Monday, October 7, 2019

पीड़ा सारी सिमट के मन की

पीड़ा सारी सिमट के मन की ,
क्षण पर भारी होती है ।
मन पर उगते कृशानु विटप ,
घाव की धारी होती है ।

मेघों पर बनते चित्र अपरिचित ,
नभ-अंधियारे कहाँ हैं छँटते ।
छवि स्वयं की धुंध सी लगती ,
आकार संयमित कहाँ हैं लगते ।
बरसे मन तो तन-मन पर,
घनघोर सी आँधी होती है ।
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।

खिंचता है प्रति रोम देह का,
धमनी भी कट-कट कटती है ।
प्राणों की रेखा बाधित सी ,
श्वासें भी तप-तप तपती हैं ।
जीवन के गूढ़ से सागर में,
बड़वाग्नि दशा सी होती है ।
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।

होते हैं कुछ अशांत से सरवर,
लहरें प्रचंड उत्पात मचाती हैं ।
ना कोई श्रोता,ना कोई दर्शक,
मुख बाण ही भेदी जाती है ।
फूलों की सी सेज ही सहसा ,
क्यों कंट विधा सी होती है ?
पीड़ा सारी सिमट के मन की,
क्षण पर भारी होती है ।


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