कटि पर पीत वसन लिपटाए ,
श्यामल तन पर धूलि चढ़ाए ।
मोती सा रद उसका दमके ,
माणिक जैसे श्रुतिपट चमके ।
माखन छू पीयूष बनाए ,
गोकुल गलियाँ त्रिदिव बनाए ।
यमुना तट बंशी धुन बुनता ,
कान्हा में गोपी-हृदि घुलता।
पाटल-गुंचा सी स्मिति उसकी,
मोहे नटखट प्रतिमा जिसकी ।
छल भी उसका मन को भाए ,
छलिया छल कर औषधि लाए ।
श्यामल तन पर धूलि चढ़ाए ।
मोती सा रद उसका दमके ,
माणिक जैसे श्रुतिपट चमके ।
माखन छू पीयूष बनाए ,
गोकुल गलियाँ त्रिदिव बनाए ।
यमुना तट बंशी धुन बुनता ,
कान्हा में गोपी-हृदि घुलता।
पाटल-गुंचा सी स्मिति उसकी,
मोहे नटखट प्रतिमा जिसकी ।
छल भी उसका मन को भाए ,
छलिया छल कर औषधि लाए ।

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