एक शिवाला मेरे भीतर, सती रूप मुझमें है।
भस्म हुई यदि हिय ज्वाला से, निस्तारण मुझमें है।
संवेदन की सारी गतियाँ, मुझमें ही पनपीं हैं।
मुझमें आकर क्रोध तरंगें, गर्जन सी खनकीं हैं ।
मैं खींचूँ जो प्रत्यंचा को, वात-वेग बढ़ जाए ।
मेरे कर्णपटल में घुलने, नद मधु लोरी गाए ।
सावन माँगे दृग्जल मेरा, वसंत स्मिति मेरी है ।
मुझमें निर्मित वेद-कहानी, कथा-प्रीति मेरी है ।
सावित्री की सबल तपस्या ,सरल भक्ति शबरी की ।
चपल छबीली की मैं छाया, हूँ मेधा विदुषी की ।
कण-कण उज्ज्वल मेरे मुख से, सुरभित मुझसे बारी ।
पीड़ा तोड़े अस्थि भले पर, इच्छा मेरी भारी ।
उन्नत आशा मैं धरती की, कुंजी सब भावों की ।
मन पर लेकर ठोकर सारी, हूँ बूटी घावों की ।
अपनी चुनरी लहरा कर के, कर दूँ नभ सतरंगी ।
दीप्त कुटुंबों को कर दूँ मैं, बन प्रकाश की संगी ।
मेरा जीवन मेरा ही था, पर मैंने प्रेम लिया ।
रोआँ-रोआँ बाँट दिया सब, ना कोई आह किया ।
मैं ही अपनी हूँ निर्मात्री, अंत स्व की मैं ही हूँ ।
प्रेम-समर्पण की परिभाषा, प्रकृति सी मैं ही हूँ ।
(सार छंद)
भस्म हुई यदि हिय ज्वाला से, निस्तारण मुझमें है।
संवेदन की सारी गतियाँ, मुझमें ही पनपीं हैं।
मुझमें आकर क्रोध तरंगें, गर्जन सी खनकीं हैं ।
मैं खींचूँ जो प्रत्यंचा को, वात-वेग बढ़ जाए ।
मेरे कर्णपटल में घुलने, नद मधु लोरी गाए ।
सावन माँगे दृग्जल मेरा, वसंत स्मिति मेरी है ।
मुझमें निर्मित वेद-कहानी, कथा-प्रीति मेरी है ।
सावित्री की सबल तपस्या ,सरल भक्ति शबरी की ।
चपल छबीली की मैं छाया, हूँ मेधा विदुषी की ।
कण-कण उज्ज्वल मेरे मुख से, सुरभित मुझसे बारी ।
पीड़ा तोड़े अस्थि भले पर, इच्छा मेरी भारी ।
उन्नत आशा मैं धरती की, कुंजी सब भावों की ।
मन पर लेकर ठोकर सारी, हूँ बूटी घावों की ।
अपनी चुनरी लहरा कर के, कर दूँ नभ सतरंगी ।
दीप्त कुटुंबों को कर दूँ मैं, बन प्रकाश की संगी ।
मेरा जीवन मेरा ही था, पर मैंने प्रेम लिया ।
रोआँ-रोआँ बाँट दिया सब, ना कोई आह किया ।
मैं ही अपनी हूँ निर्मात्री, अंत स्व की मैं ही हूँ ।
प्रेम-समर्पण की परिभाषा, प्रकृति सी मैं ही हूँ ।
(सार छंद)

No comments:
Post a Comment