Monday, October 21, 2019

ये रूप, श्रृंगार ..

ये रूप, श्रृंगार, अदायें निराली,
तुम से हैं जानां, तुम्हीं पे लुटाना ।

देखूँ मैं दर्पण,तुम्हीं तुम दिखे हो ,
नयनों से अपने मुझे तुम सजाना ।

मैं प्रश्नों भरी इक गहरी नदी हूँ ,
तुम उत्तर हो मेरा, मुझमें समाना ।

प्रेम की गलियाँ अग्नि सी तपतीं ,
तुम मुझमें पिघलकर उबटन लगाना ।

प्रीति की रीति कठिन तो बहुत है ,
तुमसे है निभना, तुम्हीं को निभाना ।

मैं पूजूं तुम्हें एक जोगन की भाँति ,
बनकर के ईश्वर, मुझे तप बनाना ।

आये कभी जो विदाई की बेला ,
तुममें है छिपना, तुम्हीं को छिपाना ।


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