Saturday, May 16, 2020

बिछोह से ही सजाते हैं

समर्पण के सभी नियम, यूँ चल हम तक ही आते हैं ।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।

नहीं संवाद की गुत्थी, नहीं मौनों में वरमाला ।
नहीं ध्वनि का है आडम्बर,न गीतों पर लगा ताला ।
वचन का कोई बंधन ना, वचन फिर भी निभाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।१।।

दो रेखाएँ जो संग चलतीं, किन्तु जुड़ नहीं पातीं ।
जटिलताएँ दो पन्नों की, कभी क्यों नप नहीं पातीं ।
प्रिया के प्रश्न हैं दुष्कर, ना ज्योतिष भी बताते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।२।।

संकेतों से बने हैं क्षण, शाश्वत वो ही तो क्षण हैं ।
नवांकुर हम नहीं कोई, बलिष्ठ द्रुम का अचर कण हैं ।
ना कहते प्रेम है आधा, इसे अपार बनाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं‌‌ ।।३।।

क्या होगी स्पर्श की इच्छा, दो तन एक हो गए हैं ।
भाग्यों ने लिखा जो ना, वो प्रेमालेख हो गए हैं ।
हुई ना दीठ से क्रीड़ा, तो स्वप्नों में बुलाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।४।।

बनाया प्रेम का एक घर, वहीं निर्वाण भी होगा ।
मृदा में घुल के, अनगिन प्रेम का निर्माण फिर होगा ।
कथन इस लोक का जो ना,वही विश्व को सुनाते हैं ।।
प्रणय की पत्रिका अब हम, बिछोह से ही सजाते हैं ।।५।।


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