सरल नहीं है
बुनना
मन के बिखरे
धागों को ....
हृदय पर पड़ी गाँठ
खोलना
कहाँ आसान ....
कितना दुरूह है
घावों की दवा से
पहचान कराना ....
कलम को
दर्द की स्याही में
डुबोकर
कृति सुसज्जित करना
कितना सुविध ....
कवि-मन ही
जानता है
ऊहापोह का स्तर ,
टूटे-बिखरे तिनके
जोड़कर
महल बनाने का मंतर ...
अश्रु को सागर
बनाने की कला
अन्य किसने जानी ,
किसने सीखा
मृत्युशैय्या पर
पुहुप उगाने का तंतर.....
बुनना
मन के बिखरे
धागों को ....
हृदय पर पड़ी गाँठ
खोलना
कहाँ आसान ....
कितना दुरूह है
घावों की दवा से
पहचान कराना ....
कलम को
दर्द की स्याही में
डुबोकर
कृति सुसज्जित करना
कितना सुविध ....
कवि-मन ही
जानता है
ऊहापोह का स्तर ,
टूटे-बिखरे तिनके
जोड़कर
महल बनाने का मंतर ...
अश्रु को सागर
बनाने की कला
अन्य किसने जानी ,
किसने सीखा
मृत्युशैय्या पर
पुहुप उगाने का तंतर.....
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