्रिय हैं
अपनी आँखों के नीचे
पड़ी हुई झाँइयाँ !
ये नहीं हैं प्रतीक
मेरी निर्बलता की,
मेरे दुःखों को
नहीं दर्शाती हैं ये,
नहीं लगातीं मुझ पर
कुरूपता का दोष ,
इनका कालापन
मेरे जीवन का धब्बा नहीं है !
ये करतीं हैं सिद्ध कि
झोंक दी है मैंने
अपनी आँखें
सत्यता की ज्वाला में,
जीवन-संघर्षों में
मैंने किस प्रकार
योद्धा बनाया है
अपनी आँखों को,
ये प्रमाण हैं उसका ।
जब भी पीड़ाओं को
सबसे छिपा कर
मात्र स्वयं में भरना चाहती हूँ,
तब-तब उभरती हैं ये !
लक्ष्य-प्राप्ति में जब-जब
तपती हूँ,
तब-तब उगती हैं ये !
मैं नहीं ढँकना चाहती इन्हें
बाह्य आवरणों से,
इनके अस्तित्व पर
मुझे लाज नहीं आती !
मेरी आँखों के लिए
काजल जैसी हैं ये,
मेरे मुखड़े का
अभिन्न अंग ,
अनवरत अपनी
धाक जमाती,
चंद्र की काया पर पड़ते
चिह्नों जैसी हैं ये !!
अपनी आँखों के नीचे
पड़ी हुई झाँइयाँ !
ये नहीं हैं प्रतीक
मेरी निर्बलता की,
मेरे दुःखों को
नहीं दर्शाती हैं ये,
नहीं लगातीं मुझ पर
कुरूपता का दोष ,
इनका कालापन
मेरे जीवन का धब्बा नहीं है !
ये करतीं हैं सिद्ध कि
झोंक दी है मैंने
अपनी आँखें
सत्यता की ज्वाला में,
जीवन-संघर्षों में
मैंने किस प्रकार
योद्धा बनाया है
अपनी आँखों को,
ये प्रमाण हैं उसका ।
जब भी पीड़ाओं को
सबसे छिपा कर
मात्र स्वयं में भरना चाहती हूँ,
तब-तब उभरती हैं ये !
लक्ष्य-प्राप्ति में जब-जब
तपती हूँ,
तब-तब उगती हैं ये !
मैं नहीं ढँकना चाहती इन्हें
बाह्य आवरणों से,
इनके अस्तित्व पर
मुझे लाज नहीं आती !
मेरी आँखों के लिए
काजल जैसी हैं ये,
मेरे मुखड़े का
अभिन्न अंग ,
अनवरत अपनी
धाक जमाती,
चंद्र की काया पर पड़ते
चिह्नों जैसी हैं ये !!

❤️❤️❤️🌱❤️❤️❤️
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