ना होता जो
प्रेम यदि ,
मैं भी शायद
ना होती ।
मधुर-मधुर संबंध
ना होते ,
'श्री' भी कायम
ना होती ।
क्या रचती मैं
पन्नों में,
कलम सुनहरी
क्या करती ,
ना होती जो
भाव की गंगा,
आँखों से मेरे
क्या बहती...
ना होता जो
प्रेम यदि ,
मैं भी शायद
ना होती।।
शबरी के मुख
लग कर के ,
बेर जो मीठे
ना होते ।
भगीरथ के
तप से जो ,
गंगा में जल-कण
ना होते ।
उस शून्य में
जलता दीप यदि
जग में ज्योत्
जो ना भरता ।
महादेव व गौरी का
प्रेम
जो शाश्वत
ना होता ।
रह जाता एक
पिंड खोखला ,
धरा सुनहरी
ना होती ।
ना होता जो
प्रेम यदि,
मैं भी शायद
ना होती ।।
बिना प्रेम के
जीवन कैसा,
तन पर मेरे
प्रेम ही बसता ।
कोटि-कोटि हों
पीर भले ही ,
मन पर मेरे
प्रेम ही रमता ।
प्रेम में देना
ना कुछ पाना ,
यही हृदय की
भक्ति है ।
ना पाऊँ
ऐश्वर्य भले ही ,
प्रेम ही सच्ची
शक्ति है ।
ना होता जो
कष्ट कोई ,
खुशियाँ सुखकर
ना होतीं ।
ना होता जो
प्रेम यदि,
मैं भी शायद
ना होती ।।।
प्रेम यदि ,
मैं भी शायद
ना होती ।
मधुर-मधुर संबंध
ना होते ,
'श्री' भी कायम
ना होती ।
क्या रचती मैं
पन्नों में,
कलम सुनहरी
क्या करती ,
ना होती जो
भाव की गंगा,
आँखों से मेरे
क्या बहती...
ना होता जो
प्रेम यदि ,
मैं भी शायद
ना होती।।
शबरी के मुख
लग कर के ,
बेर जो मीठे
ना होते ।
भगीरथ के
तप से जो ,
गंगा में जल-कण
ना होते ।
उस शून्य में
जलता दीप यदि
जग में ज्योत्
जो ना भरता ।
महादेव व गौरी का
प्रेम
जो शाश्वत
ना होता ।
रह जाता एक
पिंड खोखला ,
धरा सुनहरी
ना होती ।
ना होता जो
प्रेम यदि,
मैं भी शायद
ना होती ।।
बिना प्रेम के
जीवन कैसा,
तन पर मेरे
प्रेम ही बसता ।
कोटि-कोटि हों
पीर भले ही ,
मन पर मेरे
प्रेम ही रमता ।
प्रेम में देना
ना कुछ पाना ,
यही हृदय की
भक्ति है ।
ना पाऊँ
ऐश्वर्य भले ही ,
प्रेम ही सच्ची
शक्ति है ।
ना होता जो
कष्ट कोई ,
खुशियाँ सुखकर
ना होतीं ।
ना होता जो
प्रेम यदि,
मैं भी शायद
ना होती ।।।

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