तेरी कृपा पे भक्त आश्रित, पीर तुम हो टालती ।
संतोष उर में ढाल के माँ, भाग्य में हो जागती ।।
मुखड़ा सुमन सा खिलखिलाता, देह तरु के पात सा ।
अंचल मधुर प्रभुभोज सा है, कंकणा धुन सात सा ।।
भद्रा तुम्हारी है दुलारी, प्रिय तुम्हें गुड़ औ चना ।
हरती नयन के नीर को तुम, शोक चाहे हो घना ।।
तुम हो सरल सी उत्तरों सी, प्रश्न तुमसे हल हुआ ।
तेरे चरण पड़ के मईया, अश्रु गंगाजल हुआ ।।
संतोष है तेरी कथा में, प्रेम है आधार में ।
ममता झलकती मूर्तियों में, प्रीत है उस सार में ।।
सारा जगत द्युतिहीन हो माँ, यदि रहो ना तुम यहाँ ।
ऊसर धरा पर पुष्प जन्में, पग तुम्हारे हों जहाँ ।।
मैं पीड़िता हारी जगत में, तुम मुझे संवारती ।
संताप के क्षण में सुभग माँ, है तुम्हारी आरती ।।
हो साक्ष्य तुम मेरे हृदय की, रोम में तुम हो बसी ।
होता कभी जो अंध जीवन, तुम हुई माँ भोर सी ।।
व्रत है तुम्हारा अमृता सा, दूर करता शोक को ।
छाया असित मन से मिटा के, भेजता आलोक को ।।
हूँ मैं तुम्हारी प्रेम-भक्तिन, दो चरण में स्थान माँ ।
ऐसे करूँ मैं कर्म जग में, हो तुम्हें अभिमान माँ ।।

अति उत्कृष्ट रचना 🌺🌺जय माँ संतोषी
ReplyDeleteबहत सुंदर आध्यात्मिक रचना।
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